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अन्‍ना से प्‍यार और शर्मिला की अनदेखी कर रहा है मीडिया

जनलोकपाल बिल मंजूर करने के लिये अण्णा हजारे ने नई दिल्ली में अनशन शुरू किया है,  यह मार्ग कोई नया नहीं है. महात्मा गांधी के शुरू किये गए इस मार्ग को विश्व भर के लोगों ने स्वीकार किया है। भारत में अमरजीवी पोट्टी श्रीरामुलू, स्वामी निगमानंद ने आमरण अनशन कर देह त्याग का मार्ग स्वीकार किया।

जनलोकपाल बिल मंजूर करने के लिये अण्णा हजारे ने नई दिल्ली में अनशन शुरू किया है,  यह मार्ग कोई नया नहीं है. महात्मा गांधी के शुरू किये गए इस मार्ग को विश्व भर के लोगों ने स्वीकार किया है। भारत में अमरजीवी पोट्टी श्रीरामुलू, स्वामी निगमानंद ने आमरण अनशन कर देह त्याग का मार्ग स्वीकार किया।

इरोम शर्मिला चानू नामक युवती मणिपुर से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून 1958 हटाने की मांग को लेकर 10 वर्ष से अधिक समय से अनशन कर रही है।   मणिपुर के मानवाधिकार कार्यकर्ता मुख्यधारा की भारतीय मीडिया से खफा हैं। उनकी नाराजगी का कारण है राष्ट्रीय मीडिया द्वारा भ्रष्टाचार के विरोध में अनशन कर रहे अन्ना हजारे को इरोम चानू शर्मिला से ज्यादा तरजीह देना। शर्मिला सुरक्षा बलों द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन के विरोध में 11 वर्षों से अनशन कर रहीं हैं,  इसके बावजूद मीडिया द्वारा शर्मिला के इस आंदोलन की अनदेखी की जा रही है।

शर्मिला सुरक्षा बलों द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन के विरोध में 11 वर्षो से अनशन कर रहीं हैं. शर्मिला के बड़े भाई और मानव अधिकार कार्यकर्ता सिंघाजीत सिंह ने बताया, “सामान्यत: यह महसूस किया जाता है कि हम उत्तरपूर्व के लोगों के साथ हमेशा भेदभाव और उपेक्षा की जाती है और शेष भारत द्वारा हमें हीनता से देखा जाता है। देखिए अन्ना का अनशन मीडिया की सुर्खियों में है जबकि हमारी शर्मिला 11 वर्षों से अनशन कर रही है।”

मणिपुर की ‘लौह महिला’ के नाम से पहचानी जाने वाली शर्मिला ने नवंबर 2000 में इम्फाल हवाई अड्डे के निकट असम राइफल्स के कर्मियों द्वारा की गयी कथित मुठभेड़ में 10 नागरिकों की मौत होने के बाद अपना अनशन शुरू किया था. 1942  में भारत छोड़ो आन्दोलन को दबाने के लिए जो अधिनियम बना था लगभग हूबहू वही ‘आफ़्स्पा’  के रूप में आजाद भारत की सरकार ने अपने देश के कुछ हिस्सों पर लगाया। इस कानून की आड़ में पिछले 50  साल से सेना ने अपना बर्बर राज मणिपुर व अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में चला रखा है। लूट, बलात्कार, मार-पीट, हत्या आदि का इस्तेमाल आम जनता के खिलाफ़ तथाकथित रूप से उग्रवाद को दबाने के लिए किया जाता है,  परन्तु सच यह है कि पिछले 50  सालों में इस क्षेत्र में राज्य के दमन और मुख्य धारा से काटे रखने की प्रतिक्रियास्वरूप उग्रवाद बढ़ा ही है।

मालोम गाँव के बस स्टॉप पर बस के इन्तज़ार में खडे़ 10 निहत्थे नागरिकों को उग्रवादी होने के सन्देह पर मार दिया गया।  इस घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप २ नवम्बर २००० को शर्मिला ने आफ़्स्पा हटाये जाने के लिए आमरण अनशन शुरू किया। शर्मिला अपने राज्य में पिछले 51 सालों से लागू आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट, 1958  ( सैन्य बल विशेष शक्तियाँ कानून, 1958 ) यानी ‘आफ़्स्पा’  के खिलाफ़ सत्याग्रह कर रही हैं। इस राक्षसी कानून के अन्तर्गत सैन्य बलों को-  बिना वॉरण्ट के गिरफ़्तारी और तलाशी की छूट,  सिर्फ शक के बिना पर गोली चलाकर जान से मारने की छूट, आम कानूनी कार्रवाई से छूट (दण्ड मुक्ति) मिली हुई है

इस कानून को वापस लेने की मांग के चलते शर्मिला को कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार हासिल हो चुके हैं और विभिन्न सामाजिक संगठनों तथा नेताओं ने उन्हें समर्थन दिया है. छह नवम्बर 2000 यानी हड़ताल शुरू करने के तीसरे दिन ही पुलिस ने उन्हें आत्महत्या के प्रयास के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया था. तभी से जेल भेजी जाती हैं, छूटती हैं, फिर जेल भेज दी जाती हैं. जेल में नाक से नली लगाकर उन्हें जबरदस्ती भोजन दिया जाता था. उनका संघर्ष नायाब है.

गांधीजी के सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांत पर चलकर इनका संघर्ष बेमिसाल है। शासकीय दमन के खिलाफ़ शर्मिला अकेली आवाज नहीं हैं। 2004  में असम राइफल्‍स के जवानों ने मनोरमा नाम की महिला का बलात्कार कर उसकी नृशंस हत्या कर दी थी। इस घटना के विरोध स्वरूप अधेड़ मणिपुरी महिलाओं ने सीआरपीएफ़ के मुख्यालय के सामने निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया। इंसान से उसकी गरिमा और लोकतांत्रिक अधिकार छीन लेने वाले प्रशासन के प्रति यह इन महिलाओं के गुस्से का इजहार था और आधुनिक भारतीय राष्ट्र के लिए के शर्मनाक घटना। दूसरी तरफ शर्मिला के इस संघर्ष में कई और जांबाज साथिनें भी 10 दिसंबर 2008 से जुड़ गई हैं- मणिपुर के कई महिला संगठन पिछले साल से ही रिले भूख हड़ताल पर प्रतिदिन बैठ रहे हैं. सैन्य दमन की सभी घटनाओं में सरकार द्वारा दोषियों के खिलाफ़ सन्तोषजनक कार्रवाई नहीं की गई है।

महात्मा गांधी के सत्याग्रह की राह पर चलकर अनशन के मार्ग से जिन्हों ने लोगों को दिलाया हक :

स्वामी निगमानंद :  गंगा एवं कुंभ मेला क्षेत्र को खनन माफियाओं के चंगुल से मुक्त कराने की मांग को लेकर आमरण अनशन करने वाले स्वामी निगमानंद ने 72 दिनों तक बिना खाए अनशन करने का रिकॉर्ड बनाया था, परंतु इस बार उनकी तबीयत ज्यादा इतनी खराब हो गई कि उन्हें बचाया न जा सका निगमानंद का अनशन गंगा की रक्षा के लिए था। उन्होंने 19 फरवरी को अपना अनशन शुरू किया था। मांग थी कि गंगा के किनारे चलनेवाले सभी स्टोन क्रेशर बंद किए जाएं। 12 में से 11 क्रेशर तो बंद हो गए, लेकिन एक हिमालयन क्रेशर अभी भी चालू था। निगमानंद इसी के विरोध में हरिद्वार में 74 दिन से अनशन पर बैठे थे। विडंबना इस बात की है कि स्वामी निगमानंद की मौत उसी हिमालयन अस्पताल में हुई जहां भर्ती बाबा रामदेव का अनशन तुड़वाने के लिए प्रदेश की भाजपा सरकार और संत समाज ने जी-जान एक कर दिया था।

रासय्या पार्तीपन उर्फ थीलप्पन : श्रीलंका के “लिबरेशन टायगर्स ऑफ तमिल इलम” (एलटीटीई)  जैसे आतंकी संघटन के राजकीय विभाग के सदस्य रासय्या ने तामिलों के साथ होने वाले अन्याय के विरोध मे 15  सितम्बर 1987  को आमरण अनशन शुरू किया,  इस मांग के साथ ही उस ने और कई मांग रखी थी, लेकिन श्रीलंका सरकार ने उस की तरफ ध्यान नहीं दिया। उसकी मांगों को नजरअंदाज कर दिया। इस के बाद 26  सितम्बर 1987  को रासय्या की मौत हो गई।

पोट्टी श्रीरामुलू : अलग आंध्र प्रदेश राज्य की मांग को लेकर आमरण अनशन करने वाले और उस के लिये अपनी जान देने वाले नेता के तौर पर पोट्टी श्रीरामुलू की पहचान है। तत्कालीन मद्रास राज्य से तेलगुभाषियों का अलग राज्य आंध्र प्रदेश बनाने के लिये 19  अक्तूबर 1952  को उन्हों ने आमरण अनशन शुरू किया। मद्रास शहर आंध्र प्रदेश में आये ये उनकी इच्छा थी। 15  दिसंबर को उनकी मौत हो गई। उनकी मौत तक केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश के लिये स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया था। उस के बाद लोकभावना को देखते हुये नेहरु सरकार ने घुटने टेक दिए और देश में पहली बार भाषा के आधार पर राज्य बनाने की स्वीकृति देकर सरकार ने आन्ध्र प्रदेश राज्य का गठन कर दिया। इसी का नतीजा था कि राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना हुई और देश में पहली बार भाषा के आधार पर राज्यों के गठन को मंजूरी दे दी गई। अलग आंध्र प्रदेश का निर्माण किया गया।

मास्टर तारा सिंह :  पृथक पंजाब मांग को लेकर 15 अगस्त 1961 से भूख हड़ताल शुरू किया और 1966  में हरियाणा व हिमाचल से अलग पंजाब राज्य बनाना पड़ा।

अमृता देवी : 70 के दशक में पूरे भारत में जंगलों की कटाई के विरोध में एक आंदोलन शुरू हुआ जिसे चिपको आंदोलन के नाम से जाना जाता है। इस आंदोलन का नाम चिपको आंदोलन इसलिए पड़ा क्योंकि लोग पेड़ों को बचाने के लिए उनसे चिपक या लिपट जाते थे और ठेकेदारों को उन्हें नहीं काटने देते थे। बहुत कम लोगों को ये ज्ञात होगा कि भारत के कई समुदाय सदियों से प्रकृति संरक्षण में पूर्ण रूप से लगे हुए हैं, ऐसा ही एक समुदाय है राजस्थान का बिशनोई समुदाय। मूल रूप से चिपको आंदोलन की शुरुआत करीब 260 वर्ष पूर्व 18वीं सदी में बिशनोई समुदाय द्वारा की गई। करीब 84 गांव के लोगों ने अमृता देवी के नेतृत्व में जोधपुर के महाराज के आदेश के बावजूद पेड़ों को काटने का विरोध किया और अपनी जान दे दी। इस घटना के बाद महाराजा ने सभी बिशनोई समुदायों के गांवों में पेड़ों की कटाई पर रोक लगाने का न्यायिक आदेश दिया।

ममता बनर्जी : सिंगूर में उद्योग लगाने के लिए किसानों से अधिग्रहित की गई जमीन वापस करने कि मांग को लेकर आंदोलन किया,  उस के लिये कोलकाता में 25  दिनों तक भूख हड़ताल की। इस के बाद किसानों को उनका हक मिला।

बाबा आम्टे :  नर्मदा नदी बचाने और कुष्ठ पीड़ितों को हक मिलने की मांग को लेकर बाबा आम्‍टे ने लम्‍बे समय तक भूख हड़ताल की। आखिरकार केंद्र सरकार को झुकना पड़ा।

लेखक नागमणी पाण्‍डेय मुंबई में हमारा महानगर से जुड़े हुए हैं.

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0 Comments

  1. Ajit Kumar Mishra

    August 27, 2011 at 1:58 pm

    आती है शर्म हमको पर उनकी आँख झुकती भी नहीं,
    जाती है जान तो जाये पर उनकी आँख उठती भी नहीं.

  2. Dr. Vishnu Rajgadia

    August 27, 2011 at 5:15 pm

    इस मामले को सही मौके पर सामने लाने के लिए भड़ास4मीडिया तथा मणिपुर के सामाजिक कार्यकत्र्ताओं को धन्यवाद। सच है कि अन्ना के अनशन को जैसा कवरेज मिला, वैसा दस साल से अनशन पर बैठी इरोम चानु शर्मिला को कभी नहीं मिला। लेकिन इसे मीडिया द्वारा अनदेखी के बदले मूलतः शासन द्वारा शर्मनाक अनदेखी के बतौर देखना ज्यादा उचित होगा। भारतीय शासन-व्यवस्था ने शर्मिला घोर उपेक्षा करके लोकतंत्र पर सवाल खड़े किये हैं। हमें चिंता इस बात की करनी चाहिए। तभी हम किसी नतीजे और न्याय की ओर बढ़ सकेंगे।
    अन्ना जैसे आंदोेलनों के मौके पर इसे मिलने वाले कवरेज को कुछ लोग इरोम चानु शर्मिला जैसे आंदोलनों के साथ विरोध के रूप में दिखाने की कोशिश करते हैं। जबकि अन्नांदोलन को मिला कवरेज वाजिब है। मीडिया तो जहां समाचार होगा, वहां जाता है। अन्ना को इतना व्यापक जनसमर्थन नहीं होता, तो मीडिया इसकी भी अनदेखी ही करता। दूसरी ओर, अगर शर्मिला के लिए लोग मोमबत्ती लेकर उतरें तो मीडिया हाजिर दिखेगा। इसलिए इरोम के लिए चिंतित साथियों को अन्ना या मीडिया के बजाय हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की इस गैरजिम्मेवाराना हरकत पर केंद्रित करना चाहिए, जिसे जवाबदेह और लोकतांत्रिक बनाने में अन्ना हजारे जुटे हैं। अन्ना का आंदोलन इरोम के हितों के अनुकूल है न कि प्रतिकूल। कुछ लोग ऐसे जनांदोलनों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने लगते हैं जबकि दोनों एक ही बुनियादी समस्या के शिकार हैं। दोनों उसी से लड़ रहे हैं। अन्ना की जीत में शर्मिला की भी जीत है और शर्मिला की हार में अन्ना की भी हार होगी। आज अन्ना की जीत से इरोम चानु शर्मिला के आंदोलन को बढ़ाने में मदद मिलेगी।
    मणिपुर के साथियों को चाहिए कि अभी लोहा गरम है, इसका उपयोग करें। देश भर में सड़क पर उतरे नागरिकों एवं संगठनों का एक नेटवर्क बनाकर सबको जोड़ने का प्रयास करें। मैं इसके लिए कुछ सुझाव देना चाहूंगा और चूंकि मुझे अभी तक किये गये प्रयासों और जारी प्रयासों की कोई जानकारी नहीं, इसलिए अगर पुनरावृति कर रहा हूं तो क्षमा करेंगे। सुझाव-
    1.राष्ट्रीय स्तर पर एक समूह बनाया जाये जिसका नाम इरोम चानु शर्मिला को न्याय दो जैसा कुछ हो।
    2.टीम अन्ना से बात करके किसी एक तिथि पर इरोम चानु शर्मिला को न्याय दो दिवस राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाये जिसमें एक दिवसीय उपवास रखा जाये। इस दिन अन्ना हजारे मणिपुर में शर्मिला के पास हों और उनके प्रमुख सहयोगी प्रमुख राज्यों की राजधानियों में उपवास का नेतृत्व करें।
    3.इरोम चानु शर्मिला को न्याय दो अभियान का वेबसाइट और फेसबुक ग्रूप बनाया जाये तथा इंडिया अगेन्स्ट करप्शन व अन्य समूहों से जुड़े लोगों को इसमें जोड़ा जाये।
    4.देशभर की लोकतांत्रिक शक्तियों के नाम पर अपील भेजकर सबको इस अभियान से जोड़ने की कोशिश हो। विदेशों में भी भारतीय समूहों को अपील भेजी जाये।
    5.अगर आनलाइन पीटिशन नहीं बना है, तो बनाया जाये, अगर है तो उस पर कम से कम एक लाख हस्ताक्षर का टारगेट रखा जाये।
    6.मणिपुर के सांसदों के दिल्ली स्थित आवास पर धरना दिया जाये।
    7.इरोम चानु शर्मिला मामले में सूचना का अधिकार के तहत मांगे जाने लायक सूचना के कुछ आवेदन राज्य एवं केंद्र सरकार के लिए अलग अलग बनाये जायें और उन्हें देशभर के नागरिक अपने अपने नाम से जमा करके सूचना मांगें।
    मुझे पूरी उम्मीद है कि यह जिस तरह का मामला है, उसे अपना विषय बनाने में टीम अन्ना का पूरा सहयोग मिलेगा। मैं अपनी सीमाओं का ध्यान रखते हुए भी ऐसे प्रयासों से जुड़ने के लिए तत्पर हूं। इस संबंध में मेरे ईमेल पर चर्चा की जा सकती है।
    समय आ गया है जब एक नयी लोकशाही के लिए हर नागरिक आगे बढ़कर इरोम चानु शर्मिला की दस साल से जारी उपेक्षा का हिसाब मांगे।

  3. sudarshan

    August 27, 2011 at 5:54 pm

    kyuki sharmila k sath JAN SAMARTHAN nahi hai

  4. Pratiman

    August 29, 2011 at 11:26 am

    Sir,
    I had posted the information about Irome Chanu Sharmila on my facebook profile on August 25, 2011 titiled “Lady Anna on Hunger Strike for more than 11 years”. The post had received huge feedback.

    We have to spread her message through facebook or any other social network website to make people aware…

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