पंडित बाबूराव विष्णु पराड़कर, सखाराम गणेश देउस्कर, माधव राव सप्रे, गोविन्द शास्त्री दुगवेकर, लक्ष्मण नारायण गर्दे, रामकृष्ण रघुनाथ खाडिलकर जैसे पत्रकारों का योगदान इस दृष्टि से भी उल्लेखनीय है कि अहिन्दीभाषी होते हुए भी उन्होंने हिन्दी के विकास के विकास में न सिर्फ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई बल्कि राष्ट्रभाषा के प्रश्न पर मातृभाषा से बढ़कर हिन्दी का पक्ष लिया. हिन्दी गद्य का स्वरूप ऐसे ही पत्रकारों के लेखन से विकसित हुआ है. क्षेत्रीय फासीवाद को बढ़ावा देने वालों को संकीर्ण मानसिकता से निकलकर अपनी इस महत्वपूर्ण विरासत को भी देखना चाहिए.
पराड़कर जयंती के बहाने मंगलवार को जुटे विद्वान ने मराठीभाषी पत्रकारों के हिन्दी योगदान की चर्चा की और कहा कि महाराष्ट्र में हिन्दीभाषियों को लेकर वितण्डा फैलाने वालों को शायद ही पता हो कि मराठीभाषी पत्रकारों ने हिन्दी को सम्पन्न और विकसित करने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वक्ताओं ने कहा कि पराड़कर जी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए व्यापक आंदोलन चलाया और इसकी विशेषता बताते हुए कहते थे कि सभी भारतीय भाषाओं में दूसरी भाषा वालों के लिए घृणा व्यक्त करने वाले शब्द हैं, जैसे मराठी में रांगड़ा या बांग्ला में खोट्ठा लेकिन हिन्दी में नहीं.
पराड़कर स्मृति भवन में उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान ने महाराष्ट्र समाज वाराणसी और पंडित बाबूराव पराड़कर स्मृति न्यास के साथ मिलकर यह आयोजन किया था. संगोष्ठी का विषय था- ‘क्षेत्रीय फासीवाद का खतरा, पत्रकारिता और पराड़कर जी की परम्परा.’ अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार के. विक्रम राव का कहना था कि क्षेत्रीय फासीवाद के खतरे देश में कई जगह से उठे हैं लेकिन जब तक देश की सांस्कृतिक एकता रहेगी, वे सफल नहीं होंगे. श्री राव ने आज की पत्रकारिता का हाल प्रस्तुत करते हुए यह सवाल उठाया कि पराड़कर जी आज होते तो क्या सोचते. उन्होंने कहा कि आज ज्यादातर लोगों के लिए पत्रकारिता मंजिल नहीं पड़ाव है. पराड़कर जी शब्दों के गठन और भाषा के मानकीकरण के पक्षधर थे लेकिन ये चीजें आज खत्म हो गई हैं. उन्होंने कहा कि सौहार्द आज खबर नहीं बनती, खबर अरुधंति राय या राखी सावंत बनती हैं.

ज्ञान प्रवाह के मानद आचार्य और राज्य संग्रहालय के पूर्व निदेशक नीलकंठ पुरुषोत्तम जोशी ने कहा कि क्षेत्रीय फासीवाद वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा है. वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार गौरीशंकर गुप्त ने बताया कि दुगवेकर जी ने पराड़कर जी और गर्दे जी को हिन्दी पत्रकारिता के लिए प्रेरित किया था. काशी विद्यापीठ के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर सत्यदेव त्रिपाठी ने मराठी और हिन्दी के एकतामूलक तत्वों की उदाहरणपूर्वक विवेचना की. उन्होंने कहा कि ये विभूतियां उस समय पैदा हुईं जब देश को एकात्मकता की आवश्यकता थी.
पराड़कर जी के पौत्र आलोक पराड़कर ने कहा कि कई नए शब्द बनाकर एवं चलाकर, साहित्कारों का निर्माण एवं प्रोत्साहन कर, राष्ट्रभाषा के प्रश्न पर हिन्दी को बढ़ावा देकर पराड़कर जी ने हिन्दी की सेवा की. गर्दे जी के पौत्र विश्वास गर्दे ने गर्दे जी के योगदान की चर्चा की. समारोह में रामकृष्ण रघुनाथ खाडिलकर के पुत्र वरिष्ठ पत्रकार मनोहर खाडिलकर, पराड़कर जी की पुत्रवधू अर्चना पराड़कर को सम्मानित किया गया. इस मौके पर पराड़कर जी के पत्रों, पुस्तकों, चित्रों की प्रदर्शनी भी लगाई गई. आरम्भ में महाराष्ट्र समाज के मंत्री यादव राव पाठक ने स्वागत भाषण किया. संचालन अर्चना अग्रवाल तथा धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ व्यंग्य चित्रकार जगत नारायण शर्मा ने किया.












dhanish sharma
November 18, 2010 at 3:06 am
bilkul sahi baat hai sir. i agree with u.aap honest ho.koi khabar nai banti.ager baimaan ho khabar to tabi banti hai na sir.or TRP ki andhi rase main sub kuch chalta hai.