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अखबारों के लिए खतरे की घंटी

अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल कर रहे मीडिया हाउसों पर लगाम लगाने की कवायद केंद्रीय सरकार ने शुरू कर दी है। इसी के तहत पहली  सर्वदलीय बैठक बुलाने की तैयारी सूचना प्रसारण मंत्रालय कर रहा है। इस बैठक में एक ही मीडिया घराने के बहु संस्करण वाले प्रकाशनों पर अंकुश लगाने के बारे में विचार-विमर्श किया जाएगा। मंत्रालय का कहना है कि इस कवायद से एक तो बड़े प्रकाशन समूहों का एकाधिकार टूटेगा और दूसरा अखबारों के बीच प्रतिस्पर्धा/होड़ बढ़ेगी।

अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल कर रहे मीडिया हाउसों पर लगाम लगाने की कवायद केंद्रीय सरकार ने शुरू कर दी है। इसी के तहत पहली  सर्वदलीय बैठक बुलाने की तैयारी सूचना प्रसारण मंत्रालय कर रहा है। इस बैठक में एक ही मीडिया घराने के बहु संस्करण वाले प्रकाशनों पर अंकुश लगाने के बारे में विचार-विमर्श किया जाएगा। मंत्रालय का कहना है कि इस कवायद से एक तो बड़े प्रकाशन समूहों का एकाधिकार टूटेगा और दूसरा अखबारों के बीच प्रतिस्पर्धा/होड़ बढ़ेगी।

यह सब करने के पीछे सोच कैसे पैदा हुई,  इसकी भी एक रोचक कहानी है। पिछले हफ्ते सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति की एक बैठक हुई थी। बैठक में समिति के सदस्यों ने प्रिंट मीडिया के बेपनाह विस्तार और उसके सियासी मामलों में तानाशाहीपूर्ण दखलंदाजी पर चिंता जताई। सदस्यों का कहना था कि प्रिंट मीडिया ओपिनियन मेकर बनकर अपनी इच्छाएं थोप रहा है। कभी-कभी अखबार ऐसी खबरें चला देते हैं जिससे किसी नेता की जिदंगी भर की कमाई चली जाती है और उसका कैरियर बर्बाद हो जाता है। बाद में खबर गलत निकल जाती है पर वह मीडिया घराना गलती तक मानने से इनकार कर देता है।  

संयुक्त राज्य अमेरिका में इस तरह का कानून है। वहां एक अखबार दूसरे स्थान से उसी नाम से प्रकाशित नहीं किया जा सकता जबकि भारत में एक ही अखबार के कई जगहों से संस्करण निकलते हैं। प्रिंट मीडिया के बढ़ते रूतबे से सभी राजनीतिक दल परेशान हैं। परेशानी की एक वजह यह है कि अखबार प्रकाशित करने वाले कुछ घराने कभी किसी सरकार के पक्ष में तो कभी किसी के विरोध में राय बनाने के लिए सर्वे कराते हैं। मीडिया चूंकि संवेदनशील और प्रभावशाली है, इसलिए कोई भी सरकार सीधे हस्तक्षेप करने से कतराती है। यही कारण है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सर्वदलीय बैठक बुलाने का फैसला किया है।

बैठक के एजेंडे में चार बातें शामिल हैं। एक-आ॓पिनियन बनाने की प्रिंट मीडिया की आदत को कैसे तोड़ा जाए, दो- बहुसंस्करणों का प्रकाशन प्रतिबंधित किया जाए ताकि किसी का एकाधिकार न हो और बाजार में प्रतिस्पर्धा बनी रहे। तीन-प्रेस काउंसिल को मजबूत कैसे किया जाए और चार-अखबारों में पत्रकारों की दुर्गति और प्रबंधकों का बढ़ता दबदबा कैसे खत्म किया जाए ताकि स्वस्थ पत्रकारिता हो सके।

कुल मिलाकर यह कवायद खतरे की घंटी तो है ही मीडिया के लिए, साथ में आत्मचिंतन का मौका भी दे रही है। अगर मीडिया घरानों ने केवल और केवल मुनाफा कमाने के लिए मीडिया होने का इस्तेमाल कर रहे हैं और अपनी ताकत के बल पर किसी को भी नीचे-उपर कर दे रहे हैं तो उन्हें अब सोचना चाहिए कि अगर वे ऐसा ही करते रहे तो एक दिन आम जनता भी सरकार की किसी भी कार्रवाई के पक्ष में खड़ी नजर आएगी। मतलब, आत्मअनुशासन मीडिया को खुद अपने पर लागू करना चाहिए।

(साभारः राष्ट्रीय सहारा)

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