श्रीलाल शुक्ल के साथ अमरकांत को पुरस्कृत करना अपमानजनक है

: साहित्य के गांव में बाजार : अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल विशुद्ध रूप से ग्रामीण पृष्ठभूमियों में प्रचुर लेखन करने वाले कथाकार नहीं हैं। यद्यपि अमरकांत ग्रामीण इलाके से ही शहर में आए, जिस तरह हिन्दी में अनेक रचनाकार आए हैं।

प्रेमचंद, शिवपूजन सहाय, जगदीश चंद्र, फणीश्वरनाथ रेणु, राही मासूम रजा, मार्कंडेय, शिवमूर्ति और हरनोट आदि कथाकारों की तरह अमरकांत ग्रामीण लेखन के रचनाकार नहीं हैं। उन्हें हम प्रेमचंद की कहानी की परंपरा को अग्रसर करने वाले कहानीकार अवश्य मान सकते हैं।

अमरकांत की राह– 1950 अथवा आजादी के बाद इलाहाबाद, बनारस, लखनऊ, आगरा, बलिया आदि उत्तरप्रदेश के शहर इस तरह के शहर थे कि उन्हें बड़ा गांव या मंझोला शहर कहा जा सकता था। दो दशक पहले तक तो दिल्ली को भी बड़ा गांव कहते थे पढ़े लिखे लोग। आज के किसी भी मध्यमवर्गीय शहरों की तुलना में वे बेहद मंद, कछुआ चाल, कम जनसंखया वाले, उद्योगविहीन, छोटे कार्यालयों वाले, उनींदे, वनस्पतियों से घिरे, पैदल और साइकिल प्रमुख शहर थे। शहरों के ऊपर ग्रामीण अक्स था, शहरों में बोलियों का पर्याप्त प्रचलन था। अमरकांत की यही राह थी, यही जगह थी। अमरकांत में जो अद्वितीय विनोद था, वह ग्रामीण समाज और मनुष्य से आया था। उनकी कहानियों के विषयों में गांव, कस्बे और शहर की मिलीजुली अवस्था है। सब एक दूसरे को ‘ओवरलैप’ करते हुए अपनी कहानियों, केवल कहानियों के बल पर वे हिन्दी के थोड़े-बहुत लेखक थे।

श्रीलाल की जगह– श्रीलाल शुक्ल नौकरशाह थे। निपुण, बुद्धिमान, शीन काफ दुरुस्त, उच्च सामाजिक प्रतिष्ठावान तो थे ही उनकी सामाजिक बनावट भी ऐसी ही थी। अमरकांत शुरुआती दिनों से कम्युनिस्ट थे। ‘कम्युनिस्ट’ कहानी लिखी थी, छोटी-मोटी नौकरी करते रहे, जीवन कठोर था, पर उनमें गिला-शिकवा कभी नहीं रहा। यह उनकी विचारधारा का आचरण था, जीवन भर यह बना रहा है। श्रीलाल शुक्ल हिन्दी में उस गुट के प्रिय रहे, जो वामपंथ विरोधी रहा आया, जिसका अस्तित्व ही वामपंथ की खिलाफत से बना। वे ‘परिमल’ में अमूर्त रूप से सक्रिय रहे। उनका दोस्ताना वहीं था। उन्हें समाजवादियों का लाभ मिला। पर श्रीलाल शुक्ल अपने दमखम, शराफत, हाजिरजवाबी के बाद भी और रागदरबारी जैसी चर्चित कृति के बाद भी बड़े लेखक नहीं हैं। ‘बड़े’ शब्द पर मेरा दबाव है कि इसे सही अर्थ में समझा जाए। परिमल के साथी होने के बावजूद परिमल के दिग्गजों ने उन्हें ‘बड़ा’ लेखक नहीं माना। परिमल के नियंता ‘व्यंग्य’ को उपहास से देखते थे और इसे ऊंचा दर्जा नहीं देते थे। इस पर काफी हाउस की अनेक बहसों का मैं युवा श्रोता भी इलाहाबाद में रहा हूं।

उपहास का लेखन– श्रीलाल शुक्ल की ‘राग दरबारी’ में प्रहसन, माखौल, किस्सा और हास्य का झरना फूटता है। वे मजामत के उस्ताद हैं, पर उनका सारा किया-कराया क्षणभंगुर है। अगर सूक्ष्मता से श्रीलाल जी की मीमांसा की जाए तो उनमें अर्बन लेखक की आधुनिक प्रवृत्तियां नहीं हैं। वे ओवर रेटेड लेखक हैं, परसाई जैसे श्रेष्ठ और देश के बड़े लेखक के साथ भी उन्हें खड़ा किया गया। खड़ा करने वालों का उद्देश्य केवल उन्हें खड़ा करना था, प्रगतिशील विचारधारा के परसाई को कमतर करने के लिए। श्रीलाल शुक्ल सदा जगमगाती दुनिया में रहे, जबकि अमरकांत के चारों तरफ एक गोबर से बनी कच्ची कोठरी का अंधेरा था। ढिबरियां जल रही हैं चारो तरफ और अमरकांत लिख रहे हैं। अमरकांत बड़े लेखक इसलिए भी हैं कि उन्हें कभी गिला-शिकवा नहीं रहा। उन्होंने जिस लेखकीय जीवन को और उत्तर भारतीय समाज को स्वीकार किया, उससे उन्हें गहरा प्यार था। उनकी चाल साफ-सुथरी थी। वे खुशदिल रहे और एक बड़े रचनाकार की स्थिरता और तटस्था उनमें है।

अपने समकालीनों की वे गहरी इज्जत करते हैं और गुलगुले से अमरकांत में विचारों का पत्थर बिल्कुल ग्रेनाइट का है। उन्हें दूर किनार में अपने चुने हुए एकांत में रहना पसंद था, इसलिए बड़े पराभवों और राजनीतिक शेयर बाजार गिरने, उठने, बदलने के बावजूद वे अविचलित रहे। मुझे उनके चेहरे की आकृति ब्रेख्त के काफी करीब लगती है। इसलिए निष्कर्ष के रूप में यह सही है कि श्रीलाल शुक्ल के अतिशबाज लेखन और अमरकांत के अंधेरों को एक जगह रख कर पुरस्कृत करना अपमानजनक भी है, और एक हद तक कारिस्तानी भी। किशन पटनायक की टिप्पणी सटीक है कि ‘राग दरबारी’ के लेखक को गांवों से सहानुभूति नहीं है। मेरी समझ यह है कि श्रीलालजी की गांव के जीवन से क्या शहरवासी से भी यारी नहीं है।

ज्ञानपीठ की यात्रा– अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल के पुरस्कार प्रसंग को और विस्तार से जानना हो तो ज्ञानपीठ की यात्रा की तरफ ध्यान देना होगा। ज्ञानपीठ की स्थापना में शोध, मीमांसा, क्लासिकी चेतना का प्रकाशन और आयोजन उसकी गतिविधि का प्रमुख हिस्सा था। ‘ज्ञानोदय’ में मांस मदिरा, लहसुन-प्याज का उल्लेख कहानी, कविता में आने पर उसे संपादित कर दिया जाता था। यह धर्मवीर भारती और रमेश बख्शी जैसे संपादकों के जमाने में भी बचा हुआ था। फिर 2010 तक आते-आते स्त्रियों पर कुत्सित टिप्पणी भी छपने लगी। आज देखिए कि कैसे ज्ञानपीठ की यात्रा सम सामयिक बाजार की तरफ रेंग रही है। आधुनिकता और लोकप्रियता और प्रिंटआर्डर की ललक, बाजार की तरफ उन्मुख होना, उसका तर्क देने लगना ज्ञानपीठ की महत्वाकांक्षा का हिस्सा हो गया है। इसलिए ज्ञानपीठ में देश के सबसे महंगे सेल्समैन और अभिनेता अमिताभ बच्चन का प्रवेश विचारणीय है। यह न तो अकारण है और न बुद्धूपना।

जूरी का खेल– ज्ञानपीठ भी हिचकते-हिचकते विश्व के ताकतवर पुरस्कारों की राह में उठ रहा है। विश्व राजनीति में उसकी कोई जगह नहीं है न विश्व बाजार में, लेकिन उसकी ललक यही है। यह भी मुमकिन है कि सही खिलवाड़ का कूट खेल न कर सकने के कारण वह अधकचरे चपेटे में आ जाए। पर यह सब भविष्य के खेल हैं। अभी मेरी समझ यह है कि ज्ञानपीठ के निर्णयों में सहजता, भोलापन और चातुर्य दोनों मिले-जुले हैं। कई बार उसके निर्णय भारतीय भाषाओं की ताकतवर प्रगतिशील परंपरा की पूरी-पूरी मुखलफत नहीं करते पर उसके चाल-चलन में एक लोकप्रिय खुराफत जरूर है। जैसे शहरयार को पुरस्कृत करना। शहरयार उर्दू के बड़े शायर नहीं हैं पर उनको पुरस्कृत करके एक प्रगतिशील मुखड़ा ज्ञानपीठ का बनता है। अंतरविरोधी चीजें इसके पहले भी हुई हैं-जब निर्मल वर्मा और गुरदयाल सिंह को ज्ञानपीठ दिया गया। यहां पर भी एक कम्युनिस्ट रचनाकार और एक कम्युनिस्ट विरोधी रचनाकार की कूटनीति स्पष्ट है।

एक बात ध्यान दें कि ऐसा नामवर सिंह जैसे जूरी सदस्य के खेल से संभव है। नामवर सिंह ज्ञानपीठ के लिए एक मुफीद वजीर हैं। जैसा मैं पहले एक बार अपने एक व्याखयान में भी बांदा में कह चुका हूं कि असली खेल जूरी की नियुक्ति है। इसकी नियुक्ति के पहले ही सालोंसाल यह क्रियाकलाप चलता रहता है। यही विभाजन फिर दोहराया गया-अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल के साथ। ज्ञानपीठ गुरुदयाल सिंह और अमरकांत को स्वतंत्र ज्ञानपीठ देने की बेवकूफी कभी नहीं कर सकता। यह केवल बड़े लेखकों को विभाजित और कमतर करने की तकनीक है। साम्राज्यवादी दुनिया के बड़े और शातिर तरह से संचालित पुरस्कारों का ज्ञानपीठ का थिंकटैंक अभ्यास कर रहा है। उसके अगले कदम भारतीय समाज और राजनीति की करवटों के आधार पर होंगे। सीधा हस्तक्षेप न भी हो पर जूरी का गठन बहुत दूर तक सोच विचार की कारीगरी है। यह भी हास्यापद है कि पिछले कुछ सालों से हिन्दी के ताकतवर पुरस्कार हिन्दी में सर्वश्री राजेन्द्र यादव, अशोक बाजपेयी, कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, कृष्ण बलदेव वैद के हिस्से में ही आए हैं। इन्हें बार-बार पुरस्कार मिले। ये सब जूरी की कारस्तानियां हैं।

गांव की ओर बाजार– बाजार का, नए साम्राज्य का गांवों में प्रवेश उनको खत्म कर देने के लिए है, उन्हें लूट कर बदल देने का है। गांव बचेंगे नहीं, वे उलट जाएंगे। यह कैसे मुमकिन है भारत देश में कि शहर तो बदल जाएं, उनका कायाकल्प हो जाए, नगरीरकरण तेज बना रहे और गांव जस के तस बने रहें। बीसों साल तक अमरकांत की सुध नहीं ली गई और आज जब पुरस्कृत किया गया (कोने अतरे में जाकर) तो मैं इसे इसी पृष्ठभूमि में देख रहा हूं। इसी तरह कौन बनेगा करोड़पति, में घुस-घुस कर गांव के लोगों को लाया जा रहा है और उन्हें दस-पचास लाख दिए जा रहे हैं। यह अचानक वंचित गांवों से लोगों को लाकर, उनके कठिन जीवन दृश्यों की क्लिपिंग दिखा कर, उनको मार्मिक दिखा कर यही किया जा रहा है, जो भारतीय ज्ञानपीठ ने किया है। सब तरफ गांव के उद्धार का यह खेल शुरू हो गया है।

नियंत्रण की रणनीति– विकास की अवधारणा में गांव कहां हैं, यह देखना एक दिलचस्प बात है। उत्तर भारत में पारंपरिक गांव के निशान तो तेजी से मिटे हैं। आने वाले समय में गांव के बिम्ब और बदलने वाले हैं। इस देश में ऐसे अनेक इलाके भी हैं, जहां बड़े किसान को जमीन का मुआवजा 5 से 15 करोड़ तक भी मिला है। यह रकम रंग लाएगी। यह गिनती के लोगों का प्राप्य है, पर इसका विनाश का बड़ी ग्रामीण जनसंखया पर होगा। अपराध, भुखमरी, भेद और रक्तपात का तीखा अनुभव देखने को मिलेगा। गांव में बड़ी रकम फेंकी जा रही है, जो अंततः बाजार का नियंत्रण उन्हीं इलाकों में बढ़ाएगी।

लेखक ज्ञानरंजन देश के प्रसिद्ध साहित्यकार हैं. उनका लिखा यह विश्लेषण लोकमत, नागपुर में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

Comments on “श्रीलाल शुक्ल के साथ अमरकांत को पुरस्कृत करना अपमानजनक है

  • Gyanranjan ji , puraskaron ki rajniti to koi nai baat nahi hai. Aaj koi bhi puraskaar isse achuta nahi hai. Amarkant aur Shrilal Shukla mein koi tulna nahi ho sakti. dono alag alag dhratal par khade hain .

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  • Girish Mishra says:

    For a person like me, this piece by my old friend Gyanranjan is very illuminating. Long ago, I read Shukla’s novel “Vishrampur ka Sant” and reviewed it for “Hans”. I found it substandard. Shukla lacked any deeper knowledge of Bhoodan and its leaders like JP. His “Rag Darbari” is over-rated.

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  • Mahendra Bhishma says:

    :nisandeh Gyanranjan sahitya ke khetra me ek bada naam he .unka aalekh padh kar aascharya nahi huaa vakai vah aapni bhadhas nikal rahe he. Adarniy Sri Srilal Shukla ji Va Adarniy Sri Amarkant ji ka yogdaan sahitya ke khetra me mahatvporn he dono badhe rachnakar he fir vah chahe gaon se ho ya shahar se … Rag Darbari abhi tak ke upanyaso me sabse jada bika he or bik raha he … mera kahna he ki sachcha rachnakar ki koi jati , dharm, varg ya sangh nahi hota vah keval sahitykar ho sakta he ek achha manav ho sakta he .. ujale ko dekhiye Gyan Rajan ji kala to bahut dekh chuke aap va aap jesi soch vale … dono praskrit hindi ke janmany lekhko ko sahitya ka Noble praskar mile, , Mahendra Bhishma Lucknow mob.08004905043

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  • NIRANJAN PATHAK says:

    THERE IS A MISTAKE OF PROOF. PLEASE READ
    WO HINDI KE THODE BAHUT LEKHAK THE
    AS
    WO HINDI KE THODE BAHUT CHEKHOV THE

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  • मोहन श्रोत्रिय says:

    ज्ञान जी ने नए सन्दर्भों में पुरस्कार की राजनीति को बड़े दिलचस्प तरीके से उजागर किया है. श्रीलाल शुक्ल ओवर-रेटेड लेखक हैं, यह उनकी महत्वपूर्ण स्थापना है, परसाई- प्रसंग में देखने पर बेहद प्रामाणिक भी. उनके विश्लेषण और निष्कर्षों से असहमति आसान नहीं. बधाई.

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  • anil kumar singh says:

    sir,apko prof nitya nand tiwari ji ke us review ki yad to hogi jo unhone ragdarbari ke prakashan ke bad likhi thi.majak udana wyangya nahi hai.parsaiji se tulana ka sawal hi nahi.amarkantji ise bhi hans kar tal denge.bahut bade lekhak hain .

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  • Sharad Chandra Gaur says:

    ज्ञानरंजन जी का लेख पुरस्कारों की “मर्केतिन्ग” पर कई सवाल खडे करता है…सभी स्तर के पुरस्कार पुर्वाग्रह से ग्रसित होते जा रहे है… यन्हा तक की नोबेल पुरस्कार तक भी….बराक ओबामा को नोबेल इसका ज्वलन्त उदाहरण है…..वर्तमान सन्दर्भ को तो ज्ञानरंजन जी समझते है…बधाई.

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  • govindmathur says:

    हर साहित्यिक पुरस्कार में राजनीति है. ज्ञानपीठ पुरस्कार की भी पहले जैसी प्रतिष्ठा नहीं रही. पुरस्कारों को दो लोगों में बाँटना भी गलत है. इससे पुरस्कार का अवमूल्यन ही होता है.

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  • NIRANJAN PATHAK says:

    There is a mistake of proof .Please read

    wo hindi ki thode bahut lekhak the
    AS
    wo hindi ki thode bahut CHEKHOV the

    Reply
  • bharatkarecha says:

    Gayaranjan ji Ka analysis satik hey. Jata naihi kugha kahana hey Abitab bachan is really bigest selesman hey. Gava small city ke,kona banaga karorpati ke bare mey bhai bilcola sahi likh hey. verygood gayaji woh,woh.

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