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दिल्ली के तिलस्म को ललकारता भयावह सच

: अफसरों द्वारा भगाए जाने के बाद भूख से बिलबिलाते बच्चों को न देख सकी, जान दे दी : एक तरफ वैभव का विराट सम्मेलन हो, उसमें गोते लगाते तमाम देशी-विदेशी मेहमान हों और दूसरी तरफ, भूख से बिलबिलाते बच्चे हों, बाढ़ में सब कुछ गंवा चुके यतीम यायावर हों, तो आप किसके साथ खड़े होंगे? यदि एक तरफ अरबों के खर्च पर बने ‘खेलों के गांव’ हों और दूसरी तरफ उजड़ गए गांवों के मलबे में सड़ी लाशों को नोंचते कौवे और गिद्ध हों तो आप किसे सच और किसे तिलस्म कहेंगे? यदि यह सब एक ही रष्‍ट्र-राज्य के भू-क्षेत्र में एक ही सरकार के शासन काल में घटने वाले नंगे सच हों, तो इसके लिए आप किसे जिम्मेदार ठहराएंगे? दो अक्टूबर को जब देश में अहिंसा, सत्य और सादगी के देवदूत महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती मनाई जा रही थी, तो दिल्ली में वैभव के विराट प्रदर्शन की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा था। उसी समय करीब सौ किलोमीटर दूर गढ़मुक्तेश्वर के पास एक महिला ने जंगल में जहर खाकर जान दे दी थी। वैसे जान देना इस व्यवस्था में बहुत सामान्य घटना हो गई है। इसलिए कुछ अपनों को छोड़कर अब इस पर लोगों का ध्यान भी नहीं जाता। इस घटना के साथ भी ऐसा ही हुआ। पर दरअसल, यह मौत मामूली नहीं।

: अफसरों द्वारा भगाए जाने के बाद भूख से बिलबिलाते बच्चों को न देख सकी, जान दे दी : एक तरफ वैभव का विराट सम्मेलन हो, उसमें गोते लगाते तमाम देशी-विदेशी मेहमान हों और दूसरी तरफ, भूख से बिलबिलाते बच्चे हों, बाढ़ में सब कुछ गंवा चुके यतीम यायावर हों, तो आप किसके साथ खड़े होंगे? यदि एक तरफ अरबों के खर्च पर बने ‘खेलों के गांव’ हों और दूसरी तरफ उजड़ गए गांवों के मलबे में सड़ी लाशों को नोंचते कौवे और गिद्ध हों तो आप किसे सच और किसे तिलस्म कहेंगे? यदि यह सब एक ही रष्‍ट्र-राज्य के भू-क्षेत्र में एक ही सरकार के शासन काल में घटने वाले नंगे सच हों, तो इसके लिए आप किसे जिम्मेदार ठहराएंगे? दो अक्टूबर को जब देश में अहिंसा, सत्य और सादगी के देवदूत महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती मनाई जा रही थी, तो दिल्ली में वैभव के विराट प्रदर्शन की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा था। उसी समय करीब सौ किलोमीटर दूर गढ़मुक्तेश्वर के पास एक महिला ने जंगल में जहर खाकर जान दे दी थी। वैसे जान देना इस व्यवस्था में बहुत सामान्य घटना हो गई है। इसलिए कुछ अपनों को छोड़कर अब इस पर लोगों का ध्यान भी नहीं जाता। इस घटना के साथ भी ऐसा ही हुआ। पर दरअसल, यह मौत मामूली नहीं।

यह मौत मामूली इस मायने में नहीं है कि इसके पीछे भूख, प्राकृतिक आपदा से उजड़ने वाले शरणार्थियों के प्रति शासन-प्रशासन की भूमिका, समाज और मीडिया का नजरिया पता चलता है। गंगानगर की रहने वाली इस महिला का घर-संसार बाढ़ ने लील लिया था। वह बच्चों व पति के साथ भोगल की धर्मशाला में शरणार्थी के रूप में दिन काट रही थी। एक रात अधिकारियों ने उन्हें धर्मशाला से भगा दिया। वह भूख से बिलबिलाते बच्चों की पीड़ा नहीं देख सकी और उसने जहर खाकर जान दे दी। जिस वक्त यह सब हो रहा था उसी समय दिल्ली के गेम्स विलेज में ऐतिहासिक जश्न के प्रदर्शन का रिहर्सल किया जा रहा था। करीब 70 हजार करोड़ रुपये खर्च कर कामनवेल्थ गेम्स का आयोजन किया गया है।

तीन अक्टूबर के उदघाटन शो ने भारत के वैभव की शान पूरी दुनिया में स्थापित कर दी है। अच्छा है। यह देश के लिए गौरव और सम्मान की बात है। हम बहुत उदार हैं। इस सात सौ अरब के खर्च में कितने अफसर, मंत्री, इंजीनियर, ठेकेदार मालामाल हो गए, शायद ही कोई इस पर शोध करने की जहमत उठाए। हम इसी में संतुष्ट हो लेते हैं कि अंत भला सो सब भला। मीडिया भी अब शायद ही किसी गहरी पड़ताल में जाए। पर इस बीच देश के तमाम हिस्सों में आई बाढ़, उससे उजड़े हजारों घरों के लाखों लोगों के आंसू पोंछने, उन्हें फिर से बसाने और उनके चेहरों पर खुशियों के दो पल लौटाने की चिंता क्या सरकार और उसके विशाल प्रशासनिक संजाल को है? नहीं। क्यों? यदि होती, तो भूखे बच्चों की पीड़ा और सब कुछ नष्ट हो जाने के दर्द झेलती महिला को मदद सांत्वना के दो बोल की जगह धर्मशाला से खदेड़ा न जाता। भूख से बिलखते विदर्भ, बुंदेलखंड, कालाहांडी के हजारों-लाखों परिवारों की अंतहीन पीड़ाएं किसी भी सरकार के लिए चिंता का विषय नहीं रह गई हैं। करोड़ों-अरबों की संपत्ति के मालिक अफसरों, मंत्रियों को सौ रुपये किलो की दाल महंगी नहीं लगती।

यह सवाल मामूली नहीं है कि जिस देश के गोदामों में लाखों टन अनाज बिना रखरखाव के सड़ जाए और वहीं लोग भूख से तड़पकर जान दे दें, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? कहीं सूखा, तो कहीं बाढ़ ने हजारों गांवों को उजाड़ दिया है। गांव के गांव खाली हो गए हैं। लाचार वृद्ध, बच्चे और अशक्त महिलाएं ही गांवों में बची हैं। काम की तलाश में लाखों-करोड़ों की आबादी दर-ब-दर हो गई है। पिछले एक दशक में देश में डेढ़ लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली। यह सरकारी आंकड़ा है, जो पूरे सच का एक छोटा सा टुकड़ा है। देश के कई हिस्सों का सामाजिक भूगोल बदल गया है। सामाजिक ताने-बाने का ऐसा विखंडन बंगाल के अकाल के समय देखने को मिलता है। पर यह सब कुछेक मौकों पर बहस-मुबाहिसे को छोड़कर कभी निर्णायक मुद्दा नहीं बन पाया। ऐसा क्यों होता है, चुनाव के समय भी देश की जनता अपने भाग्यविधाताओं से सवाल नहीं करती या कर पाने की हिम्मत नहीं रखती।

कभी-कभार मीडिया में हल्ला मचा, तो सदनों में विरोधी पक्ष के प्रतिनिधि सवाल उठा देते हैं। संबंधित विभाग के मंत्रियों की तरफ से सरकारी जवाब तैयार करके पटल पर पेश कर दिया जाता है। अंदर ही अंदर पुलिस प्रशासन को इशारा कर दिया जाता है कि भूख से मौतों का जिक्र जीडी में दर्ज न किया जाए। कम से कम उत्तर प्रदेश में तो पिछले 12 सालों से यही हो रहा है। मीडिया के पास सिवाय सरकारी आंकड़ों पर भरोसा करने के कोई रास्ता नहीं बचता कि वह सच तक पहुंच सके। गढ़ मुक्तेश्वर की घटना को भी पुलिस अफसर यही साबित करने में लगे हैं कि वह भूख और यंत्रणा से नहीं मरी, उसे सांप ने काट लिया था। ऐसा इसलिए कि सरकार के माथे पर बाढ़ पीड़ित के दुखद अंत का कलंक न लग सके।

राष्‍ट्रीय स्वाभिमान की विश्व में स्थापना हो, यह ठीक बात है। इसमें किसी भी राष्ट्र प्रेमी नागरिक को भला आपत्ति क्यों होगी? पर जब देश के कई कोनों में भूख और लाचारी से मौतों का करुण क्रंदन हो रहा हो, तब राजधानी में सात सौ अरब खर्च कर जश्न मनाना क्या किसी भयंकर अपराध से कम नहीं? अपने देश के लाखों भूखे बच्चों के आंसू पोंछने के बजाय 70 करोड़ के गुब्बारे को आसमान में लटकाकर विदेशी मेहमानों का मनोरंजन करना क्या मनुष्यता का मजाक उड़ाना नहीं है? भूख का उपोत्पाद है अपराध। यह सिद्धांत पूरा नहीं, तो आंशिक सच जरूर है। इसी सच का नतीजा है देश के कई राज्यों में पनप रहा नक्सलवाद। जिस देश के करोड़ों वासी रात-दिन भूख से उबरने का उपक्रम कर रहे हों, वह देश दुनिया के सभ्य समाज में अपना सिर ऊंचा नहीं कर सकता। थोथा वैभव देश को असली ताकत नहीं देगा। उसे पहले भूख के अभिशाप से मुक्त होना होगा।

बंशीधर मिश्र वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं, उनसे फोन नम्बर 09455763424 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. dharamkaram

    October 13, 2010 at 10:43 pm

    जीवंत है, भाई। बेहद कटु सत्य से साक्षात्कार करवाया आपने। अगर अपन लोग कुछ हेल्प कर सकते हैं, तो करेंगे। सरकार एवं सत्ताधारियों को ये सब नहीं दिखेगा। दिखता तो देश का परिदृश्य ही कुछ और होता। सच कहने और लिखने के लिए आभार।

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