उत्तर प्रदेश में जिला सूचना कार्यालयों में किस तरह की स्थिति है, इसकी बानगी मेरठ से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र से देखने को मिलता है. माया सरकार में पत्रकार बिरादरी इस समय पुलिस, प्रशासन, बदमाश, मंत्री सभी के निशाने पर हैं. उन्हें परेशान करने का सिलसिला जोरशोर से चल रहा है.
मेरठ के रहने वाले राजेन्द्र सिंह विष्ट ने एक पत्रिका के लिए आवेदन किया था. उनके आवेदन का क्या हुआ यह उनके द्वारा लिखे गए पत्र से स्पष्ट है. सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि उन्होंने जिलाधिकारी कार्यालय में 30 सितम्बर को आरटीआई दाखिल किया था. एक महीना से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी उनके सवालों का जवाब नहीं मिल पाया है. नीचे उनके द्वारा सूचना अधिकार के तहत लिखा गया पत्र-
सेवा में,
मान्य महोदय
निवेदन यह है कि मेरे द्वारा लगभग तीन माह पूर्व मेरठ स्थित उप निदेशक सूचना विभाग के कार्यालय मे एक पत्रिका के शीर्षक पंजीकृत कराने हेतु आवेदन पत्र प्रस्तुत किया था। जिसे सूचना विभाग से लोकल इन्वेस्टीगेशन यूनिट (एलआईयू) को भेज दिया गया। एलआईयू ने मेरे आवेदन पत्र की पूर्ण जांच कर अपनी रिर्पोट प्रेषित कर दी लेकिन मेरठ सूचना विभाग कार्यालय मे कार्यरत सुरेन्द्र शर्मा से इस संबंध मे कई बार बात की गई तो उन्होंने टरकाना शुरू कर दिया। इसके उपरान्त एक दिन मैं अपने मित्र अधिवक्ता अंकित मोहन शर्मा को लेकर सुरेन्द्र शर्मा से शीर्षक के संबंध में मिलने गया तो उन्होंने काफी अपशब्दो का प्रयोग किया और कोई भी सन्तोषजनक जवाब नही दिया। मुझे यह भी दर्शाने का प्रयास किया कि तू एक गरीब आदमी है, कहां से पत्रिका चलाएगा और तेरी औकात ही क्या है? सुरेन्द्र शर्मा द्वारा इस प्रकार के अपशब्दो का प्रयोग बहुत ही अशोभनीय है। इसके साथ-साथ सुरेन्द्र शर्मा ने यह भी कहा कि बिना रिश्वत के कोई भी शीर्षक पंजीकृत नहीं होता है। क्या तू इतना खर्चा झेल सकता है? इस बात पर मेरे मित्र अंकित मोहन शर्मा द्वारा सुरेन्द्र शर्मा जी को यह समझाया गया कि आप इस प्रकार के शब्दो का प्रयोग ना करें अन्यथा आपकी शिकायत कंरूगा। इस पर सुरेन्द्र शर्मा ने कहा कि मैं 24 वर्ष से इस सूचना विभाग मे कार्यरत हूं, मेरा आज तक कोई कुछ नही कर पाया। इस कारण मैं आरटीआई के माध्यम से कुछ सवालों के जवाब चाहता हूं जो कि क्रमवार है-
धन्यवाद।
1. क्या इस स्वतंत्रा भारत मे अमीर और गरीब का फर्क मानते हुऐ गरीब आदमी को कुछ भी कार्य करने का हक नही है?
2. क्या सूचना अधिकारी द्वारा कहे गये अपशब्द अशोभनीय नही है?
3. क्या सूचना अधिकारी पीसीएस व आईएएस लेवल का अधिकारी नहीं होना चाहिए?
4. क्या सूचना विभाग मे श्री सुरेन्द्र शर्मा का एक ही स्थान पर 24 वर्ष तक बने रहना चौंकाने का विषय नही है?
5. क्या सूचना विभाग के अन्दर कार्यवाहक सूचना अधिकारी द्वारा अवैध वसूली सही है?
6. क्या सूचना विभाग से मेरी पत्रिका का कभी पंजीकरण हो पायेगा, एलआईयू रिर्पोट सही होने के बाद भी?
7. क्या सूचना अधिकारी को अंगूठा छाप व्यक्तियों को संपादक बनाने का अधिकार है, अगर है तो जहां के सूचना अधिकारी का यह हाल है तो वहां के सम्पादक और पत्रकारों की क्या स्थिति होगी?
दिनांक- 30 सितम्बर 2010
प्रार्थी
राजेन्द्र सिंह बिष्ट
मोः 09837034381
09027203253
द्वारा
अधिवक्ता गोविन्द मोहन शर्मा
मेरठ कोर्ट मेरठ।
मोः 09837034381











