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साहित्य

श्रीलाल शुक्ल की बेहद खराब तबियत नेशनल मीडिया के लिए खबर नहीं है

मुझे कभी कभी शर्म आती है। इस पेशे पर। अपने दोस्तों पर। लोगों पर। प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल कई दिनों से गम्भीर रूप से बीमार हैं। उनको अस्पताल में भर्ती कराया गया है। डॉक्टरों के मुताबिक उनकी हालत नाजुक है। ऐसे महान साहित्यकार की गंभीर तबियत खराब है, लेकिन अभी तक यह नेशनल मीडिया के लिए महत्वपूर्ण नहीं बन पाई है।

मुझे कभी कभी शर्म आती है। इस पेशे पर। अपने दोस्तों पर। लोगों पर। प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल कई दिनों से गम्भीर रूप से बीमार हैं। उनको अस्पताल में भर्ती कराया गया है। डॉक्टरों के मुताबिक उनकी हालत नाजुक है। ऐसे महान साहित्यकार की गंभीर तबियत खराब है, लेकिन अभी तक यह नेशनल मीडिया के लिए महत्वपूर्ण नहीं बन पाई है।

भला बने भी कैसे इस स्टोरी पर टीआरपी (टीवी रेटिंग) और पेजव्यू (वेबसाइट में खबरों की रेटिंग) कम आने का जो खतरा है। मेरे हर मीडियाकर्मी मित्र को पता है कि ऐसी खबरें मुनाफेदार नहीं होती। चलिए मान लिया कि मीडिया को इस खबर से मुनाफा नहीं था इसलिए इसका महत्व नहीं दिया। लेकिन उन लोगों का क्या जो मीडिया से जुड़े नहीं हैं। जो खबरें पढ़ते और सुनते हैं। आखिरकार यही लोग तो तय करते हैं कि किसी खबर की टीआरपी या पेजव्यू क्या होगा।

मैंने सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर इस संबंध में एक पोस्ट डाली। लिखा कि, ”प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल गम्भीर रूप से बीमार है। उनको लखनऊ के गोमतीनगर स्थित सहारा अस्पताल में भर्ती कराया गया है। खबर है कि उनको साहित्य जगत का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार आज अस्पताल में ही दिया जाएगा। डॉक्टरों का कहना है कि उनकी हालत नाजुक है। आइए हम सब मिलकर उनके स्वास्थ्य लाभ की कामना करें; क्योंकि दुआएं दवा से ज्यादा कारगर होती हैं।” करीब चार घंटे बीत गए, लेकिन एक भी व्यक्ति ने इस पोस्ट पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिया। मुझे बहुत ग्लानि हुई।

मैं सोचने लगा कि इतना प्रखर साहित्यकार जिसे अस्पताल में ज्ञानपीठ पुरस्कार जैसा साहित्य जगत का सर्वोच्च सम्मान मिलने वाला है। उससे संबंधित पोस्ट पर एक भी साथी ने कमेंट करना मुनासिब क्यों नहीं समझा। आखिरकार जो लोग खुद को साहित्यकार या साहित्य का प्रेमी समझते हैं वो इतना संवेदना शून्य कैसे हो गए हैं। जबकि मेरे फेसबुक फ्रेंड लिस्ट में कई साहित्कार और साहित्य प्रेमी मित्र भी हैं।

खैर, अपनी पहली पोस्ट के चार घंटे के बाद मुझे रहा नहीं गया तो मैने एक और पोस्ट डाली। इंतजार किया। लगा कि इस बार तो लोगों की प्रतिक्रिया जरूर मिलेगी। पर निराशा हाथ लगी। मेरा एक इंजीनियर मित्र ने इसके लिए अफसोस जाहिर किया, लेकिन और किसी भी मित्र का एक भी कमेंट नहीं आया। यह भी तय था कि यदि पूनम पांडे से संबंधित कोई पोस्ट डाला होता तो कमेंट्स की भरमार हो जाती। बता दूं कि पूनम पांडे के एक वीडियो को एक हफ्ते में 70 लाख लोगों ने देखा था।

भई, अब मैं इतना समझ चुका हूं कि ऐसे मुद्दों पर हमारे मीडियाकर्मी मित्रों से ज्यादा वो लोग दोषी हैं, जो खुद को संवेदनशील होने का ढोंग करते हैं। यदि आप ऐसी खबरों को पढ़ना शुरू कर देते हैं। जो निश्चित ही टीआरपी और पेजव्यू अधिक रहेंगे। ऐसे में पत्रकारिता और ड्यूटी दोनों हो जाएगी। बताता चलूं कि श्रीलाल शुक्ल को सांस लेने में तकलीफ की शिकायत है। उनके फेफड़े में संक्रमण है। फिलहाल वह आईसीयू में भर्ती हैं। उनको 20 सितम्बर को वर्ष 2009 के लिए 45वां ज्ञानपीठ पुरस्कार कहानीकार अमरकांत के साथ संयुक्त रूप से देने की घोषणा की गई थी।

उनके लिए जिन्हें नहीं पता कि कौन है श्रीलाल शुक्ल : हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल का जन्म उत्तर प्रदेश में सन् 1925 में हुआ था। उनका पहला प्रकाशित उपन्यास ‘सूनी घाटी का सूरज’ (1957) तथा पहला प्रकाशित व्यंग ‘अंगद का पांव’ (1958) है। स्वतंत्रता के बाद के भारत के ग्रामीण जीवन की मूल्यहीनता को परत दर परत उघाड़ने वाले उपन्यास ‘राग दरबारी’ (1968) के लिये उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके इस उपन्यास पर एक दूरदर्शन-धारावाहिक का निर्माण भी हुआ। श्री शुक्ल को भारत सरकार ने 2008 मे पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया है।

उपन्यास :  सूनी घाटी का सूरज · अज्ञातवास · रागदरबारी · आदमी का ज़हर · सीमाएँ टूटती हैं। कहानी संग्रह:  यह घर मेरा नहीं है · सुरक्षा तथा अन्य कहानियां · इस उम्र में। व्यंग्य संग्रह:  अंगद का पांव · यहां से वहां · मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनायें · उमरावनगर में कुछ दिन · कुछ जमीन पर कुछ हवा में · आओ बैठ लें कुछ देर। आलोचना: अज्ञेय: कुछ राग और कुछ रंग।

लेखक मुकेश कुमार ‘गजेंद्र’ दैनिक भास्‍कर से जुड़े हुए हैं. यह लेख उनके ब्‍लाग चौथा खंभा से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

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0 Comments

  1. prashant

    October 18, 2011 at 3:57 pm

    main to yahi dua karoonga ki raag darbaari ke rachayita jald swasth hon…

  2. Rajesh Tripathi

    October 18, 2011 at 4:26 pm

    Priya Mukesh Bhai shreshtha, jeevant aur samay sakeksh rachnaon ke liye vikhyaat Shree Lal Shukla Ji ke baare me media ki udasinta sachmuch dukhad aur dil ko laganewali hai. Afsos ki media aaj usi cheej ke peeche bhagta hai jo use trp deti hai. Shree Lal ji se us waqt kolkata me mulakat huee thi jab hum log Anand Bazar Prakashan ke Hindi Saptahik Ravivar me the. Hum log Shukla ji ka Rag Darbari Upanyaas Dharavahik Chhap rahe the. Usi dauran Shukla ji ka humare Kolkata Daftar ana hua, Bahut hi somya vyaktitwa, seedhe -sade lage ve. Humare sampadak S.P. Singh ne hum sabase unka parichay karaya, ve sub se muskara kar mile. Humne unke Sashaskat upnyas ki tarif ki to ve vaise hi muskra diye. Prabhu se prarthna hai ki ve unhe jald se jald swastha kar dein, abhi unse hume bahut kuchh sunana hai unki rachnaon ke madhyam se-Rajesh Tripathi, Kolkata

  3. sunil kumar

    October 18, 2011 at 4:49 pm

    माफ कीजिेए गजेंद्र जी, मैं इंडिया न्यूज़ नेशनल में काम करता हूं, और आज सुबह 10 बजे से श्रीलाल शुक्ल जी को हमने अपने चैनल पर प्रमुखता से श्रीलाल जी को कवर किया, हेडलाइन्स में भी जगह दी, पर अफसोस, बाकी चैनलों के लिए श्रीलाल जी बेकार माल निकले जिनकी कोई जगह नहीं थी.

  4. amitkumar

    October 18, 2011 at 7:01 pm

    are bhai……..ab na vo gandhi rahe..na vo gautam rahe..
    na vo public rahi..na vo mausam rahe..

  5. faisal khan

    October 19, 2011 at 8:44 am

    shri lal ji shukla ke bare mai padh kar pata chala ki unka swasthay theek nahi hai,unki sehat aur swasthay ke liye dua karte hain aur rahi baat logon ki to janab koi BF post kar dete to ye sab comment dal jate magar kisi mahan aadmi ki khabar logon ke liye ahmiyat nahi rakhti,upar wala unko sehat de aur lambi umar de, m faisal khan(channel one news)saharanpur

  6. shailesh kumar singh

    October 19, 2011 at 4:13 pm

    are bhai mukesh is kahawat ko to aapne bhi suna hoga ki deepa tale andhera wahi kahawat midia jagat par satik baidhti hai kitne sarm ki baat hai ki hum samaj ke bibhinn chhettron men faile bharastachar ko to ujaager karte hen lekin hum kitne bharast hen is our kbhi sochne ki phuraset hi nahi mili

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