मुरादाबाद। कहते हैं अखबार सच का आईना होता है। इस आईने से आम आदमी को सच दिखाने का काम पत्रकार को करना होता है। हालांकि यह भी पूरा सच नहीं है। इस आईने के इर्द-गिर्द पत्रकार के साथ मालिक एवं संपादक से लेकर विज्ञापन प्रभारी की फौज तैनात रहती है। लिहाजा इसमें सच भी ऐसा दिखाया जाता है। जिसमें छिपा झूठ सभी की आकांक्षाओं को पूरा करते हुए आम आदमी को विश्वास को बनाये रखता है। हालांकि जब भी यह कोशिश अनियंत्रित होती है तो यह आईना दरक जाता है और तमाम कोशिशों के बाद भी आम आदमी को काला सच नजर आ जाता है।
इन दिनों मुरादाबाद में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। लावारिश लाशों के कागजी पोस्टमार्टम का खुलासा तेजतर्रार नवागत डीआईजी अशोक कुमार एवं एसपी देहात डा. अरविन्द कुमार की छापामारी कार्यवाही के दौरान हुआ। मामले में बिना पोस्टमार्टम किये लाशों की रिपोर्ट तैयार करने वाले डाक्टर पंकज गिरि, फार्मासिस्ट हरि सिंह एवं स्वीपर आनन्द को पुलिस ने अलग-अलग धाराओं में जेल भेज दिया। इस प्रकरण को दिखाने एवं छापने में भले ही छोटे से बड़े तक हाबी रहे लेकिन पुलिस के थमे कदमों को रफ्तार दिलाने का काम कोई भी अखबार अभी तक नहीं कर पाया। हालत यह है कि खुलकर कार्यवाही का क्रेडिट बटोरने वाले अखबार इस खेल के असली खिलाड़ी की ओर भूलकर भी इशारा नहीं कर रहे हैं।
दूसरे लीडिंग न्यूज पेपर ने पहले दिन ही इस खबर को इस अंदाज में छुआ था कि मानों यह कोई रूटीन खबर थी। इसके बाद भी कोई अखबार नहीं चिल्लाया कि आखिर इन बदनसीब लाशों का ‘असली’ पोस्टमार्टम कहां होना था। हालांकि पत्रकारों से लेकर पुलिस तक सभी जानते हैं कि इन लाशों का अगला ठिकाना क्या था लेकिन कोई बोल नहीं रहा। मामले में एफआईआर लिखने वाली पुलिस की कलम भी पहली तीन-चार लाइनों के बाद भी लाशों की तस्करी के खेल पर चुप्पी साध गयी। हां इतना जरूर है कि पुलिस चुप है लेकिन खुद को बड़ा दिखाने वाले मीडिया के चेहरे अपनी जेब गर्म करने के खेल में लगे हुए हैं।
दरअसल मुरादाबाद की सरजमीं पर एक उद्योगपति ने देखते ही देखते इतनी तरक्की कर ली कि कब वह मीडिया के एक बड़े वर्ग का अन्नदाता बन गया, किसी को इसका पता तक नहीं चला। लाटरी के धंधे को त्याग जब इस उद्यमी ने शिक्षा के क्षेत्र में एंट्री ली तो मानों भूचाल आ गया। लीडिंग न्यूज पेपरों एवं एमडीए के कई अफसरों के साथ मिलकर इस उद्योगपति ने सबसे पहले पाकबड़ा क्षेत्र में अधिग्रहण का ऐसा हौब्बा क्रियेट किया कि किसान औने पौने में अपनी जमीन बेचकर पैदल हो गये। फुलपेज विज्ञापन के साथ स्थानीय दिग्गजों की सेवाकर चिकित्सा सेवा में मील का पत्थर खड़ा करने वाले इस उद्योगपति से रकम ऐंठने के मामले में कई पत्रकारों एवं कई लीडिंग न्यूज पेपरों ने अपना खासा नाम कमाया है। चूंकि यह मेडिकल कालेज संचालक मीडिया को पैसा बांटने में काफी उदार माना जाता है।
ऐसे में इस दफा पोस्टमार्टम हाऊस पर पुलिस द्वारा किये गये खुलासे के बाद कई सूरमाओं के निशाने पर जिले का यह एकमात्र मेडिकल कॉलेज है। चूंकि मेरठ एवं आसपास के अन्य मेडिकल कॉलेज में दाल गलनी आसान नहीं है। इसलिए मीडिया का एक बड़ा तबका इस मामले को कैश करने तक चुप बैठने के मूड में नहीं है। लिहाजा सभी अपने अपने हिसाब से खबरे लिखकर अपना दाम बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि यह पूरी तरह से पुलिस की विवेचना के बाद ही तय होगा कि क्या यह डाक्टरों की लापरवाही का मामला था, या वास्तव में लाशों की इस तरह से तिजारत चल रही थी। चूंकि एमबीबीएस पाठ्यक्रम में मेडिकल कॉलेज को प्रैक्टीकल के लिए मानव शव की आवश्यकता होती है। सरकारी तंत्र द्वारा समय रहते शव उपलब्ध न कराये जाने के कारण संभव है कि मेडिकल कालेज को जुगाड़ करना पड़ता हो, लेकिन हमारी मीडिया यह कमाल कर रही है कि एक ओर लीडिंग न्यूज पेपर लिख रहे हैं कि लाशों की तिजारत हुई है, कोई भी अपनी खबर में इसे लापरवाही मानने को तैयार नहीं है, लेकिन कोई यह भी नहीं बता रहा कि आखिर लाशों को गायब कौन कर रहा था।
यदि मामला आम आदमी से जुड़ा होता तो शायद अखबार चुप्पी भी साध जाते। जैसा पहले कई दफा हुआ है। चूंकि दिग्गजों के लिए हर समय भामाशाह की भूमिका निभाने वाले इस उद्योगपति से अपना मेहनताना मांगने की हिम्मत नहीं हो रही है या फिर दिग्गज इस दफा मुंह खोलकर मांगना चाहते हैं। इसलिए खबरों को दिनोंदिन पैना किया जा रहा है। चूंकि लगभग सभी लीडिंग न्यूजपेपरों को विज्ञापन के मद में एक मोटी रकम की आमद इस उद्योगपति से होती है। लिहाजा इसे छेड़ा भी नहीं जा रहा है। अब यह देखना दिलचस्प रहेगा कि कैमरे वाले किस कीमत पर इस खबर का सौदा करते हैं तो दूसरी ओर दिग्गज कलमकार सत्य की कितनी कीमत वसूल पाते हैं। फिलहाल इतना तो तय है कि लाशों के इस खेल में कई मीडियाकर्मियों का मालामाल होना तय है।
लेखक मोहित कुमार शर्मा मुदाराबाद से प्रकाशित दैनिक न्यूज ऑफ जेनरेशन एक्स के संपादक हैं.











