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जातिवादी संपादक और गुटबाज ब्‍यूरो प्रभारी

श्रीमान यशवंत जी, महोदय, भड़ास4मीडिया के माध्यम से राष्ट्रीय सहारा देहरादून की गतिविधियों का गुणगान सुना। अखबारी जगत के लिए यह कोई नई बात नहीं है। पहले भी इस तरह की घटनाएं होती रही हैं, आगे भी होंगी। हिन्दी दैनिक आज और दैनिक जागरण जैसे अखबार इसके लिए काफी कुख्यात रहे हैं। मारपीट के क्षेत्र में दैनिक जागरण के स्थानीय सम्पादक स्व. विनोद शुक्ला ने तो अपनी पहचान बना रखी थी।

श्रीमान यशवंत जी, महोदय, भड़ास4मीडिया के माध्यम से राष्ट्रीय सहारा देहरादून की गतिविधियों का गुणगान सुना। अखबारी जगत के लिए यह कोई नई बात नहीं है। पहले भी इस तरह की घटनाएं होती रही हैं, आगे भी होंगी। हिन्दी दैनिक आज और दैनिक जागरण जैसे अखबार इसके लिए काफी कुख्यात रहे हैं। मारपीट के क्षेत्र में दैनिक जागरण के स्थानीय सम्पादक स्व. विनोद शुक्ला ने तो अपनी पहचान बना रखी थी।

अफसोस तो तब होता है जब सहारा इंडिया परिवार, जो कि पारिवारिक भावना का ढिंढोरा पीटता नहीं थकता, से जुड़े मीडिया (राष्ट्रीय सहारा) में ऐसी घटनाएं हो रही हैं। वैसे देहरादून संस्करण के लिए यह कोई नई बात नहीं है। इसके पहले भी यहाँ मारपीट हो चुकी है। मारने वाले और मार खाने वाले, दोनों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा बावजूद इसके दोनों को बचाने मे बड़े-बड़े लोगों ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था। अब देखिए क्या होता है।

महोदय, आपकी साइट पर इस खबर को लेकर अनेक प्रतिक्रियां पढ़ने को मिली एक मेरी भी है, चाहे तो इस खबर के साथ लें या सीधे छापें।  उद्देश्‍य यह है कि सच्चाई लोगों को पता चलनी चाहिए। हालांकि इसकी प्रतियां वरिष्ठों को भेज दी गई हैं। मान्यवर, सवाल यह नहीं है कि किसने किस पर हाथ उठाया, सवाल यह है कि क्यों उठाया, सवाल यह भी है कि ऐसी स्थिति किसने पैदा की और क्यों पैदा की? रहा पद की गरिमा का सवाल तो इसका ध्यान सभी को रखना चाहिए। कुछ महीने ही सही मैं भी इस अखबार से जुड़ा रहा हूँ और अब भी लोगों के सम्पर्क में हूँ। जहाँ तक मैं चीजों को महसूस कर पाया हूँ वो इस तरह हैं। पहले स्थानीय सम्पादक के विषय में।

एलएन शीतल (स्थानीय सम्पादक) जी का लम्बा अखबारी अनुभव रहा है, छोटे से लेकर बड़े अखबार तक में 20-25 साल काम कर चुके हैं। सम्पादक के रूप में भी कई अखबार में वर्षों काम कर चुके हैं। अनुभव इतना है कि कोई संवाददाता या डेस्‍क पर काम करने वाला उनको पट्टी नहीं पढ़ा सकता। मीटिंग में हर समाचार/स्टोरी में क्या-क्या समायोजित करना है, ताकि समाचार और बेहतर हो, वो उसे बिन्दुवार बताते हैं। मीटिंग में जब वो बोलते है तो ऐसा लगता है कि एक संपादक नहीं आचार्य रजनीश बोल रहे हैं। उनके आने से पूरे सम्पादकीय विभाग में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, गलतियां काफी कम हुई है, लोग अनुशासित हुए हैं, कार्य-संस्कृति में भी सुधार आया है। आज की तिथि में वे एक बहुत अच्छे नेतृवकारी हो सकते हैं। बशर्ते उन्हें जातिवाद व अपने गुस्से पर काबू पाना होगा। हालात यह है कि आज ये अपनी जाति विशेष के लोगों से बुरी तरह से घिर गये हैं। इन्होंने एक तरह से किचन कैबिनेट बना ली है।

अब तस्वीर का दूसरा पक्ष। दूसरा पक्ष भी कम नहीं है। छोटे स्तर पर ही सही लाइजनिंग और लाबिंग में ये (अमरनाथ सिंह- ब्यूरो प्रभारी) किसी वीर सांघवी या नीरा राड़िया से कम नहीं है। गुट्टीबाजी और गुटबाजी में तो इन्हें महारथ हासिल है। इनकी इस महारथ का अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इन्होंने नोएडा से वरिष्ठ पद पर आये एक कार्यकर्ता को बड़े आसानी से अपने गुट में शामिल कर दिया। ब्यूरो प्रभारी के बारे में पूरा सम्पादकीय विभाग जानता है कि इन पर मुख्यालय के एक बड़े अधिकारी का हाथ है। वो अधिकारी इनकी रक्षा ही नहीं कर रहा है बल्कि इनको आगे भी बढ़ा रहा है। पहले ब्यूरो प्रभारी खुद एक गुट के महत्वपूर्ण सदस्य थे, अब इनका अपना गुट हो गया है। कम से कम आधा दर्जन लोग इनके गुट में हैं। वैसे गुटबाजी तो अखबार के लांच होने के साथ ही शुरू हो गयी थी, जहाँ पहले संपादक ठाकुरवाद और लखनऊवाद को हवा देते रहे, वहीं वर्तमान संपादक ब्राह्मणवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। ब्राह्मणवादी गुट का मुखिया पहाड़वाद की भावना से बुरी तरह से ग्रसित हैं इसलिए इस गुट में पर्वतीय क्षेत्र के लोग शामिल हैं।

अब मुद्दे पर। ब्यूरो प्रभारी ने के बारे में यह शीर्षक सही बैठता है। ‘ब्यूरो प्रभारी’ सब पर भारी। यह सर्व विदित है कि पहले संपादक से लेकर अब तक के सभी संपादक/समाचार संपादकों पर यह भारी रहा है। सिर्फ इसलिए कि इन्हें मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारी का संरक्षण प्राप्त है। यह एक-एक बात की जानकारी उन्हें देते हैं। बताते हैं कि पहले संपादक को बाहर का रास्ता दिखाने में इन्होंने जाँच टीम को एक पक्षीय जानकारी दी थी, यही नहीं संपादक के जाने के बाद उनके खासमखास महिला कार्याकर्ता का ट्रांसफर करवाने में भी अहम भूमिका निभाई।

दूसरे संपादकीय प्रभारी के ये विशेष सलाहकार मात्र इसलिए रहे कि ये जिस अखबार में काम करते रहे हैं वहाँ पर ब्यूरो प्रभारी भी काम कर चुके थे। इन्हीं के कार्यकाल में अमरनाथ जी साधारण से रिर्पोटर हुआ करते थे। इस साधारण से रिर्पोटर की ताकत को अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तत्कालीन ब्यूरोचीफ दर्शन सिंह रावत से उनके अधिकार छीनकर वरिष्ठ समाचार सम्पादक रजत गुप्ता ने अपने हाथों में ले लिया था, बाद में ये अघोषित ब्यूरो प्रभारी के रूप में कार्य करते रहे। अन्ततः दर्शन सिंह रावत को संस्थान छोड़ना पड़ा। चीफ सब एडिटर प्रमोद श्रीवास्तव को भी हटवाने में भी इन्हीं का हाथ रहा है। अब इसे  ब्यूरो प्रभारी की खासियत कहें या आने वाले अधिकारी की मजबूरी कि वह उनका हो ही जाता है या होने को मजबूर हो जाता है।

नये सम्पादक एलएन शीतल को उन्होंने अपना बनाने के लिए सारे घोड़े खोल दिये थे, लेकिन वो उनकी ग्रिप में नहीं आये। ब्यूरो प्रभारी की खासियत यह भी है कि ये हर किसी को उसकी हैसियत के अनुसार जूस या चाय प्रतिदिन उसके डेस्‍क या केबिन में भिजवाते हैं। उस अधिकारी को कार तक छोड़ने जाते हैं। उसकी बटरिंग करते हैं। गोया जैसे यह ब्यूरो प्रभारी होने की पहली शर्त हो। समाचार कितनी अच्छी तरह से लिखना जानते हैं यह तो अखबार की फाइल ही गवाह है, ऐसी एक भी खबर इन्होंने तीन साल में नहीं लिखी जिसकी पूरे शहर में या पत्रकारिता जगत में चर्चा हुई हो।

ब्यूरो प्रभारी तो ब्यूरो प्रभारी हैं, उनकी पत्नी भी जो कि जूनियर उप संपादक हैं किसी से कम नहीं है। ये भी जैसा चाहती हैं वैसा होता है। आज भी जहाँ हैं अपनी मर्जी से हैं और अब तक जहाँ रही हैं अपनी मर्जी से रही है। एक बार संपादक ने इनकी डेस्‍क बदली तो ये मीटिंग में व्यवस्था को ही चुनौती दे बैठीं, घंटों संपादक पर पिली रही। यही नहीं बाद में ये अपने पति के साथ भी काफी देर तक संपादक से बहस करती रहीं। नतीजा यह हुआ कि इनकी डेस्‍क नहीं बदली गयी। मतलब यह कि एक संपादक एक जूनियर उप संपादक का डेस्‍क तक नहीं बदल पाया। चर्चा है कि पति की तरह ही इन पर भी उसी वरिष्ठ अधिकारी का हाथ रहता है। संपादक ने एक नोटिस लगाई कि कोई भी कार्यकर्ता कार्य समाप्त होने के बाद कार्यालय में नहीं रहेगा लेकिन ये दो-ढाई बजे रात तक रहते हैं। और अपनी पत्नी के संस्थान की गाड़ी से जाते हैं। ब्यूरो प्रभारी की विद्वता का एक नमूना यह भी है कि ये कार्यालय में ही बैठकर अन्य अखबारों से खबर टीपते हैं। राष्ट्रीय सहारा की गाड़ी से हिन्दुस्तान अखबार गढ़वाल मण्डल में जाता है। जब उसकी गाड़ी जाती है तो एक अखबार ये खरीदते है और खबरें टीपते हैं। कई बार तो लीड तक उससे ली जाती है।

कुमार कल्पित

देहरादून

[email protected]

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0 Comments

  1. AnilSingh

    January 7, 2011 at 6:09 am

    Bhai Sahab,Ek do Akhbar ko Chhor Deejiye to sabhi Sampadak Jativaadi Hain.

  2. anil

    January 6, 2011 at 5:41 pm

    amar anant amar katha ananta.

  3. momtu

    January 6, 2011 at 1:02 pm

    Batt 16 aana sahi hi. Sahara ke dehradun unit top ke unit hi. 70% log Kam Kay Mamaly may top k log han. Repoter or Stengerow ka koye jaba nahi hi. Amarnath Jasy teen-char log han jenhony Kabhi n to kam keya or n to kesi ko kam karany deeya. Sahara nay Darsaha singh rawat or jo city dakh rahy hain uankay natratwa man jo teem banayi tee ushak koy jawab nhi ta lakeen amarnat nay dono ko kam nhi karany daya. sayad yhi wjah thi ke rawat calya gaya. amarnath k karan city teem k kayi log chaly gaya. Amarnath nay hamesa Delhi kee dadagri ke. or unky aaka nay hamesha unki madd kee. Amarnath ke babi bhi kesi ko kuch nahi samjati hay amarnath ke tarh he batameegi karti hi.

  4. uma

    January 6, 2011 at 1:17 pm

    amarnath ke bare main kumar kalpit ko poori jankari nahi hai. amarnath hindustan paper kharidate nahi, balki ek 4th class ke marfat taxi wale ki khusamad kar mangte hain. waise to wah field main nahi jate lekin kabhi kisi ke sath bjp office ya kisi sarkari daftar chale jaye to sabse pahle chay (tee) mangwata hai.
    amarnath apne aaka ka khof dikha kar 90 % logo ko apmanit karta raha hai. rajesh srinet jaise bhale editor ko amarnath ki wajah se saheed hona pada. suneeel shah jaise kabil news editor ko noida se dhamki delai gayi ki naukri karni hai to amarnath ko jyada tawjjo dain.
    amarnath ko aaka ki mehrwani se sebse jyada fuel allowuns milta hai lekin bina wahan ke bureo ka kam karne ka sakte yah kewal or kewal amarnath se sikha ja sakta hai. jitna bhatta amarnath ko convence ki mad main milta hai, utna kewal bade managar ko hi mil pata hai.
    amarnath ki or bhi khubiyain hain. poori kitab likhi ja sakti hai.:)

  5. shahil

    January 6, 2011 at 10:41 am

    kalpit bhai, ln shital ji ke bare men aap ka najariya jara durust karne yogya lagata hai. shital ji jativadi kam vyaktivadi adhik hain.anushasanbadha jeevan jeene valo me se ek shitalji kaam karne walon ko jyada tarjih dete hain, ve use hi santh lekar chalna pasand bhi karte hain. kamchor , chugalkhor aur gutbajon ke vah ghor virodhi hain. kadachit amarnath isi kunbe ke honge isliye ve shital ji ko samajh nahi sake. khair shital ji udar aur dayalu praviti ke hain. amarnath sarikhe longon se yahi umeed ki ja sakti hai. is aachran ke liye sahara prabandhan kaun sa kadam uthata hai yah uska niji masala hai magar media me shitalji jaise manishi bahut kam hain. ghatna mujhe pata nahi isliye keval apni baat sheetalji ke nature ko jante hue kah raha houn. amarnath ji se koi jyada shikayat isliye bhi nahi kyunki ve nadan hai jo shital ji ko jaane samjhe bagair reiect kar bithe. kalpit bhai kisi ko puri tarha se jaane bagair use jativadi kahna kya uchit hoha!!!

  6. mini sharma

    January 6, 2011 at 7:03 am

    Shri Yashwant ji jo bhee en Shriman ne likha hai woo bahhut sahee lagta hai. Per yeh Jaatebaad kahna galat hoga. Har koe yeh samjhata hai kee agar Pahad mai Paper bik raha hai yaa pahad mai koe kaam kar rahe too mumkin hai kee waha ke log jyada honge..Aur yahee Baat kuch logo ko Akhar rahee hai. unhee logo ne yeh baat chala rakhee hai. Aur jaha tak Amarnath jee kee sawal hai too sayed unke pass Mass communition kee koe bhee degree tak nahee hai. aur yeh Bureau chief ban rakhe hain.. Yahe too Sahara Pariwar hai jo aise logo ko Jhel raha hai.. Aur koe company hotee too sayed kab kaa bahar kar dete.

  7. PANCHI A

    January 27, 2011 at 3:48 am

    IT IS SHAMEFUL FOR THE JOURNAILIST COMMUNITY. BEING PREJUDICE FOR CASTE AND COMMUNITY IS A BLOT ON THE FACE OF JOURNALISM. CREDIBILTY IS THE PRANA OF THIS PROFESSION AND THOSE WHO ARE SPREADING CASTEISM AND PEROCHIALISM ARE KILLING THE PROFESSION. IT IS TRUE THAT MOST OF THE HINDI PAPERS IN DEHRADUN ARE SUFFERING FROM THESE AILMENTS. IF YOU HAVE GOOD CASTE COMBINATION YOU CAN FLOURISH LIKE ANYTHING. IN RASHTRIYA SAHARA ONE OF THE LOBBEIST OF PANDIT LOBBY IS 8TH PASS BUT HE IS ENJOYING THE STATUS OF A SENIOR JOURNALIST. HIS BUSINESS IS ALSO FLORISHING. UNFORTUNATELY NEWS PAPER LIKE DAINIK HINDUSTAN IS ALSO SUFFERING FROM THE SAME AILMENTS. THIS IS MOST UNFORTUNATE FOR UTTARAKHAND ALSO. BECAUSE THE ARE DEVIDING THE SOCIETY ON CASTE LINE.

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