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अखबारों के कर्मचारी नरेगा मजदूर

लोकतंत्र में प्रेस की गुलामी यानि अखबार मालिकों की गुलामी। देश के सभी समाचार पत्रों में कर्मचारियों का शोषण हो रहा है। स्‍वतंत्रता से पहले अखबार एकमात्र संदेश देने का मिशन था। उस समय मिशनरी पत्रकारिता होती थी, लेकिन अब यह पूर्णरूप से उद्योग का रूप ले चुका है। अखबार मालिक विज्ञापन के रूप में अरबों रुपए सालाना कमा रहे हैं। सरकार भी यह जानती हैं। सरकारी विज्ञापन के रूप में भी अखबारों को करोडों रुपए की आमद होती है। इसके बावजूद अखबारों में काम करने वाले, जो अपने आपको पत्रकार, रिपोर्टर, संपादक, उप संपादक आदि नामों से इंगित करते हैं, की स्थिति बंधुआ मजदूर से कम नहीं है। क्‍योंकि वे शोषण के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकते। क्‍योंकि उनकी नौकरी पर हमेशा तलवार लटकी रहती है। ज्‍यादा शोषित कर्मचारी स्‍वयं ही संस्‍थान छोडकर अपने अन्‍य कामकाज में लगकर रोजीरोटी कमाने लग जाते हैं। पूरे देश के अखबारों में लाखों कर्मचारी ऐसे हैं जो कई वर्षों से ढाई से पांच हजार तक मासिक वेतन में परिवार का पोषण कर रहे हैं। अब अखबारों की हालत वैसी नहीं रही जो आजादी से पहले थी। अब अखबारों के मालिक अरब पति नहीं बल्कि शंख पति हो गए हैं। अगर अखबारों के मालिक इस बात पर चिंतन करें तो वे दैत्‍यराज से कम नहीं हैं।  किसके बलबूते कमाया, उसे ही सुख नहीं मिला तो ऐसी कमाई पर लानत है। नरेगा मजदूर से भी कम वेतन पर काम करने वाले पत्रकारों की हालत से में बडा दुखी हूं।  ऐसी स्थिति में भी ऐसे नरेगा पत्रकारों का स्‍थानांतरण कर दिया जाता है। घ्‍ार से बाहर रहकर वह क्‍या तो खाएगा और क्‍या बच्‍चों का पालन पोषण करेगा।

लोकतंत्र में प्रेस की गुलामी यानि अखबार मालिकों की गुलामी। देश के सभी समाचार पत्रों में कर्मचारियों का शोषण हो रहा है। स्‍वतंत्रता से पहले अखबार एकमात्र संदेश देने का मिशन था। उस समय मिशनरी पत्रकारिता होती थी, लेकिन अब यह पूर्णरूप से उद्योग का रूप ले चुका है। अखबार मालिक विज्ञापन के रूप में अरबों रुपए सालाना कमा रहे हैं। सरकार भी यह जानती हैं। सरकारी विज्ञापन के रूप में भी अखबारों को करोडों रुपए की आमद होती है। इसके बावजूद अखबारों में काम करने वाले, जो अपने आपको पत्रकार, रिपोर्टर, संपादक, उप संपादक आदि नामों से इंगित करते हैं, की स्थिति बंधुआ मजदूर से कम नहीं है। क्‍योंकि वे शोषण के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकते। क्‍योंकि उनकी नौकरी पर हमेशा तलवार लटकी रहती है। ज्‍यादा शोषित कर्मचारी स्‍वयं ही संस्‍थान छोडकर अपने अन्‍य कामकाज में लगकर रोजीरोटी कमाने लग जाते हैं। पूरे देश के अखबारों में लाखों कर्मचारी ऐसे हैं जो कई वर्षों से ढाई से पांच हजार तक मासिक वेतन में परिवार का पोषण कर रहे हैं। अब अखबारों की हालत वैसी नहीं रही जो आजादी से पहले थी। अब अखबारों के मालिक अरब पति नहीं बल्कि शंख पति हो गए हैं। अगर अखबारों के मालिक इस बात पर चिंतन करें तो वे दैत्‍यराज से कम नहीं हैं।  किसके बलबूते कमाया, उसे ही सुख नहीं मिला तो ऐसी कमाई पर लानत है। नरेगा मजदूर से भी कम वेतन पर काम करने वाले पत्रकारों की हालत से में बडा दुखी हूं।  ऐसी स्थिति में भी ऐसे नरेगा पत्रकारों का स्‍थानांतरण कर दिया जाता है। घ्‍ार से बाहर रहकर वह क्‍या तो खाएगा और क्‍या बच्‍चों का पालन पोषण करेगा।

सरकारों का दोगलापन : अखबार उद्योग के रूप में काम कर रहा है तो सरकार का अंकुश क्‍यों नहीं। सभी कर्मचारियों को श्रम कानून के अनुसार ही वेतन भत्‍ते सहित अन्‍य सुविधाएं मिलनी चाहिए। लेकिन अखबारों में कानून के नाम पर नंगा नाच है। यहां कोई कानून लागू नहीं होता। कई अखबार तो ऐसे हैं जहां कर्मचारियों को वर्षों से नरेगा मजदूर की तरह वेतन तो मिल रहा है, लेकिन उनके पास संस्‍थान में काम करने का कोई अधिक्रत पत्र नहीं है। ऐसे कर्मचारियों को कभी भी बाहर का रास्‍ता दिखा दिया जाता है। लेकिन अखबारों के सामने सरकार भी नपुंसक की भूमिका में खडी दिख रही है। कानून है तो उसका पालन क्‍यों नहीं हो रहा। इस पर सरकार ने कभी मंथन नहीं किया। सरकार पत्रकारों के वेतन विसंगतियों को दूर क्‍यों नहीं कराती। अखबार मालिकों की मनमानी पर जब तक अंकुश नहीं लगेगा तब तक पत्रकार की आर्थिक स्थिति नहीं सुधरेगी। सरकार ने छठे आयोग के वेतन के अनुसार पत्रकारों को दिलाने के लिए कुरुप आयोग बैठाया, लेकिन उसकी रिपोर्ट आने पर उसे  देश के सभी अखबारों में कड़ाई से लागू क्‍यों नहीं कराया। जब तक कर्मंचारियों के शोषण को लेकर अखबार मालिकों पर सरकार अंकुश नहीं लगाएगी, जब तक अखबारों में काम करने वाले नरेगा पत्रकारों का भला नहीं हो सकता।

पहले अपने गिरेबां में झांको : दुनिया भर की बुराई भलाई प्रकाशित करने वाले अखबारों के मालिकों ने कभी अपने गिरेबां में झांककर नहीं देखा। आखिर अखबारों के कार्यालयों में कितनी खामियां हैं। सरकारी कार्यलयों में तो मच्‍छर भी मर गया तो उसे अखबार की लीड खबर बना दिया जाता है। किश्‍त पर किश्‍त प्रकाशित की जाती है, लेकिन अपने यहां की बुराइयों पर हमेशा पर्दा डालने का ही काम किया है। आखिर ऐसा कब तक चलेगा। सरकार कब चेतेगी।

राजकुमार जैन

पत्रकार

दाउदपुर, अलवर, राजस्‍थान

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0 Comments

  1. bhim manohar

    October 16, 2010 at 10:52 pm

    patrkarita ab ek bojh hai, … jise nizat pana bada mushkil hota hai…
    bhim manohar
    voitv bareilly.

  2. arvind singh

    October 17, 2010 at 1:05 am

    rajkuma jain ji aapane ne samahaar jagat ka yah kadava sacha bayaan kar patrakaroon ki majboori ki asli tasweer prastute kar di hai, sach me aaj apane aapako patrakaar kahane waali biradari kaafi pareshaani ke beecha jine ko majboor hai,fir bhi apani takleef kisi se kah nahi sakati. sarkaaro ko kya padi hai ki o patrakaro ki samasya par dhyan de, is desh me jab garibi, amiri ka astar do chaar gharano ki kamai se pata lagaya jaata hai to patrakaro ki garibi se kisi ko kya lena. sach me bahut sarmanaak jindagi jeene ko majboor hai aaj ka patrakaar,jain sahab hamare jaise patrakaar mumbai shahar me rahakar bahut bade akhabaar samooh ke saath kaam karake bhi aaj apane pariwaar ko nahi samhal pa rahe hai. vetan itana milata hai ki kisi se kahane me sharma lagati hai, aur hamaara samachaar patra samooh apane aap ko bade garva se maharashtra ka doosara sabase bada akhabaar samooh prakaashit karwaata hai. ekdam deepak tale andhera waali kahawat hai yaha.samooh se 5 dainik akhabaar nikalate hai, sabhi sampaadako ko achha vetan diya jaata hai, lekin aur karmachariyo ka jabardast shoshaan kiya jaa raha hai. afso to tab hota hai jab hamaari hi biradari ka hamaara sampadak hameshe hamdardi rakhane ki bjaay hamaari arthik ishthiti par hamara majaak udata hai,kya kare majboori me karani padati hai naukari,

  3. manoj agrawal bhilai (cg)

    October 17, 2010 at 3:40 am

    mr.rk jain ji
    you are absutaly correct, my openion is also same. all mediamen are not well. central govt. must deside for central pay scale.
    manoj agrawal bhilai

  4. Abu Anas

    October 17, 2010 at 4:00 am

    Wriiten by Abu Anas New delhi
    I am agree with your opinion , you have presented the real picture of.exploitataion Jounalists by media Houses.we should launch a compaign against it. Is there any solution of it , how it possible?

  5. Subhash Bahadur

    October 17, 2010 at 5:40 am

    Rajkumar jee aapne bade bebaki se chakachaundh ki duniya ke such ko ujagar kiya hai, aapki himmat ki mai dad deta hoon, aap ke dwara bayan ki huyee sachchayee kisi ek ki nahi, waran pure patrakarita jagat ki hai, lekin duniya ke samasyayon ke bare me likhne walo me aap jaisi himmat aur pahal kee bhi jarurat hai. Qki yah is desh aur samaj kee badkismati hai ki bina aandolan kiye, aawaz uthaye awashyaktayon par dhyan nahi diya jata hai. sarkar bhi bakhubi janti hai ki duniya ke nyay ke bare me dhindhora pitane wale press /channel ke parde ke peechhe ki hakikat kya hai…lekin wah apne purane masal par kayam hai ‘bachcha ke rone par hi maa doodh peelati hai’.

  6. manoj agrawal bhilai (cg)

    October 18, 2010 at 12:46 am

    aajkal patrakaron ki sthiti narega majdooron se badtar hai. jab tak aap chamchagiri nahi karoge tab-tak aap ki tarraki nahi ho sakati. sarkar ko akhabar ka registration tabhi karana chahiya jab malik central pay scale aur facilities na de. yadi malik badamashi karata hai to registration cancil kar dena chahiya. koi ese carrier kaise banaya na to koi pay scale aur na hi noukari ki garantee. ek aisa kanun banana chahiya jisase malik achha paymeny de sake.
    manoj agrawal, bhilai-nagar,cg. 17.10.2010.

  7. sachee

    October 18, 2010 at 2:21 am

    bilkul sahi likha hai…rajkumar ji aapne…

  8. Dharmbir

    October 19, 2010 at 8:50 pm

    राजकुमार जैन ji aap ne sache patarkarita dharm ko nibhaya h. Jo bat sbhi jante hn usko uthakr aap ne jo pahl ki uskeliya sdhuwad

  9. Shikhar Jain

    October 23, 2010 at 11:16 pm

    Dear Mr. Jain,

    I read your views and thinking. You are very right here is need to associate and organized equal idiology media peoples. we and our many friends with you.

    thanks

    Shikhar Jain
    +91-9311280393
    Faridabad
    Haryana

  10. ajeet

    October 25, 2010 at 5:18 pm

    stya bachan

  11. P.N. Sharma

    October 27, 2010 at 8:37 pm

    Rajkumar Ji apke kathan 101% right hai. but sarkar v akhbar maliko ki dono akhen band kiye huai hai. is par midia karmchariyon ko Andolan karna chahia. Janta ko pata ni ki medea karmi Narega Majdoor hai. Andolan karne se Media Maliko ki sachai aa jayegi.
    P.N. Sharma Bharatpur & Radheyshyam Tiwari Alwar

  12. परमानंद / राधेश्याम

    October 28, 2010 at 7:00 am

    राजकुमार जैन साब आपने जो अखबार के कर्मचारी नरेगा मजदूर लेख में जो कुछ लिखा सही लिखा है, वैसे अखबार व पत्रकारों की पीड़ा महज २ या ४ हजार शब्दों में नहीं बयां की जा सकती है। फिर भी आपने जो अखबार वालों को संदेश दिया काबिले तारीफ है। क्योंकि अखबार वाले अन्य दूसरों की खबर को लिख कर लोगों को न्याय दिलाने में सहभागिदार हो सकते है, लेकिन उनकी पीड़ा को सुनने वाला कोई नहीं है। आपने सही लिखा है कि मीडिया कर्मचारियों को श्रम कानूनों के अनुसार वेतन व अन्य भत्ते नहीं दिए जा रहे है तथा इस बात पर केंद्र या राज्य सरकारे चुप बैठी हुई है। मीडिया कर्मचारियों के साथ इस प्रकार का धोखा सरकार कर रही जो सरासर गलत है।
    परमानंद शर्मा, भरतपुर, राजस्थान
    राधेश्याम तिवारी, अलवर, राजस्थान

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