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पूरा ‘कलक्टरगंज’ जीत लिया है यार

[caption id="attachment_18133" align="alignleft" width="122"]स्वर्गीय नंदनजीस्वर्गीय नंदनजी[/caption]: मौत से डर नहीं था नंदन जी को : वे कहने लगे थे- मुझे अब और क्यों जीने की तमन्ना पालनी चाहिये? अटक-अटककर मरियल सी जिंदगी ढोने से अच्छा है, चलते-फिरते अलविदा का समय आ जाए : नंदन जी कहते थे, याद रखो जिंदगी में जितने हुनर सीख सको तो सीख लो। सीखने की कोई उम्र नहीं होती। शायद यही जज्बा रहा होगा कि वे एक ‘ट्रेनी सब एडीटर’ की टिप्पणी पर अपने आलेख को झटपट बदल देते थे।

स्वर्गीय नंदनजी

स्वर्गीय नंदनजी

: मौत से डर नहीं था नंदन जी को : वे कहने लगे थे- मुझे अब और क्यों जीने की तमन्ना पालनी चाहिये? अटक-अटककर मरियल सी जिंदगी ढोने से अच्छा है, चलते-फिरते अलविदा का समय आ जाए : नंदन जी कहते थे, याद रखो जिंदगी में जितने हुनर सीख सको तो सीख लो। सीखने की कोई उम्र नहीं होती। शायद यही जज्बा रहा होगा कि वे एक ‘ट्रेनी सब एडीटर’ की टिप्पणी पर अपने आलेख को झटपट बदल देते थे।

और फिर कहते… ”हमें ‘यंगिस्तान’ के नजरिए से ही रहना आना चाहिए। तभी जमाने के साथ ठीक से चल पाएंगे। वर्ना जमाना हमें बेगाना बना देगा, प्यारे।” बीते शनिवार को सुबह-सुबह मोबाइल में नजर डाली तो उसमें से एक अनपढ़ा एसएमएस इंतजार कर रहा था। संदेश खोला तो जैसे करेंट सा लगा। नीचे से ऊपर तक सिहरन सी महसूस हुई। मित्र विनोद अग्निहोत्री का संदेश था, तड़के तीन बजे नंदन जी (डॉ. कन्हैया लाल) नहीं रहे। वे उम्र के जिस पड़ाव (78 वर्ष) पर पहुंचे थे। उसमें अंतिम विदाई का संदेश एकदम अकल्पनीय भी नहीं था। यूं भी पिछले एक साल से वे नई-नई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे। हार न मानना उनके स्वभाव का स्थाई भाव बन गया था। लेकिन इस बार की बीमारी ने उन्हें कुछ ज्यादा झकझोर डाला था। वे कहने लगे थे कि वीरेंद्र, मुझे अब और क्यों जीने की तमन्ना पालनी चाहिये? अटक-अटककर मरियल सी जिंदगी ढोने से अच्छा है, चलते-फिरते अलविदा का समय आ जाए। जिंदगी से काई शिकायत नहीं रही। जीवन का हर रंग देखा है। भरपूर हिस्सेदारी की है। कनपुरिया मुहावरे में कहूं तो पूरा ‘कलक्टरगंज’ को जीत लिया है यार। अब और क्या चाहिए। मेरे पास याद करने के लिए तुम जैसे तमाम अपनों का विराट संसार है। प्यार की इतनी बड़ी थाती मिली है। अब और क्या चाहिए?

करीब तीन महीने पहले की बात है। लंबे समय बाद मुलाकात हुई थी। शायद ऐसा पहली बार हुआ था कि जब उन्होंने देश, दुनिया और राजनीति की हलचलों की ज्यादा चर्चा नहीं की थी। एक तरह से अपनों का साक्षात्कार करते नजर आये थे। अब और क्या चाहिए? उनके इस सवाल का जवाब मैं नहीं दे पाया था। यही कह पाया था कि आप तो हार न मानने वाले शख्स हैं। फिर इतनी जल्दी समर्पण की मुद्रा में क्यों आ गये? इस टिप्पणी पर उन्होंने जोर का ठहाका लगाया । इससे मैं कुछ अचकचा गया। लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं कर बैठा। शायद अब तक उन्होंने मेरे मन का द्वंद्व  पढ़ लिया था। बोले, तुम्हारी जगह मैं भी होता तो ऐसी ही दिलासा दिलाता। लेकिन जान लो, यही कि मुझे मौत से डर नहीं लगता। हां, अब से दस-बीस साल पहले वह मेरे पास दस्तक देती तो कह देता, अरे कुछ घूम-टहल आओ। अभी कई और जरूरी काम निपटाने हैं। लेकिन यहां तो अपन जरूरी के अलावा एडीशनल काम कर पाने का लुत्फ उठा चुके हैं। ऐसे में अब बहुत तमन्ना तो नहीं बची।

नंदन जी की सबसे बड़ी पीड़ा थी कि वे अब पहले की तरह विचरण नहीं कर पाते। शारीरिक दिक्कतों की वजह से उन संगोष्ठियों का भी हिस्सा नहीं बन पाते जिनसे उन्हें बौद्धिक ‘आक्सीजन’ मिलती आयी है। इधर सप्ताह में उन्हें तीन बार डाइलेसिस करानी पड़ती थी। कह रहे थे दो दिन तक तो बर्दाश्त हो रहा था। लेकिन अब लगता है कि बीमारियों के कैदखाने का कैदी हूं। ये भी क्या जिंदगी हुई कि शख्स अपनी ही मजबूरियों के बियाबान में भटक जाए? काफी देर वे अपनी कसक में अटके नजर आये थे। बात घुमाने के लिये मैंने कई प्रसंगों के तार छेड़ने चाहे। लेकिन, वे घूम फिरकर उस दिन अपने में ही अटके रहने की जिद पकड़ बैठे थे।

उसी दिन मुझे अहसास हो गया था कि अब उनके अंदर ज्यादा जीने की जिजीविषा नहीं रही क्योंकि उन्हें लग गया था कि उन्होंने अपनी पारी भरपूर खेल ली।  कह रहे थे कुछ किताबों के खण्ड अधूरे हैं। मैंने पूछा, आत्मकथा का तीसरा खण्ड कितना हुआ? बोले, कुछ लिखा है। कुछ छोड़ दिया है। झूठ लिखना नहीं चाहता। सच इतना खरा है कि पढ़कर बहुतों के ‘फफोले’ पड़ जाएंगे। इस हिस्से को लिखते हुए सचमुच रोज अपने से युद्ध करना पड़ता है। एक बार आता है कि लोग इस आत्मकथा के जरिये तमाम बहुरंगे चेहरों का सच जान ले। इसमें क्या बुराई है? इसी जज्बे के साथ भूले-बिसरे संस्मरणों को याद कर बैठता हूं। जिन्हें सालों-साल नहीं दुखाया, उन्हें क्यों पीड़ा दूं। पता नहीं कितना जीना है। मैं समझ नहीं पा रहा था कि नंदन जी आज घूम-घूमकर जीने मरने के प्रसंग पर क्यों आ जाते हैं। कुछ छणों के लिए वे एकदम चुप हो गए।

फिर बोले, ये राहुल गांधी में कितना माद्दा है? मैं कुछ कहता, इसके पहले ही बोले, मुझे तो इस युवा गांधी में पिता (राजीव गांधी) से ज्यादा दम नजर आता है। राजीव ने कभी आम आदमी के लिए ऐसा जुनून तो नहीं दिखाया। ये महाशय तो लगता है कि दस जनपथ के राजपथ से नहीं किसी कम्यून से निकले कामरेड हों। कई बार इस शख्स में सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ एक आग दिखाई पड़ती है। इस मुद्दे पर काफी देर चर्चा हुई। फिर बोले, जब राजीव सत्ता में आए थे तो मीडिया ने उन्हें मिस्टर क्लीन का खिलाफ दे डाला था। उसी मीडिया ने बोफोर्स मामले में उनकी धुलाई भी कर दी थी। क्योंकि राजीव गांधी भले क्लीन रहे हों लेकिन उनकी मंडली के लोगों के बारे में यह नहीं कहा जा सकता था।

फतेहपुर के एक छोटे से गांव से नंदन जी ने अपनी जीवन यात्रा शुरू की थी। ट्यूशन पढ़ाकर उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। इसके लिए संघर्ष किया,  तमाम पापड़ भी बेले। हिंदी के प्राध्यापक बने। शांति और सम्मान की जिंदगी जीने का अवसर मिल गया था, लेकिन उन्हें मंथर गति की जिंदगी रास नहीं आती थी। धर्मयुग, पराग, सारिका, दिनमान, नवभारत टाइम्स व संडे मेल जैसी पत्र-पत्रिकाओं के संपादन के दौर में उन्होंने तमाम नये प्रयोग करने की कोशिश की। दशकों तक वे राजनीति के तमाम शिखर पुरुषों के करीब भी रहे हैं। ऐसे लोगों में कई दलों के नेता रहे। वे कहते थे, पत्रकार के नाते सकारात्मक आलोचना ठीक है, लेकिन कलम को जल्लाद का  चाकू बनाना भी ठीक नहीं है। एक दौर में उनके बारे में प्रचार किया गया था कि वे ‘कांग्रेसी’ हैं। क्योंकि राजीव गांधी से लेकर अरुण नेहरू जैसे ‘पावर हाउसों’ के करीब  हो गए थे। लेकिन, वे कांग्रेस के खास प्रतिद्वंद्वी अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं से भी खास नजदीकी रखते थे।

नंदन जी को हमेशा यह बात खलती रही कि उन्हें बहुतों ने गलत समझा। कभी किसी ने कहा, कांग्रेसी हैं तो कभी किसी ने कहा की हिंदुत्ववादियों से खूब छनती है। अयोध्या आंदोलन के दौरान उन्होंने हिंदुत्ववादियों को अपनी कलम से जमकर फटकार लगाई तो कहा गया नंदन जी पत्रकार ही नहीं हैं। वे तो कवि और लेखक हैं। नंदन जी ऐसे आलोचकों को खूब मजे लेकर याद करते थे। उन्हें भारत सरकार ने ‘पद्म श्री’ से नवाजा, तो बोले, मुझे ये मिला तो खुश हूं, लेकिन इस बात का रंज भी है कि इस सम्मान के कई और पात्र हैं, जिन्हें वर्षों से वंचित रखा गया है। ‘संडे मेल’ के दौर से मुझे नंदन का साथ मिला। ‘इन टीवी न्यूज’ तक आते-आते वे सहज रिटायरमेंट की उम्र पूरी कर चुके थे। लेकिन, कभी-कभी चीजें सीखने का उनका जुनून गजब का था। उम्र के इस पड़ाव में टीवी कैमरा का प्रशिक्षण लेने विदेश चले गये। पूछा, कि आपको इसकी क्या जरूरत थी? बोले, याद रखो, जिंदगी में जितने

बीरेंद्र सेंगर

बीरेंद्र सेंगर

हुनर सीख सको, सीख लो। सीखने की कोई उम्र नहीं होती। शायद यही कारण रहा होगा कि वे एक ‘ट्रेनी सब एडीटर’ की टिप्पणी पर अपने आलेख को झटपट बदल देते थे। कहते हमें ‘यंगिस्तान’ के नजरिए से ही रहना आना चाहिए। तभी जमाने के साथ ठीक से चल पाएंगे। वर्ना जमाना हमें बेगाना बना देगा, प्यारे।

लेखक वीरेन्द्र सेंगर दिल्ली के जाने-माने पत्रकार हैं. उनकी कन्हैया लाल नंदन जी से गहरी और लम्बी दोस्ती रही है. उनसे फोन नंबर 09810132427 पर संपर्क किया जा सकता है.

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