
: मंत्रमुग्ध, मुक्त, उन्मुक्त, सहज बनाने वाला एक शानदार भजन :
कबीर की इस रचना ….निर्भय निर्गुण गुण रे गाऊंगा… को पंडित शिवकुमार और कुमार गंधर्व ने अपने-अपने अंदाज में गाया है. इन लोगों ने इसे इतने दिव्य तरीके से गाया है कि सुनते-सुनते आपका दुखी, उदास, मजबूर, पीड़ित मन दिव्यता की ओर उन्मुख होने लगता है, पवित्र और निष्पाप होने लगता है. एक ऐसी दुनिया में आप जाने लगते हैं जहां शरीर नहीं, जहां माया मोह नहीं, जहां दुनियादारी की झंझट नहीं. वहां तो बस सब दिव्य है, उदात्त है, भव्य है.
फकीरों-सूफियों-संतों ने वो रास्ता मनुष्यों को दिखा-बता दिया है जिससे आप अपने दुखों से मुक्त हो सकते हैं पर हम लोग हैं कि फिर फिर उसी जगह लौट आते हैं जहां सिर्फ दुख ही दुख है. जहां सिर्फ स्थूलता है. जहां सिर्फ चालाकी, धूर्तता और मक्कारी है. नैराश्य के गहन समुंदर में गोते लगाते वक्त अगर आप इन दोनों आडियो को सुन लें तो फिर सचमुच आप तर जाएंगे. शून्य-शिखर पर अनहद बाजे जी… राग छत्तीस सुनाऊंगा… निर्भय निर्गुण गुण रे गाऊंगा…. नीचे दिए आडियो प्लेयर को क्लिक करिए और पूरा सुनिए…
- पंडित शिवकुमार की आवाज में… निर्भय निर्गुण गुण रे गाऊंगा…
- कुमार गंधर्व और वसुंधरा कोमकली की आवाज में.. निर्भय निर्गुण गुण रे गाऊंगा…

निर्भय निर्गुण गुण रे गाऊंगा
मूल-कमल दृढ़-आसन बांधूं जी
उल्टी पवन चढ़ाऊंगा ।।
निर्भय निर्गुण ।।
मन-ममता को थिर कर लाऊं जी
पांचों तट मिलाऊंगा जी
निर्भय निर्गुण ।।
इंगला-पिंगला-सुखमन नाड़ी
त्रिवेणी पे हां नहाऊंगा
निर्भय-निर्गुण ।।
पांच-पचीसों पकड़ मंगाऊं-जी
एक ही डोर लगाऊंगा
निर्भय निर्गुण ।।
शून्य-शिखर पर अनहद बाजे जी
राग छत्तीस सुनाऊंगा
निर्भय निर्गुण ।।
कहत कबीरा सुनो भई साधो जी
जीत निशान घुराऊंगा ।
निर्भय-निर्गुण ।।

((निर्गुण का अर्थ है- गुणों से अतीत. यह शब्द वैदिक ग्रंथों मे परमात्मा, ईश्वर तथा भगवान के संदर्भ में आता है. वैदिक ग्रंथों में ईश्वर को सगुण और निर्गुण दोनों रुपों में माना गया है. आधुनिक संदर्भ में निर्गुण का अर्थ मोह-माया-चोला-चाल से मुक्ति का है. शरीर से परे होना भी निर्गुण माना जाता है.))












नीरज
August 4, 2011 at 6:30 am
ईश्वरीय…बहुत दिनों से तलाश थी…जितना भी शुक्रिया करूं कम है।
दिनेश
August 4, 2011 at 5:53 pm
कुमार साहब का यह भजन हम लोग कई बार पूरे दिन सुनते रहते थे। इसी के साथ एक भजन “गुरूजी जहां बैठूं वहां छाया दे” भी चलता रहता था। बाद में इसे मुकुल शिवपुत्र के कंठ से ग्वालियर में लाइव सुना था। उनकी गायकी भी बेमिसाल थी व मुकुल अपने पिता की तरह संगीत के शिखर पर जा सकते थे। पता नहीं उनके साथ क्या गड़बड़ हुई। शिवकुमार की आवाज में यह भजन पहली बार सुना। जय हो!
सूफी संगीत व वरिष्ठ नागरिकों के बारे में आप किसी योजना का जिक्र कर रहे थे?
vishwas
December 3, 2013 at 8:32 pm
ji beshaq… halhi mein Pt. Vasantrao Deshpande ji ke pote Rahul Deshpande inhone yahi Nirgun bhajan gayaa hai…wo bhi bemisal hai.. Hamare yuwa pidhi ke classical singers isse attempt kar rahe hai ye sunke behad khushi hoti hai.. Adwitiy hai ye Nirgun bhajan.