Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

साहित्य

समय आ गया है कि रचनाकार पाठकों की चिंता करें

: लखनऊ में कथाक्रम की वार्षिक संगोष्ठी : कथाक्रम की वार्षिक संगोष्ठी के 18वें आयोजन के अवसर पर चर्चित साहित्यकारों के बीच हुई गंभीर बहस के दौरान यह बात उभरकर आयी कि अब समय आ गया है कि रचनाकार पाठकों की चिंता करें। ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और साहित्य के सरोकार’ विषय पर हुई दो दिवसीय संगोष्ठी के दौरान वरिष्ठ कथाकार अब्दुल विस्मिल्लाह को कथाक्रम सम्मान प्रदान किया गया। सम्मान समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार मुद्राराक्षस, कथाकार काशीनाथ सिंह एवं संयोजक शैलेंद्र सागर ने अब्दुल विस्मिल्लाह को सम्मान पत्र एवं पंद्रह हजार रुपए की सम्मान राशि प्रदान की।

: लखनऊ में कथाक्रम की वार्षिक संगोष्ठी : कथाक्रम की वार्षिक संगोष्ठी के 18वें आयोजन के अवसर पर चर्चित साहित्यकारों के बीच हुई गंभीर बहस के दौरान यह बात उभरकर आयी कि अब समय आ गया है कि रचनाकार पाठकों की चिंता करें। ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और साहित्य के सरोकार’ विषय पर हुई दो दिवसीय संगोष्ठी के दौरान वरिष्ठ कथाकार अब्दुल विस्मिल्लाह को कथाक्रम सम्मान प्रदान किया गया। सम्मान समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार मुद्राराक्षस, कथाकार काशीनाथ सिंह एवं संयोजक शैलेंद्र सागर ने अब्दुल विस्मिल्लाह को सम्मान पत्र एवं पंद्रह हजार रुपए की सम्मान राशि प्रदान की।

इस मौके पर मुद्राराक्षस जी ने कहा कि हिंदी की दुनिया को सांस्कृतिक संवाद के लिए ज्यादा उदार होने की जरूरत है क्यों कि वे संकटग्रस्त हैं और अलग संस्कृति की बारीकियों को समझा नही जा सकता। इस अवसर पर काशीनाथ सिंह ने कहा कि बुनकरों की अपनी एक अलग भाषा होती हैं जिसे ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ में बखूबी लिपिबद्ध किया गया है। अगर इसे लिपिबद्ध न किया गया होता तो यह मर जाती और जब तक बनारस में बुनकर हैं तब तक इस उपन्यास की प्रासंगिकता बनी रहेगी।

तीन दशक से अपनी रचनाओं में ग्रामीण जीवन एवं मुस्लिम समाज की अंदरुनी हकीकतों, संवेदनाओं और अंर्तद्वन्द्व का सजीव चित्रण करने वाले कथाकार अब्दुल विस्मिल्लाह ने इस अवसर पर कहा कि आज हर चीज की तरह साहित्य भी बदल रहा है। आज के दौर में आलोचना का तौर तरीका भी बदला है पर आलोचना कभी भी रचना की श्रेष्ठता तय नही करती। रचना का सच्चा मूल्यांकन तो पाठक ही निर्धारित करते हैं। युवा आलोचक पल्लव ने अब्दुल विस्मिल्लाह के चर्चित उपन्यास ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ में दर्ज प्रतिरोध की चेतना एवं कहानियों में मानवीय संवेदना की शिनाख्त करते हुए कहा कि लघु उपन्यास ‘दंत कथा’ में जिजीविषा और संघर्ष का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है। उनकी लेखन शैली और भाषा में वैविध्यता के साथ साथ नए तरह के प्रयोग परिलक्षित होते हैं।

पल्लव ने कहा कि अब्दुल बिस्मिल्लाह का कथा कर्म हिंदी पट्टी में व्यवस्था द्वारा साम्प्रदायिकता के पोषण की प्रामाणिक पड़ताल करता है. वरिष्ठ कथाकार एवं आलोचक मुद्राराक्षस ने उपन्यासकार की सराहना करते हुए कहा कि उनके उपन्यासों में मुस्लिम बुनकर समुदाय से कई नए शब्द हिंदी साहित्य को मिले। युवा आलोचक सुशील सिद्धार्थ के कुशल संचालन में चली संगोष्ठी में विष्णु नागर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि साहित्य का सबसे बड़ा दायित्व अभिव्यक्ति की सीमा बढ़ाना है। आज लेखकों के सरोकार अभिव्यक्ति की सीमाओं का विस्तार है। वरिष्ठ कथाकार संजीव का कहना था कि लेखक अपनी कहानी लेकर समाज के बीच जाएं तभी पाठकों की पसंदगी का पता चल पाएगा। केवल साहित्य लेखन से दुनिया नही बदलती।

साहित्यकार रवींद्र वर्मा के अनुसार लेखक के लिए शब्द ही कर्म है इसलिए इस कर्म का पालन करना होगा तभी साहित्य का समाज से सरोकार बना रहेगा। कवि नरेश सक्सेना ने साहित्य के दिनोंदिन निष्प्रभावी होते जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लेखकों के सरोकार अब आलोचकों और बड़े बड़े संपादकों के इर्द गिर्द घूमने और चर्चा व पुरस्कार बटोरने आदि तक सिमटकर रह गए हैं। दशकों से किसी रचना ने कोई क्रान्ति नही की और न ही कोई रचनाकार जेल गया। वरिष्ठ समालोचक परमानंद श्रीवास्तव मानते हैं कि स्वतंत्रता अपने आप नही मिलती बल्कि उसे संघर्ष से अर्जित करना पड़ता है। सत्ता स्वतंत्रता को अपना अधिकार मानती है और जो चाहती है, वही करती है।

लखनउ विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष डा. सूर्यप्रसाद दीक्षित के अनुसार तात्कालिकता से अच्छा साहित्य नही रचा जा सकता। आज के दौर में दिन ब दिन साहित्य हाशिए की तरफ बढ़ता जा रहा है, ऐसे में शब्दों की सार्थकता और साहित्य की भूमिका क्षीण होती जा रही है जबकि पहले साहित्य शाश्वत विषयों पर केंद्र्रित था। युवा कथाकार शरद सिंह ने स्त्री लेखन में यथार्थ और सचाई की स्वीकार्यता पर बल देते हुए स्त्री समाज की अस्मिता और भाषा की निर्भीकता पर अपने विचार व्यक्त किए। युवा लेखक रजनी गुप्त के संचालन में चले कार्यक्रम के दौरान एकत्रित रचनाकारों के बीच इस बात को लेकर बहस चलती रही कि रचनाकार केवल लेखन करे या सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका निभाए।

अगले दिन वरिष्ठ साहित्यकार मुद्राराक्षस का मानना था कि हिंदी में लिखने पर सत्ता संगठनों का ध्यान उतना नही जाता यानी कमोवेश साहित्य धीरे धीरे अपना अपेक्षित प्रभाव नही छोड़ता। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा दौर में दलित लेखन में सतहीपन नजर आता है जबकि लक्ष्मण गायकवाड़ के लेखन में पर्याप्त गंभीरता और अपेक्षित परिपक्वता नजर आती है। कथाकार अखिलेश का मानना था कि जिन लेखकों को ऐसा लगता है कि लेखक लोगों के बीच नहीं जाते, उन्हें व्यक्तिगत तौर पर खुद फील्डवर्क करना चाहिए ताकि बहुरंगी समाज के दोहरे पन की पहचान की जा सके।

आलोचक वीरेंद्र यादव का कहना था कि साहित्य महज लेखक की साहित्यिक रचना नही है बल्कि यह सामाजिक संरचना भी है। उनके अनुसार अभिव्यक्ति की आजादी को हथियार के रूप में नहीं लेना चाहिए बल्कि लेखकों को नैतिक रोष के साथ साहसिक साहित्य सृजन करना चाहिए। युवा आलोचक दिनेश कुशवाहा ने कहा कि शुरू से ही मनुष्य ही साहित्य का सरोकार है। अब दलित और स्त्री विमर्श साहित्य के नए सरोकार होने चाहिए। कथाकार पंकज सुबीर ने कुछ सवाल उठाते हुए कहा कि नई पीढ़ी के सरोकार क्या हों? हम किस तरह अपने सरोकार तय करें? यह हमें कौन बताएगा? पुरस्कृत कथाकार अब्दुल विस्मिल्लाह का मानना था कि सामाजिक सरोकारों का मूल आम आदमी में होता है। ऐसा समय आ गया है कि आज के प्रकाशकों को जहां बाजार की चिंता है तो दूसरी ओर पत्रिकाओं के संपादकों की अपनी नीतियां हैं।

कथाकार शिवमूर्ति का मानना था कि केवल लच्छेदार शिल्प और चमकदार भाषा के सहारे नही लिखा जा सकता। वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह ने कहा कि राजद्रोह करने या अश्लील लिखने पर ही कृति जब्त होती है या लेखक जेल जाता है लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में सेल्फ सेंसरशिप भी जरूरी है। पत्रकार के.विक्रमराव ने कहा कि कश्मीर देश की अस्मिता का सवाल है और आज के दौर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नए सिरे से खुलकर चर्चा की जानी चाहिए। प्रेस की आजादी को अभिव्यक्ति की अन्य विधाओं के साथ जोड़कर नही देखा जाना चाहिए। समापन वक्तव्य देते हुए रजनी गुप्त ने कवि शशिप्रकाश की इस कविता को उद्धृत किया-

वनस्पतियों को प्यार करने की अदम्य कामना लिए हुए
और वनस्पतियां सिर्फ सूर्य की रोशनी में होती हैं
घुटती हैं धरती के अंधेरे ह्दय को छूती हुई
बहती धाराएं अकुलाती हैं
और एक दिन
करोड़ों मन मिट्टी के नीचे से बाहर आ जाती हैं
फोड़कर कई पथरीली तहें।

कार्यक्रम के अन्य प्रमुख वक्ताओं में डा.गिरीश श्रीवास्तव, डा.अरविंद त्रिपाठी, मूलचंद गौतम, अशोक मिश्र, वीरेंद्र सारंग आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। कथाकार संपादक शैलेंद्र सागर ने कथाक्रम में आने वाले साहित्यकारों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम के कार्यान्वयन में सहयोग करने वाले कर्मियों के प्रति हार्दिक सम्मान प्रकट किया।

लखनऊ से रजनी गुप्त की रिपोर्ट

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...