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जीवंत हुईं पहली बोलती फिल्‍म ‘आलमआरा’ की यादें

: फिल्म के 80 वर्ष पूरे होने पर हुआ आयोजन : देश की पहली बोलती फिल्म ‘आलम-आरा’ के प्रदर्शन के 80 वर्ष पूरे होने पर छत्तीसगढ़ फिल्म संग्रहालय सोसाइटी की ओर से भिलाई में एक समारोह का आयोजन किया गया। इस दौरान ‘आलम-आरा’ के महत्व पर सिनेप्रेमियों ने चर्चा की। आमंत्रित अतिथि पद्मश्री जॉन मार्टिन नेलसन ने मुंबई फिल्म जगत से जुड़े़ अपने संस्मरण सुनाए वहीं स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से अब तक का एकमात्र छत्तीसगढ़ी गीत गवाने वाले निर्माता-निर्देशक मदन शर्मा ने भी इस संबंध में अपनी अनुभव साझा किए।

: फिल्म के 80 वर्ष पूरे होने पर हुआ आयोजन : देश की पहली बोलती फिल्म ‘आलम-आरा’ के प्रदर्शन के 80 वर्ष पूरे होने पर छत्तीसगढ़ फिल्म संग्रहालय सोसाइटी की ओर से भिलाई में एक समारोह का आयोजन किया गया। इस दौरान ‘आलम-आरा’ के महत्व पर सिनेप्रेमियों ने चर्चा की। आमंत्रित अतिथि पद्मश्री जॉन मार्टिन नेलसन ने मुंबई फिल्म जगत से जुड़े़ अपने संस्मरण सुनाए वहीं स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से अब तक का एकमात्र छत्तीसगढ़ी गीत गवाने वाले निर्माता-निर्देशक मदन शर्मा ने भी इस संबंध में अपनी अनुभव साझा किए।

ऐतिहासिक महत्व को भूल गए लोग : समारोह की शुरुआत में सोसाइटी के संस्थापक प्रो. शिवानंद कामड़े, अतिथिगण जॉन मार्टिन नेलसन और मदन शर्मा ने मां सरस्वती की प्रतिमा और भारतीय फिल्मों के जनक दादा साहेब फालके व ‘आलम-आरा’ के निर्माता अर्देशिर ईरानी की तस्वीरों पर माल्यार्पण किया। उद्बोधन की कड़ी में प्रो. कामड़े ने बताया कि 14 मार्च 1931 को मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा में दोपहर 3:30 बजे जब ‘आलम-आरा’ का पहला शो हुआ तो गिनती के लोग थिएटर में थे। उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि इस ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए देश भर में कोई बड़ा आयोजन नहीं हुआ। यहां तक कि फिल्मों की बदौलत जिन लोगों की रोजी-रोटी चलती है, ऐसे लोगों ने भी अपने कॉलम में ‘आलम-आरा’ पर एक शब्द नहीं लिखा। उन्होंने छत्तीसगढ़ फिल्म संग्रहालय सोसाइटी की गतिविधयों पर विस्तृत जानकारी दी। इस दौरान वरिष्ठ पत्रकार अरविंद सिंह ने पद्मश्री नेलसन व राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त पत्रकार प्रशांत कानस्कर ने मदन शर्मा का सम्‍मान किया।

इस तरह मुझे मिला संगीत की देवी का आशीर्वाद : स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से पहला और अब तक का एकमात्र छत्तीसगढ़ी गीत गवाने की उपलब्धि का जिक्र करते हुए निर्माता निर्देशक मदन शर्मा ने बताया कि फरवरी 2005 में उनका सपना सच हुआ। लेकिन इसके पहले एक लंबी ‘तपस्या’ करनी पड़ी। 1980 में जब लता दीदी खैरागढ़ के इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में डि.लिट की उपाधि लेने आईं थी तब यह तय था कि दीदी 3 गीत प्रस्तुत करेंगी, जिसमें तबले पर मुझे संगत करना है। लेकिन दीदी ने वहां गीत गाने से साफ इनकार कर दिया और मराठी गीत ‘मोगरा फुलेला’ की कुछ पंक्तियां गुनगुनाकर लौट गईं। तब से मेरा सपना था कि एक न एक दिन दीदी से छत्तीसगढ़ी गीत जरूर गवाउंगा। जब छत्तीसगढ़ी फिल्मों का दौर शुरू हुआ तो मैंने कोशिश शुरू की। खैरागढ़ के रामनाथ सिंह के माध्यम से संगीतकार कल्याण सेन से मुलाकात हुई। तब श्री सेन ने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा कि लता जी को मैं मौसी बोलता हूं और वह तुम्‍हारा गीत जरूर गाएंगी। लेकिन हुआ कुछ भी नहीं, मौसी बोलने वाले लोग पीछे रह गए और मुझे नए सिरे से कवायद शुरू करनी पड़ी।

उन्‍होंने बताया कि किसी माध्यम से अरेंजर ठाकुर सिंह से परिचय हुआ और उन्होंने कहा कि पहले सबसे छोटी दीदी (ऊषा मंगेशकर) को विश्वास में लो तब बड़ी दीदी तुम्‍हारा गीत गाने विचार कर सकती है। इस तरह तमाम कोशिशों के बाद अंतत: मेरी फिल्म ‘भकला’ के लिए विदाई गीत ‘छूट जाही अंगना अटारी’ गीत गाने लता दीदी तैयार हुई। इस गीत की रिहर्सल के दौरान एक मौका ऐसा भी आया जब खुद लता दीदी ने मुझ जैसे बेसुरे से कहा कि चल पहले गा के बता। इसके बाद जब लता दीदी रिहर्सल कर रही थी तो एक जगह ‘काशी के बम्‍हना बला दे’ पंक्ति में ‘बम्‍हना’ शब्द के उच्चारण में मुझे थोड़ी गड़बड़ लगी, ऐसे में मैंने अचानक टोक दिया कि- दीदी आपका सुर छूट रहा है। मेरी इस बात को लता दीदी जैसी महान कलाकार ने बुरा नहीं माना और हंसते हुए कहा- हां-रे, सर्दी की वजह से सुर छूट रहा है। उन्होंने कहा कि वह छत्तीसगढ़ महतारी की सेवा कर रहे हैं और वह चाहेंगे कि देहांत के उपरांत उन्हें मदन शर्मा छत्तीसगढिय़ा के नाम से जाना जाए।

आलमआरा

तब फिल्मों के कलाकार खुद आते थे अपने पोस्टर देखने : शिल्पकार पद्मश्री जॉन मार्टिन नेलसन ने इस अवसर पर मुंबई फिल्म जगत में बिताए अपने दिनों का जिक्र करते हुए कहा कि छोटी उम्र में वह कानपुर की पब्लिसिटी एजेंसी से जुड़ गए थे और इसके जरिए उन्हे पूरे भारत में फिल्मों के पोस्टर बनाने का मौका मिला। मुंबई का खास तौर पर जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वह दौर ऐसा था कि खुद फिल्म कलाकार हमारे स्टूडियो में आकर अपनी फिल्मों के पोस्टर निर्माण के काम की निगरानी करते थे। तब पोस्टर पूरी तरह हाथों से बनाए जाते थे। तब के बड़े पेंटरों में रामकुमार और जेपी सिंघल इन पोस्टरों की डिजाइन बनाया करते थे। नेलसन ने बताया कि 1973-74 में ‘जंजीर’ का पोस्टर बनाने के बाद वह भिलाई स्टील प्लांट में नौकरी मिल जाने की वजह से नंदिनी लौट गए। इस दौरान दल्ली राजहरा की पहली पोस्टिंग होने पर वहां की निर्माणाधीन आशा टॉकीज में भी ‘जंजीर’ का विशाल कट आउट बनाने का मौका मिला। नेलसन ने कहा कि इतनी लंबी कला यात्रा के बाद अब पद्मश्री भी मिल गई है, लेकिन इन सारी उपलब्धियों के मूल में पोस्टर निर्माण की वह कला ही है, जिसने उन्हें इतनी ऊंचाइयां दी।

भारत भवन जैसा संस्थान छत्तीसगढ़ में होगा : आयोजन में पद्मश्री जॉन मार्टिन नेलसन ने बताया कि छत्तीसगढ़ शासन ने उनके प्रयासों पर मुहर लगाते हुए राज्य में भारत भवन की तर्ज पर भव्य सांस्कृतिक संस्थान बनाने को मंजूरी दे दी है। छत्तीसगढ़ विधानसभा में संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल द्वारा इस आशय की घोषणा के बाद उम्‍मीद बंधी है कि इससे प्रदेश की सांस्कृतिक गरिमा के संरक्षण के लिए बेहतर वातावरण तैयार होगा। उन्होंने छत्तीसगढ़ फिल्म संग्रहालय सोसाइटी के प्रत्येक विशिष्ट आयोजन पर किसी एक महान फिल्मी हस्ती की प्रतिमा बनाकर देने की भी घोषणा की। श्री नेलसन ने इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि राजनांदगांव में जन्में निर्माता-निर्देशक और अभिनेता किशोर साहू को आज छत्तीसगढ़ में जानने वाला कोई नहीं है। उन्होंने उम्‍मीद जताई कि फिल्म संग्रहालय सोसाइटी के प्रयासों से ऐसे महान लोगों के कार्यों से लोगों को परिचित करवाया जाएगा।

पुस्तक का लोकार्पण, डाक्यूमेंट्री फिल्म का प्रदर्शन भी : आयोजन में ‘आलम-आरा’ के गायक मोहम्‍मद वज़ीर ख़ान पर केंद्रित प्रो. कामड़े की पुस्तक का लोकार्पण पद्मश्री जेएम नेलसन और छत्तीसगढ़ी फिल्म निर्माता-निर्देशक मदन शर्मा ने किया। इस मौके पर ‘आलम-आरा’ के स्थिर चित्रों के आधार पर तैयार की गई डाक्यूमेंट्री फिल्म का प्रदर्शन किया गया, वहीं 1973 में रिलीज हुई रंगीन फिल्म ‘आलम-आरा’ में उस गीत का अंश सुनाया गया जो मूलत: प्रथम बोलती फिल्म ‘आलम-आरा’ से लिया गया था। कार्यक्रम में प्रख्‍यात साहित्यकार बाबा नागार्जुन पर केंद्रित डाक्यूमेंट्री फिल्म का प्रदर्शन उनके जन्म शताब्दी वर्ष के मौके को रेखांकित करते हुए किया गया। ‘आलम-आरा’ फिल्म के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करने हुए इस आयोजन की सभी ने सराहना की।

कार्यक्रम का संचालन दिनेश सिंह तथा आभार प्रदर्शन भावना कामड़े ने किया। इस दौरान शेष नारायण शर्मा, रविशंकर सिंह, डॉ. नौशाद सिद्दीकी सब्र, नरेश कुमार विश्वकर्मा, सतीश श्रीवास्तव, जॉन एरिक नेलसन, कौशल उपाध्याय, शोभा भल्ला, एलिस नेलसन, राजेश अग्रवाल, प्रमोद साहू, दीपक रंजन दास, प्रशांत कानस्कर, जेएम तांडी, निखिल कुमार पाठक, अरविंद सिंह, निर्मल साहू, आरपी सिंह, गौकरण, हरप्रीत भाटिया, केके शुक्ला, रमेश गुप्ता, प्रकाश शर्मा, गौतम साहा, दीपक कुमार, कामयनी शुक्ला, शिव तिवारी, पूर्वा सरनाइक, विनित साहू, प्रियंका साहू, घृतिपति सरकार, दानिश अनवर, अंशुल तिवारी, प्रवीण पांडेय, सौरभ गुप्ता, शैलेंद्र खरे और नरेंद्र श्रीवास्तव सहित पत्रकारिता के छात्र-छात्राएं सहित अनेक लोग उपस्थित थे।

भिलाई से मोहम्‍मद जाकिर हुसैन की रिपोर्ट.

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