कल तक ग्वालियर के पत्रकार ऐंठे-ऐंठे घूमते थे। उनके ऐंठने की वजह भी उनके हिसाब से उचित ही थी। ग्वालियर में कुकरमुत्ते की तरह अखबार पैदा हो रहे थे। चिटफंडिए जनता से ऐंठी गई दौलत के बूते अपनी इज्जत बचाने के लिए मीडिया में मेढक की तरह कूद रहे थे। चिटफंडियों की इस मेढक कूद को देख पत्रकारों के दिमाग भी सातवें आसमान पर थे। जिनकी थोड़ी भी पूछ-परख थी, वे कलम की घिसाई की लंबी-चौड़ी फीस मांग रहे थे।
चिटफंडिए उन्हें मुंह-मांगी दे भी रहे थे क्योंकि उन्हें लगता था कि कलम के कारीगर ही मौका लगने पर उनकी इज्जत बचाएंगे? पर ऐसा हुआ नहीं। जिला प्रशासन ने चिटफंडियों के खिलाफ फंसा कसना क्या शुरू किया, ग्वालियर में बेरोजगार पत्रकारों की फौज रातों-रात सड़क पर आ गई। एक-एक करके चिटफंडियों द्वारा खोले गए अखबार बंद हो रहे हैं। इस सीरीज में ताजा नाम जुड़ा है बीपीएन टाइम्स का। बीपीएन टाइम्स ग्वालियर में पैदा हुआ और देखते ही देखते फाइल कापियों का प्रकाशन करते हुए यह यह झांसी-आगरा-इंदौर-रायपुर-बिलासपुर पहुंच गया।
दिल्ली में कहने को इसका कॉरपोरेट दफ्तर खुल गया। लेकिन अब इसके तेजी से बढ़ते कदमों पर प्रशासन ने बेडिय़ां कस दी हैं। जिला दंडाधिकारी ग्वालियर ने एक आदेश जारी कर कहा है कि बीपीएन टाइम्स के प्रिंटिंग स्टेशन पर ताला बंदी कर दी जाए। यह फैसला इसलिए लिया गया है क्योंकि प्रशासन और पुलिस को तमाम प्रयासों के बाद भी बीपीएन के मालिक मिल नहीं रहे हैं और यह जनता के करोड़ों रुपए दबाए बैठे हैं। बीपीएन टाइम्स पर ताले लटकने के साथ ही इस एडीशन के ग्वालियर संस्करण से जुड़े एक सैकड़ा से अधिक लोग सड़क पर आ गए।
इससे पहले परिवार टुडे अखबार का भी यही हश्र हो चुका है। यह अखबार भी चिटफंडिए राकेश नरवरिया का था। वन समुदाय वाले ग्वालियर में लॉचिंग के साथ ही बोरिया बिस्तर समेट चुके हैं। वहीं मोटी कमाई करने के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कूदा केएमजे न्यूज चैनल का मालिक संतोषी लाल राठौर भी एक सैकड़ा से अधिक मीडिया कर्मियों को सड़क पर छोड़कर खुद भूमिगत हो गया है। इसके पीछे भी पुलिस पड़ी है और इसके खिलाफ कई मामले थानों में दर्ज हैं। इसी तरह कुछ माह पहले ग्वालियर में खुले राष्ट्रीय हिंदी मेल अपनी ही गत के चलते बंद हो गया।
एक-एक करके पांच संस्थानों पर ताले लटकने से चार से पांच सैकड़ा मीडिया कर्मियों के सामने घर में चूल्हा चलाने की समस्या पैदा हो गई है। एक साथ जब ग्वालियर के पत्रकारों को जब मुंह मांगे दाम मिल रहे थे तब सभी गिल्ल थे। चेहरे खिले हुए थे पर आज इनके चेहरों पर उदासी लटकी हुई है। एक साथ ग्वालियर में बेरोजगारों की फौज सड़क पर आ गई है। इसका फायदा वे मीडिया संस्थान उठा रहे हैं जो अभी तक यह सोच-सोचकर परेशान थे कि फलां चला गया तो फिर काम कैसे चलेगा। यही मालिक अब अपने स्टॉफ के कान उमेठते हुए कह रहे हैं कि काम करना है करो, वरना हमारे पास बहुत आप्शन हैं और आपके आप्शन पर धीरे-धीरे तालाबंदी होती जा रही है।












Raghav gwalior
July 23, 2011 at 2:25 pm
Ye To Hona Hi Tha ,,,,,,,,,, Bakare Ki Amma Kab Tak Khair Manati,,,,,,,,
sanjay thakur bansal news
July 23, 2011 at 3:37 pm
aajkal in tuchhe logo ne media me aakar puri media jaat ko badnaam kar diya hai……lekin iska karan bhi hamari RNI Depart. ki galat neeti hai jo…bina kisi Qualification ke hi ya koi shart ke farji logo ko paper ka licence de deta hai………ab media me deegree walon ki koi ahmiyat hi nai rahi hai………..
Dr Raghvendra Singh Tomar
July 24, 2011 at 2:25 pm
bpn tiems to humare mandsaur mai bhi chal raha hai par yaha par koi karyawahi nahi hui yaha to eis kratya samne nahi aaya hai abhi tak.
Girrajkisorsharma
July 26, 2011 at 9:50 am
bpn.times..fir..shuru..hoga..or..fir..apne..shikhar.ko..payega.
B4M
July 26, 2011 at 11:53 am
श्री यशवंत जी, सादर प्रणाम।
भड़ास डॉट कॉम पर 23 जुलाई को चिटफंडियों के अखबारों को लेकर एक समाचार लिखा गया है। इस समाचार में ग्वालियर से प्रकाशित राष्ट्रीय हिन्दीमेल का उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि यह समाचार पत्र बंद हो गया है, जबकि हकीकत यह है कि राष्ट्रीय हिन्दी मेल का ग्वालियर से फरवरी माह में प्रकाशन शुरू किया गया है, तब से यह अनवरत् प्रकाशित हो रहा है। कृपया राष्ट्रीय हिन्दी मेल के सम्बन्ध में अपनी जानकारी दुरुस्त कर लें और भविष्य में इस समाचार पत्र के बारे में कुछ भी लिखने पर हमारा पक्ष जरूर ले लें।
सहयोग की अपेक्षा सहित
उदित नारायण
प्रकाशक
राष्ट्रीय हिन्दी मेल, ग्वालियर
7697925098
kapil
July 27, 2011 at 12:08 pm
Bahut khub ye to ab auron ka number lagega.