जयपुर विकास प्राधिकरण द्वारा पत्रकारों को रिश्वत रूपी बांटे गए लिफाफों के पीछे की कहानी बड़ी रोचक और तगड़े घालमेल की ओर इशारा करती है। वहीं ‘प्रकाश कुंज’ द्वारा हुए इस खुलासे के बाद जेडीए प्रशासन अपने बचाव के रास्ते तलाशने लग गया है। तो दूसरी ओर इस सारे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच की मांग उठने लगी है। संवाददाता ने जब नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल से इस सारे मामले पर व्यक्तव्य लेने के लिए फोन किया तो ‘श्रीमान मीटिंग में व्यस्त हैं’ का जवाब आ गया।
‘प्रकाश कुंज’ ने गहन पड़ताल की तो सामने आया कि पत्रकारों को ये लिफाफे यूं ही नहीं बांटे गए हैं बल्कि सोची-समझी साजिश के तहत ऐसा किया गया है। जिसकी एक बानगी पेश है :
जयपुर विकास प्राधिकरण में भ्रष्टाचार की जड़ें इस कदर पनप चुकी है कि यहां के बेखौफ अधिकारी नियम कायदे और अदालती आदेशों की तो आए दिन धज्जियां उड़ाते ही हैं, बल्कि अब तो इससे भी एक कदम आगे जाकर स्वयं सरकार पर कीचड़ उछालने तक में उन्हें संकोच नही रहा है। यही नही येन-केन प्रकारेण अपना उल्लू सीधा कराने के खेल में खबरनवीसों को साथ कर अपने पक्ष में खबरें लगवाने की बाजीगरी करवाने तक में उन्हें कोई गुरेज नहीं रह गया है।
प्रकरण सामने आने के चार दिन बाद तक जेडीए कमिश्नर द्वारा इसका खण्डन नहीं करने से पूरी तरह जाहिर है कि खबरें प्रायोजित कर समाचार पत्रों में छपवाई जाती हैं। खबर की भाषा शैली के अनुसार यह तथ्य किसके हवाले से खबरनवीस तक पहुंचे, इसका कोई उल्लेख नहीं होता है। इस समाचार के प्रकाशन में जेडीए के निदेशक (विधि) और जेडीए कमिश्नर की भी कोई टिप्पणी अंकित नही की गई है। यहां तक कि सूचना के अधिकार के तहत खबरनवीस द्वारा उक्त नोटशीट की प्रति लेने बाबत भी कोई रिकार्ड जेडीए के पास उपलब्ध नहीं है। ऐसे में सीधे तौर पर यह प्रश्न खड़ा होता है कि ये अंदरूनी तथ्य बाहर तक कैसे गए, जाहिर है इस खबर के पीछे जेडीए के उच्चाधिकारियों की मिलीभगत थी।
मजे की बात तो यह है कि सीधे सरकार पर निशाना साधने की खबरों के खेल से प्रमुख शासन सचिव नगरीय विकास तथा स्वयं स्वायत्त शासन मंत्री भी अनभिज्ञ बने हुए हैं। उनके द्वारा न तो उस संबंध में कोई सफाई ही दी गई और न ही सरकार का पक्ष रखा गया है। इससे विपक्ष में बैठे विधायकों को भी संवाददाता सम्मेलन बुलाकर बयानबाजी करने का मौका मिल गया है।
इस प्रकरण का सबसे दुखद पहलू यह है कि जेडीए द्वारा जारी विज्ञापनबाजी व लिफाफों की बंदरबांट में सहभागी अन्य मीडिया समूह भी सच्चाई जानते हुए भी बुत बने बैठे हैं और बेबस बिल्डर नाहक ही जेडीए की तानाशाही का शिकार बना हुआ है। 17 साल से जमीन का जख्म झेल रहे बिल्डर सहित खबर में निशाने पर लिए गए मुख्यमंत्री और मंत्री की भी टिप्पणी नहीं है। बहरहाल प्रकाश कुंज ने जब मामले की पड़ताल की तो तथ्य कुछ और ही नजर आए। हकीकत में जेडीए ने सार्वजनिक विज्ञापन देकर दिनांक 26.10.93 को मुर्गीखाने के नाम से अलमशहूर इस जमीन की विधिवत नीलामी की। खुली बोली में सर्वोच्च बोलीदाता के नाम से उक्त जमीन छोड़े जाने के बाद बिल्डर ने अगले ही दिन 13 लाख 65 हजार रुपए जेडीए में जमा करा दिए।
इस नीलामी की पुष्टि करते हुए नीलामी से 27 दिन बाद जेडीए ने बिल्डर को 23 नवंबर 1993 को बकाया राशि जमा कराने का मांग पत्र भी जारी कर दिया। गौरतलब है कि जेडीए द्वारा सार्वजनिक रूप किसी जमीन की नीलामी का विज्ञापन जारी करने का आशय यही है कि जमीन जेडीए स्वामित्व की है तथा नीलामशुदा जमीन पर बाद में यदि कोई आक्षेप आता है तो उसका निस्तारण करवाकर संबंधित जमीन उच्चतम बोलीदाता के पक्ष में कराने की जिम्मेदारी भी जेडीए की ही है।
जेडीए द्वारा प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्तों के खिलाफ जाकर असत्य अभिकथन के साथ प्रार्थी का जमाशुदा चेक लौटाने का नाटक भी रचा गया, जिसके खिलाफ जेडीए तथा सरकार के स्तर पर सुनवाई नहीं होने से बिल्डर को उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। यहीं से जेडीए के भ्रष्टाचार का खेल शुरू हुआ तथा जेडीए ने 26 अप्रैल 2000 को विधिवत नीलाम की गई जमीन का उच्चतम बोलीदाता को कब्जा सौंपे जाने की बजाय इसे जेडीए संपत्ति होने की विज्ञप्ति जारी कर दी, जबकि उस दिनांक से 7 साल पहले ही यह जमीन जेडीए नीलाम कर चुका था, जिस पर विज्ञप्ति की तारीख का उसका कानून मालिकाना हक नहीं रह गया था।
जेडीए के इस कारनामे को बिल्डर ने राज्य सरकार द्वारा गठित समझौता समिति के सम्मुख रखा, जिसने बिल्डर के भूमि पर दावे को न्यायोचित मानते हुए उसे मार्च 2002 में 15 प्रतिशत ब्याज सहित राशि जमा कराने का आदेश जारी कर दिया। इस पर बिल्डर ने प्राधिकरण कोष में मई 2002 में राशि जमा करा दी, लेकिन जयपुर विकास प्राधिकरण ने फिर से असत्य कथन के साथ बिल्डर द्वारा जमा ब्याज की राशि का चेक वापस लौटा दिया। जिस पर जेडीए के तत्कालीन निदेशक वित्त ने करारी टिप्पणी की। अपनी टिप्पणी में उन्होंने यह भी स्पष्ट रूप से अंकित किया कि न्यायालय के स्तर से कोई भी स्टे मौखिक रूप से जारी नहीं होता है। इस टिप्पणी के बाद जेडीए ने बिल्डर की ओर से देय संपूर्ण मांग राशि जमा कर ली और भूमि का भौतिक कब्जा बिल्डर को 10 अक्टूबर 2005 को दे दिया। जेडीए द्वारा 18 अक्टूबर 2005 को बिल्डर के पक्ष में नियमानुसार लीज डीड भी जारी कर दी गई।
भूमि का कब्जा सौंपे जाने, बिल्डर द्वारा उस पर बाउण्ड्रीवाल और गार्डरूम बना लेने के बाद भी जेडीए के अधिकारियों को इस जमीन से मलाई बटोरने की नीयत नहीं गई और नियमों और कानून के विपरीत जाकर जेडीए ने 4 मार्च 2006 को बिल्डर का पक्ष जाने बिना ही सेलडीड को निरस्त कर दिया। बिल्डर को इसके बाबत फिर से उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा, जहां से फैसला बिल्डर के पक्ष में हुआ।
इस सारी कवायद को देखते हुए ही सरकार के महाधिवक्ता और अतिरिक्त महाधिवक्ता से विधि सम्मत राय लेकर जमीन बिल्डर के पक्ष में छोडऩे के आदेश दिए गए, जिससे की जेडीए अधिकारियों के भ्रष्ट मंसूबों पर पानी फिर गया। सरकार ने इस फैसले के जरिए अपनी लोक-कल्याणकारी नीति के प्रति प्रतिबद्धता जताते हुए इन्वेस्टर फ्रेंडली होने तथा राज्य में निवेश के प्रति लोगों को प्रेरित करने का सहज संकेत दिया जो जेडीए और संबंधित को रास नहीं आया।













rep
January 14, 2011 at 9:55 am
bha Ankit Khandelwal ji. aap se nivedan h. pls news puri dekh leve.
Ankit Khandelwal
January 13, 2011 at 7:31 pm
Ek hi cheez puchna chaunga.. kisi khabar ko chapne se pehle proof to hona chahyein… is research main mujhe to ek tarfapan bahut jayada lagta hain… kahi bhi kisi bhi information ka koi praman nahi diya gaya hain… na hi builder ka naam.. officer ka naam ya kisi ka naam diya gaya hain??? yeah aadha sach kyun??