: आगरा घोषणा पत्र के 30 साल पूरे होने पर संगोष्ठी में डा. नंद किशोर त्रिखा का खुलासा : सभी वक्ताओं ने कहा- पत्रकार एथिकल रहेंगे तभी बचेगी विश्वसनीयता :
प्रेस और मीडिया की विश्वसनीयता कैसे कायम रहे। इसमें हो रहे क्षरण को कैसे रोका जाए? क्या मीडिया की विश्वनीयता घटने के लिए केवल पत्रकार जिम्मेदार हैं? ये मुद्दे यहां आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में उठे। संगोष्ठी का आयोजन यूपी जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) ने पत्रकारों के आगरा घोषणा पत्र को 30 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया था। संगोष्ठी में देश के दिग्गज पत्रकार इकट्ठे हुए थे।
उन्होंने विश्वसनीयता और मीडिया एथिक्स पर चर्चा की। सुझाव दिये और उपाय भी बताये कि प्रेस और मीडिया की विश्वसनीयता तभी कायम रह सकती है जब पत्रकार एथिकल रहें। संगोष्ठी की शुरुआत पत्रकारों के आगरा घोषणा पत्र के 12 प्वाइंट पढ़ने के साथ हुई। इसके बाद इस पर चर्चा को शुरू करते हुए वरिष्ठ पत्रकार प्रो.(डा.) नन्दकिशोर त्रिखा ने कहा कि तीस साल पहले आगरा घोषणा पत्र पत्रकारों के एथिक्स के लिए बनाया गया था। उस समय यह आशंका दिखने लगी

हरि जयसिंह
उन्होंने बताया कि दो साल पहले पत्रकारिता में हुए बदलावों पर एक सर्वे हुआ था। यह सर्वे 22 देशों में हुआ, इसमें भारत भी शामिल था। इस सर्वे का परिणाम यह था कि भारत का मीडिया विश्वसनीयता खो रहा है। भारत में 25 से 64 वर्ष आयु वर्ग के लोगों को शामिल कर किये गए इस सर्वे से पता चला कि टीवी पत्रकारिता की विश्वसनीयता दो साल पहले 68 प्रतिशत थी जो कि दो साल बाद गिरकर 38 प्रतिशत रह गई। समाचार पत्रों की विश्वसनीयता दो साल पहले 61 प्रतिशत थी जो कि अब गिरकर 40 प्रतिशत रह गई है। बिजनेस प्रेस की विश्वसनीयता 72 प्रतिशत से गिरकर 47 प्रतिशत रह गई है। इस स्थिति में हमें आत्मालोचना की जरूरत है।




सम्मेलन को संबोधित करते डा. नंद किशोर त्रिखा
एडिटर्स गिल्ड आफ इण्डिया के पूर्व चेयरमैन और ट्रिब्यून के पूर्व प्रधान सम्पादक ने हरि जयसिंह ने संगोष्ठी में पत्रकारों के एथिकल रहने की परिस्थितियों का विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की सेवा शर्तों के साथ जुड़ा है मीडिया एथिक्स। आज पत्रकारों का रोजगार सुरक्षित नहीं है। वर्किंग जर्नलिस्ट्स एक्ट भी रोजगार की सुरक्षा की गारण्टी नहीं देता। पत्रकार कैसे एथिकल रहेगा। आज मीडिया धंधा हो गया है। लेकिन धंधा ईमान बेचकर नहीं किया जा सकता। ऐसे में कोई अकेला पत्रकार कैसे लड़ाई लड़ सकता है। उन्होंने भी विश्वसनीयता के प्रश्न को मुख्य माना तथा कहा कि हमें

अच्युतानंद मिश्रा
संगोष्ठी में एनयूजे के पूर्व अध्यक्ष और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानन्द मिश्र ने पत्रकारिता की घटती विश्वसनीयता पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि हमें सोचना होगा कि यह कैसे बहाल हो। हमें संकल्प की भावना के साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करना होगा। श्री मिश्र ने बताया कि एनयूजे और उपजा का शानदार इतिहास रहा है। हमारी संस्था से जुडे लोग एथिकल रहे हैं। उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि आपातकाल में जब एक अन्य संस्था ने सरकार की प्रेस सेंसरशिप का समर्थन किया तो एनयूजे ने उसका कड़ा विरोध किया। हालांकि तत्कालीन अध्यक्ष स्व. हरिकृष्ण गौर को नेशनल हेराल्ड में एडिटर बनाने का प्रलोभन भी दिया गया था। इसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था।
श्री मिश्र ने यहां आयोजित एनयूजे के उस सम्मेलन से जुडी स्मृतियों का भी उल्लेख किया जिसमें 12 सूत्री आगरा घोषणा पत्र जारी किया गया था। उन्होंने इस अवसर पर विशेष रूप से अमर उजाला के संस्थापक संपादक स्व. डोरीलाल अग्रवाल का स्मरण किया। श्री मिश्र ने बताया कि स्व. अग्रवाल आयोजन में व्यवस्थाओं की भी चिंता करते थे और स्वयं ही इसकी रिपोर्टिंग भी करते थे। श्री मिश्र ने आगरा घोषणा पत्र के तीस साल पूरे होने पर इस सम्मेलन को आयोजित करने के लिए उपजा को बधाई दी। उन्होंने कहा कि उपजा ने ऐसे समय संगोष्ठी आयोजित की है जब इसकी प्रासंगिकता और अधिक बढ़ रही है।
एनयूजे के पूर्व अध्यक्ष पीके राय ने कहा कि पिछले लोकसभा चुनाव में हुईं घटनाएँ अत्यधिक चिंताजनक हैं। इस चुनाव में भुगतानशुदा खबरों का नया प्रयोग हुआ। प्रचार के विज्ञापन समाचारों के रूप में प्रकाशित हुए। उन्होंने कहा कि अभी हाल में मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा है कि एक राय के चुनाव के बाद प्रत्याशियों ने अपने खर्चों के ब्योरों में खबरों के भुगतान को भी व्यय के रूप में शामिल किया है।
युवा पत्रकार और न्यू मीडिया के क्षेत्र में कार्यरत भड़ास4मीडिया डाट काम के निदेशक व संपादक यशवन्त सिंह ने संगोष्ठी में परिचर्चा की दिशा को मोड़ते हुए कहा कि वरिष्ठों की बात से भयावहता दिखायी दे रही है, और स्थिति भयावह भी है लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। नए दौर में उम्मीद की नई किरणें भी सामने हैं। यह समय बदलाव का है। इसमें न्यू मीडिया और सूचना के अधिकार जैसे हथियारों के जरिए भरपूर प्रयोग किया जा सकता है और परंपरागत मीडिया के पतन से आई बुराइयों से निपटते हुए नए मानदंड बनाए जा सकते हैं। और, यह काम शुरू भी हो गया है। विकीलिक्स और जूलियन असांजे इसके उदाहरण हैं।
यशवन्त सिंह ने कहा कि हम युवाओं को एथिक्स परम्परा में मिलते हैं। हम जब पढ़ाई शुरू करते हैं तभी बताया

यशवंत सिंह
उन्होंने कहा कि मीडिया जबसे व्यवसाय बना तभी से यह धंधा बन गया। उन्होंने वेब जर्नलिम के रूप में नए मीडिया के उदय को सकारात्मक कदम बताया। उन्होंने कहा कि यह नया मीडिया अब मीडिया पर ही नजर रखता है। संगोष्ठी में प्रसार भारती के उपनिदेशक दुर्गविजय सिंह ने कहा कि सरकारी मीडिया ज्यादा एथिकल रहकर स्वतंत्र मीडिया के रूप में काम कर सकता है क्योंकि इसमें रोजगार सुरक्षा की गारण्टी रहती है। इसलिए सरकारी मीडिया ज्यादा एथिकल रह सकता है।

अशोक मलिक
संगोष्ठी में एनयूजे के अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी, वरिष्ठ पत्रकार शामिल हुए। दिल्ली से पीटीआई के मनोहर सिंह, हर्षवर्धन, चण्डीगढ़ से एनयूजे के उपाध्यक्ष और ट्रिब्यून के समाचार सम्पादक जितेन्द्र अवस्थी, चण्डीगढ़ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के महामंत्री अवतार सिंह, उपजा के प्रदेश उपाध्यक्ष राजीव शुक्ला उपस्थित थे। संगोष्ठी में अतिथियों का आभार उपजा के प्रदेश सचिव और कार्यक्रम संयोजक एके ताऊ और सहसंयोजक विवेक जैन ने व्यक्त किया। संगोष्ठी का संचालन उपजा के प्रदेश महामंत्री सर्वेश कुमार सिंह ने किया।












arjun kumar
February 8, 2011 at 12:25 pm
kis upja ki baat kar rahe hai jo 420 log chala rahe hai ve eticks ki baat kar rahe hai
BIHAR NEWS SE
February 24, 2011 at 4:40 am
EK MANCH KE NICHE AKAR HUM SARE PATRAKAR AA JAYE TO SAMBHAV HAI EK NITI KE TAHAT HAM KAAM KARE . KOI PAD YA APNE ORGNIGETION KE SPARDHA KE CHAKKAR ME HUM PATRAKARITA KE DAYARE SE BAHAR JAANE SE BACHE
mukesh
March 2, 2011 at 1:28 am
Recently there was a big rally at Ramlila maidan, about 1lac people gatherd there. All media was present there.How much importance given to this rally in media?
CHOTI CHOTI MEANINGLESS BAATO KO BREAKING NEWS BANANE WALI MEDIA KAISE NATIONAL IMPORTANCE KE BADE NEWS KO IGNORE KAR RAHA HAI?ARE THERE MAJORITY MEDIA PUBLISH PAID NEWS ONLY? OR ON PAY ROLL OF CENTRAL GOVERNMENT?