: बेहद कम पैसे में ज्यादा से ज्यादा काम लिया जाता है यहां : फिर, दी गई क्वांटिटी पर क्वालिटी को लेकर सवाल उठाया जाता है : इसी कारण कहीं और नई नौकरी मिलते ही तुरंत आई-नेक्स्ट छोड़ना पसंद करते हैं युवा पत्रकार : आई-नेक्स्ट से क्यों लोग भाग जाते हैं, नई नौकरी मिलते ही. और, जब कहीं कुछ नहीं मिल रहा होता है तो आई-नेक्स्ट में ही नौकरी करने को क्यों प्रीफर करते हैं जर्नलिस्ट. ये दो ऐसे सवाल हैं जिससे आई-नेक्स्ट के कई वरिष्ठ लोग जूझ रहे हैं.
आई-नेक्स्ट के ये वरिष्ठ इन सवालों को अक्सर अपने कनिष्ठों के सामने उछालते रहते हैं. और, इसी सवाल में कनिष्ठों को उनका जवाब मिल जाता है कि यहां वादे को वादा न मानो, यहां नियम को नियम न मानो, यहां तेवर व सरोकार को तेवर व सरोकार न मानो. ये बच्चा अखबार ऐसे लोगों के हाथों में हैं जो सुबह कुछ, दोपहर को कुछ, शाम को कुछ और देर रात को कुछ सोचते, बताते, समझाते हैं. इसीलिए यहां काम करने वाले लोग भयानक कनफ्यूजन और डिप्रेसन में रहते हैं. इसी कारण नया मौका मिलते ही फौरन पगहा तुड़ाने को आतुर हो जाते हैं. आई-नेक्स्ट का जन्म जिस कानपुर में हुआ है, वहां लोग अघोषित तानाशाही के माहौल में जीते हैं. बेहद कम सेलरी पर अधिकतम काम और उत्कृष्टतम क्वालिटी की डिमांड करने वाले मैनेजर कम संपादक ने सभी का जीना मुहाल कर रखा है.
विनोद शुक्ला को आदर्श मानने वाले इस युवा मैनेजर टर्न्ड संपादक के पब्लिक बोल बड़े अनमोल होते हैं लेकिन जब इसके सामने पैसे, बारगेनिंग, पद, कंटेंट, नियुक्ति आदि की बात आती है तो बेहद नीचता और उग्रता पर उतारू हो जाता है. इसी कारण लोग इसे संपादक कम, बाजार का दोगला उपज ज्यादा मानते हैं जो किसी अन्य मैनेजर और संपादक से ज्यादा खतरनाक और ज्यादा कमीना होता है क्योंकि इसे मार्केट व कंटेंट, दोनों का बेहद उथला ज्ञान है, इसी कारण वह मालिकों की चाटुकारिता के बल पर और अपने से नीचे वालों का खून चूस-चूस कर अपना पद व अपना जलवा बरकरार रखने की कोशिश करता है.
इस काम में वो सफल भी है क्योंकि भारत बेरोजगारों की मंडी है और खुद जागरण ग्रुप हर साल कानपुर नोएडा के मीडिया स्कूलों को मिलाकर इतने मीडिया-बेरोजगार पैदा करता है कि कोई भी संस्थान काम करने वालों से वंचित नहीं रह सकता. सो, इसी बेरोजगारी की मजबूरी का फायदा ये आई-नेक्स्ट भी उठाता है. इसी से यहां छोड़ने और जाने वालों की रफ्तार बेहद ज्यादा है. आई-नेक्स्ट में संपादकीय समझ रखने वाला कोई वरिष्ठ आदमी लंबे समय तक नहीं टिक सकता. वही यहां टिकता है जिसे कहीं से नौकरी न मिली हो और न कहीं मिलती दिख रही हो. ऐसी बेचारगी की अवस्था में लोग यहां एक मैनेजर की चापलूसी करके काम करते रहते हैं और मन ही मन खुद की किस्मत को कोसते रहते हैं.
आज की ही बात लें. आई नेक्स्ट, कानपुर में चार लोगों के एक साथ इस्तीफे और अन्य तीन लोगों द्वारा नोटिस देने के बावजूद संस्थान का प्रबंधन उनके केवल छुट्टी पर जाने की ही बात स्वीकार रहा है. असलियत यह है कि अभिषेक त्रिपाठी, अचलेंद्र कटियार, शशि पांडेय और फोटोग्राफर मनीष के बाद मंगलवार सुबह ही सुबह लोकल के पूर्व चीफ मयंक शुक्ला ने भी गुडबाय कहने के उद्देश्य से लंबी छुट्टी की अर्जी लगा दी है. गौरतलब है कि चीफ रिपोर्टर मयंक शुक्ला को लोकल से हटाकर ‘वैड’ नाम की डेस्क में बैठा दिया गया, जहां पर उनके लिए कोई खास काम नहीं है.
वहीं डीएनई के पद पर प्रस्तावित उनका प्रमोशन भी अभी तक उन्हें नहीं दिया गया. इसी से खिन्न होकर उन्होंने संस्थान छोडने का निर्णय कर लिया. इतना ही नहीं, संस्थान के दो-तीन अन्य रिपोर्टर भी दूसरे अखबारों के अधिकारियों से लगतार संपर्क में हैं. गौरतलब है कि ये वो अखबार है जहां पर जनसंदेश में लोगों के चले जाने से कई स्थान रिक्त हो गए हैं, या होने वाले हैं. खासबात ये कि आई नेक्स्ट में तो लोकल डेस्क पूरी तरह साफ हो जाने से परेशान अधिकारियों ने हर तरीके से दबाव बनाकर घर बैठ गए सीनियर सब एडिटर विजय पांडे को आफिस बुलवाया, वर्ना नौबत ये थी कि एनई, डीएनई को बैठकर खुद सारी खबरों को एडिट कर पन्नों पर लगवाना पड़ता.
गौरतलब है कि जनसंदेश में अनूप बाजपेयी के आने की खबर से ही कई युवा पत्रकार इस नए बैनर की तरफ आकृष्ट हो रहे हैं. इसके उदाहरण हिंदुस्तान के योगेश त्रिपाठी, अभिषेक त्रिपाठी और अमर उजाला के गौरव शुक्ला हैं जो अनूप के साथ, एक आवाज पर तुरंत जनसंदेश ज्वाइन कर लिए. यही नहीं पुख्ता सूत्रो के अनुसार हिंदुस्तान, अमर उजाला और एक अंग्रेजी अखबार के कई युवा पत्रकार लगातार अनूप बाजपेयी के संपर्क में हैं. इस स्थिति को लेकर बाकी अखबारों के अधिकारी काफी भयग्रस्त हैं और लगतार अपने इंप्लॉइज को संदेह की नजरों से देख रहे हैं. सूत्रो के अनुसार हिंदुस्तान और उजाला के टॉप रिपोर्टरों में से दो को जनसंदेश का ऑफर है, जिसे इन लीडिंग रिपोर्टरों ने स्वीकार भी कर लिया हे, और 48 घंटों के अंदर अपने-अपने संस्थानों से इस्तीफा दे सकते हैं.
कानपुर से एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए मेल को संपादित और री-राइट कर यहां प्रकाशित किया गया है. कई आपत्तिजनक अंशों को हटा दिया गया है. अगर किसी को इस पत्र में लिखे तथ्य पर कोई आपत्ति या कमी-बेसी नजर आए तो अपनी बात नीचे दिए गए कमेंट बाक्स के जरिए कह सकता है.












gaurav
March 8, 2011 at 5:24 pm
लेकिन आई नेक्स्ट के डीऍनई ऍनई को कौन लेगा। ये तो सभी तेल मालिश करने वाले लोग हैं।
gaurav
March 8, 2011 at 5:44 pm
लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि यहां के ऍनई डीऍनई कहां जाकर खपेंगे। क्यों कि इन्हें तो तेल मालिश करना या बास को कविता सुनाकर प्रसन्न करना ही आता है। मेरा मानना है कि यहां इन जैसे लोगों को ही पसंद किया जाता है। काम कोई करे और फायदा इन ऊपर बैठे इन चंद तेलकों को मिलता है। अरे मेरे अन्य दोस्तों बड़ी सीट चाहिऍ तो इन जैसा तो बनना ही पड़ेगा।
subodh
March 8, 2011 at 6:35 pm
ramji will play good jurnalism in jansandesh time. he was a good dynamic person in kanpur. he lose the kampumail in kanpur
MANOJ JAIN
March 9, 2011 at 11:42 am
YE BAAT SAMAJHA MAI NAHI AA RAHI KI LADKIYA I-NEXT MAI JANO KO KYO ATUR RAHATI HAI.
MT
March 10, 2011 at 7:57 am
ye bilkul satya hai ki yaha lambe samay tak wahi naukri karta hai jise kahi kaam hi nai milta. jaise lucknow me rajeev ojha, sanjeev, ajendra rajan, shabi haidar pramukh dalal hai. i next band hua to ye sab meerabai marg pe hi bheek magenge, kameene.
rakesh choudhary
March 10, 2011 at 3:00 pm
bhaio koi job ho to btao yar bdi parysaani hai
kahin break to mile.ye fresher ka daag kab tak rehega
one sub editor
March 11, 2011 at 5:50 pm
sahi kaha hai..alok sanwal ne inext barbad kar rakha hai..newspaper nahi advt ki agency hai…alok sanwal k dabav mai he sharmishtha sharma rahti hai. sale ko khud to khabar ki samajh nahi hai khak bhar b, sharmishtha sharma ko b kam nahi karne deta….
indu
March 11, 2011 at 5:52 pm
अब यहां के क्या हाल बयां करूं, वास्तविकता तो यह है कि यहां जितने सीनियर बैठे हैं उनमें से किसी में इतनी कुव्वत नहीं है कि अकेले दम पर एक पेज बना सकें, पेज तो छोड़ों न्यूज को एडिट करने और हेडिंग लगाने की भी सहुर नहीं है, इन्हें सिर्फ शोर मचा कर यह दिखाना आता है कि देखो हम काम कर रहे हैं और बॉस को अपने आने जाने का मैसेज करना, बॉस गुड मार्निंग बॉस गुड इवनिंग, बॉस पॉटी गए कि नहीं नहीं लगी तो मैं आउं कुछ मदद करने,
यहां की पत्रकारिता देखकर तो मन उब गया, जो सैलरी जागरण अपने एम्प्लॉइज को दे रहा है उससे ज्यादा पैसा तो नरेगा में रजिस्टर बेरोजगार को मिल जाता होगा, समझ्ा में नहीं आता ये सरकार अंधी है या ऐसा कोई नियम कानून ही नहीं है जो इन संस्थानों की हरामखोरी को रोक सके। अगर आवाज उठाने वालों को पेट भर खाना ही नहीं मिलेगा तो वह आवाज क्या उठाएंगे। िफर तो यह पेपर सि फ विज्ञापन का पोस्टर बन के रह जाएंगे