Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

साहित्य

अब मैं मध्यवर्गीय छाया से बाहर थी और खुदमुख्तार थी

जब मैं दिल्ली आई, तो यहां भी एक गली-एक सड़क मिली, जिसे रेडलाइट एरिया मानते हैं, जीवी रोड। पत्रकार होने के नाते वहां जाने मिलने और समझने की हिम्मत आ गई थी। नैतिकता को रोड़ा खत्म हो चुका था। मेरे भीतर का दकियानूसी का जो शहर था, वो उजड़ चुका था।

जब मैं दिल्ली आई, तो यहां भी एक गली-एक सड़क मिली, जिसे रेडलाइट एरिया मानते हैं, जीवी रोड। पत्रकार होने के नाते वहां जाने मिलने और समझने की हिम्मत आ गई थी। नैतिकता को रोड़ा खत्म हो चुका था। मेरे भीतर का दकियानूसी का जो शहर था, वो उजड़ चुका था।

आफिस में जीवीरोड की जो भी खबरे आती तो मैं ही देखती थी। तब से आज तक उन्हें जानने की उत्सुकता खत्म नहीं हुई। जहां जहां गई, जिस शहर में, जिस देश में, वहां के रेडलाइट एरिया के बारे में पता करना शुरू किया। वहां वक्त बिताया, बिना किसी डर या संकोच के। अब मैं मध्यवर्गीय छाया से बाहर थी और खुदमुख्तार थी। और सबसे बड़ी बात कि ये मेरे काम का हिस्सा था, सो संकोच नहीं रहा। सोनागाछी की सेक्सवर्करो ने जब आंदोलन छेड़ा तब कोलकाता जाकर उनके बारे में लंबी स्टोरी लिखी। कुछ देशो के रेडलाइट एरिया के नजारो पर भी लिखा। उनकी सामजशास्त्रीय ढंग से व्याख्या भी की। उनके दुख दर्द को करीब से समझने जानने का खूब मौका मिला। केरल की मशहूर सेक्सवर्कर नलिनी जमाली की आत्मकथा पढने के बाद कोट्टायम गई और वहां की सेक्सवर्कर के साथ लंबी बातचीत की, उनके अनुभव सुने। जो इस किताब में शामिल है।

दुनिया की नजर में वे चाहे जो हों, बुरी, अछूत, गंदी, लेकिन मेरी नजर में वे दैहिक श्रमिक हैं। उनके सामने दुनिया ने जब कोई रास्ता नहीं छोड़ा और सड़क या कोठे पर ला खड़ा किया तो वे क्या करती। ‘ईजी मनी’ कमाने की राह पर चलने वाली लड़कियां इनमें शामिल नहीं है। वो अलग मामला है। मेरी सहानूभूति उनसे है जो किसी मजबूरी में, अपनी मर्जी के खिलाफ इस धंधे में उतर गई हैं या उतार दी गई हैं।

अपने बचपन में जगी उत्सुकता धीरे धीरे उनके प्रति सदभाव में बदलती चली गई। फिर दुनिया देखने का मौका मिला। देश के कुछ चुनिंदा ठिकाने देखने के बाद दुनिया की खिड़की से झांकने का मन था। पिछले पांच सालों में ये मौका खूब मिला। कई विकसित और विकासशील देशों की ऐसी लड़कियों की दुनिया को करीब से महसूस करने का मौका मिला। वहां कई कई दिन प्रवास करने का मौका मिला। लगभग कई रातें गुजारी उन गलियों की तलाश में, अपने लोकल गाइड और दोस्तो की सहायता भी ली। न्यूजर्सी में रह रहे मेरे मित्र सुब्रत शॉ ने अपने शर्मीलेपन के बावजूद मेरे इस काम में भरपूर मदद की, वहां -वहां ले गए, साथ रहे जहां जाना जरुरी था। चीन में हमने खुद ‘पराक्रम’ किया और भीतर तक घुस कर नजारा देख आए। वहां अजनबीपन नहीं था। हिंदी गानों के इतने रसिया थे उस गली में कि हमें अखरा ही नहीं।

इनके बारे में पढा भी बहुत। जहां जो भी छपता उसे पढ डालती। समाज जितना इनका नाम लेकर गाली देता या इनसे दूरी बनाता, मैं अपने भीतर कभी इनके प्रति नफरत नहीं पाती, उल्टा आकर्षण और बढ जाता। इनके रहने की जितनी प्रमुख जगहें थीं, वो मैंने छान डाली। काफी वक्त भी वहां बिताए, घंटो उनसे सवाल किए, जवाब पाए। उनकी आत्मा का चित्कार भी सुना और ठसकवालियां भी देखीं। सोनागाछी की सपना गाएन ठसकवाली ही है, जो रोज शाम को एक ‘क्लाएंट’ निपटाती हैं, जिन्हे वे बाबू कहती हैं। बाबू के प्रति वे समर्पित हैं। उनका खरचा बाबू ही चलाते हैं। इसीलिए वे और ग्राहक नहीं तलाशती। शाम को डयूटी पर जाती है, और सुबह अपने ठिकाने वापस। बड़े शान से ये सब बताती भी हैं। वैसे भी देह की दुनिया में सोनागाछी का तेवर सबसे अलग है।

दरअसल, पहले मुझे लगता था कि दैहिक श्रम सिर्फ विकासशील, गरीब देशो की त्रासदी होती है। विकसित देशों में शौकिया कोई करे तो करे, ये पेशा मजबूरी नहीं होगी। समाजों का फर्क तो होना चाहिए था।  बंद और कुंठित समाज की मान्यताएं और विवशताएं यहां तक कि जरुरतें भी अलग किस्म की होती हैं। मगर मेरा भ्रम टूट गया। औरतो और सेक्स के मामले में सोच एक बिंदु पर मिली दिखाई दी। पेट की भूख और देह की भूख एक सी जलाती है। कोई फर्क नहीं। दलालों की वही मंडी वहां भी है। मारकाट वहां भी मची है। बोलियां वहां भी लगाई जा रही है। फर्क बस इतना कि जहां लाइसेंस मिला है वहां शोषण कम है। लड़कियां अपनी मर्जी से धंधे में आ रही हैं। बेरोजगार लड़कियों की फौज यहां आसान पैसा बनाने के चक्कर में इस अंधी गली में घुस आती हैं। बाहर जाने का रास्ता भी उनकी अपनी मर्जी से खुलता है। मगर बंद समाजों में ये आजादी कहां।

जिस देश की सारी बौद्धिकता वजिर्निटी के इर्द गिर्द घूमती हो वहां धंधेवालियों का अपने परंपरागत पेशे से रिहाई एक सपना भर है। हो सकता है सुधिजनों को मुझसे असहमित हो, उनकी असहमति का स्वागत है, मगर मैं तवायफों को तब भी कलाकार मानती थी, जिन्होंने अपने कोठो पर नाच, गीत संगीत, शास्त्रीय संगीत को जिदा रखा था। आज भी वहीं मानती हूं…और उनके धंधे को दैहिक श्रम का दर्जा देती हूं। जिसको जो मानना है माने। कोठों के इतिहास पर नजर डालें, कितने मशहूर नाम मिल जाएंगे जिनके दम पर शास्त्रीय गायन जिंदा हैं। अलग से नाम गिनाने की जरूरत नहीं शायद। इतिहास ने तो उनको इज्जत भी दी है। एक स्त्री होने के नाते एक सेक्सवर्कर के बारे में जानने की स्वभाविक इच्छा जब मेरे प्रोफेशन का हिस्सा हो गई तो बचपन की उत्सुकता और दिलचस्पी को साथ लेकर मैं इस दुनिया को और भी करीब से जानने-और पहचानने लगी। मैं तो इनके जीवन पर गहरा शोध करना चाहती थी। ये किताब शोध तो नहीं मगर शोध जैसा ही कुछ है।

अब बात कुछ इस किताब के बारे में…कुछ विद्वान वेश्या शब्द को वैश्य शब्द के कारण ही उत्पन्न हुआ मानते हैं। देह का यह व्यवसाय जिसे हम वेश्यावृति कहते हैं, संभवत व्यापारिक विकास से आया। एसा नहीं है कि यह पेशा सिर्फ व्यापार के कारण ही अस्तित्व में आया। हां, यह जरुर कहा जा सकता है कि इसके कारण यह फला फूला होगा। यह बहुत साधारण सा तथ्य है कि सामान्यत इस मनोरंजन के लिए सरप्लस मनी का ही उपयोग होता था। परंतु जब धीरे धीरे यह सामाजिक प्रथा के रुप में पहचान पाने लगी तब प्रतिष्ठा और प्रतिष्ठित होने का मापक भी बन गई। यह प्रथा दूसरे कुछ रुपो में धार्मिक प्रथा के रुप में भी परिवर्तित हो गईं। दक्षिण भारत की देवदासी प्रथा इसी तरह की दुखद कड़ी है। अक्षत कन्याओं का देवताओं के साथ विवाह का स्वांग और फिर वेश्यावृति।

xxxxx

घर से ज्यादा बाहर शोर था- “चतुर्भूज स्थान की सबसे सुंदर और मंहगी बाई आई है।” बारात के साथ में आई थी बाई, लेकिन बाई को लेकर लोगों में जो उत्सुकता थी, वो बारात आने के उत्साह से कहीं ज्यादा थी। जिधर देखो एक ही चर्चा-“बाबा की पोती की शादी में चतुर्भूज स्थान की सबसे सुंदर और मंहगी बाई आई है। रात को मजमा लगेगा।” एक किस्म के गर्व से घऱ के बड़े-बूढ़ों का सीना चौड़ा हो गया था। लड़के वालो ने मंहगी बाई लाकर खानदान की इज्जत जो रख ली थी। बारात का स्वागत जोर-शोर से हुआ और उससे भी ज्यादा फिक्र रात के मजमे को लोकर लोगों में थी। देर रात महफिल जमी। महफिल यानी बड़ा सा शामियाना, लेकिन चारो तरफ से ढंका हुआ। बरात और शरात पक्ष के लोग बैठे। एक तरफ से लोगों की आवजाही और उस आवाजाही में अवांछित तत्वों को तलाशती बूढ़ों की आंखें, क्योंकि क्या पता इधर महफिल रंग लाए और उधर कोई बवाल शुरु कर दे। आखिर बाईजी का नाच शुरु हुआ। घऱ की औरतों को ऐसा नाच देखने की मनाही तो होती है, लेकिन  घर की औरतें छुप-छुप कर  देख ही लेती हैं। उस रात भी यही हुआ। नाच शुरु हुआ। उसके पहले साजिंदो ने माहौल संगीतमय कर दिया था। संगीत के प्रति मेरी दीवानगी बार बार शामियाने में मुझे खींच रही थी। मगर अंदर जाने की किसी को इजाजत नहीं थी। मैं आस-पास मंडरा रही थी कि किसी तरह एक बार उन्हें करीब से देख सकूं। मेरे लिए वे कलाकार थीं, नाचने और गाना गाने वाली। उधर मंडप पर दीदी की शादी के रस्म पूरे हो रहे थे और इधर शामियाने के अंदर की दुनिया को करीब से देखने का मोह मुझे छोड़ नहीं रही थी। मैंने घर के तमाम बच्चों को साथ लेकर, पीछे से शामियाने की सीवन उघेड़ कर आंख भर जगह बनाई और सब दिखने लगा।वो बेहद सुंदर थी। गोरी चिट्टी, सजी धजी, हिरोइन जैसी, लंहगे चोली में।  बारी बारी से सब देखते। मुझे गुस्सा आ रहा था कि हमें क्यो नहीं बैठने दे रहे। हम क्यों नहीं देख सकते ये नाच। तभी पता चला कि चतुर्भूज स्थान की सबसे सुंदर और उस मंहगी बाई  का नाम है रानी बाई।

खैर.. रानी बाई ने नाचना गाना शुरु किया…”चाल में ठुमका, कान में झूमका…कमर पे चोटी लटके..हो गया दिल का पुरजा पुरजा”। लगे पचासो झटके। शामियाने में जोर से सिसकारियां गूंजी। कोने से कोई उठा गाता हुआ..वो तेरा रंग है नशीला,,अंग अंग है नशीला…पैसे फेंके जाने लगे, बलैया ली जाने लगीं। रानी बाई के साथ और भी लड़कियां थीं, वो भी ठुमक रही थीं, फिर देखा, रानी बाई किसी रसूखदार से दिखने वाले बंदे के पास गईं और अपने घूंघट से दोनो का चेहरा ढंक लिया। जब लौटी तो पैसो की बरसात होने लगी। शामियाने में हर कोई पैसे लुटा रहा था। साजिंदे और सहयोगी लड़कियां पैसे चुने और ठुमके लगाएं। विचित्र सा था सब कुछ। जीवन में पहली बार ये सब देख रही थे। गाना, बजाना, नाच और वो बाई! वो जितनी अच्छी लग रही थी, उतना ही बुरे लग रहे थे शामियाने में जमघट लगाए बैठे लोगों का व्यवहार।

चुपके-चुपके हम लोग देख रहे थे वो सब। हमारे लिए वो सब बेहद नया था, लेकिन बड़ों की नजर में यही गुनाह था। कोई देखता तो हमारी पिटाई तय थी। मेरे साथ इस ‘चोरी’ में शामिल चचेरी बहनो ने कई बार कहा भी कि चल अब चलते हैं..और वो चली भी गईं। मैं अकेली नाच में डूबी सोचती रही कि अंदर लड़कियां नाच रही हैं तो हमें देखने से क्यो मना कर रहे हैं। तभी मुझे तलाशती हुई चाची आई। एक थप्पड़ जमाया और घसीटती हुई ले चलीं। वह बड़बड़ा रही थीं…”अगर चाचा ने देख लिया तो मार डालेंगे। चल अंदर शादी हो रही है, वहां बैठ…।” उस महाआंनद से वंचित होने से चिढी हुई मैंने पूछ ही लिया…”क्यों, लड़कियां ही तो नाच रही हैं, मैं क्य़ो नहीं देख सकती?” ” वे लड़कियां नहीं, रंडी हैं,रंडी…समझी। रंडी की नाच हमारे यहां औरतें नहीं देखती। ये पुरुषों की महफिल है, जहां इनका नाच होता है। देखा है किसी और को,है कोई औरत वहां..सारे मरद हैं-”  चाची उत्तेजना से हांफ रही थी। मेरे दिल का पुरजा पुरजा हो गया था। मैं मंडप के पास बैठी सोचती रही। फिर अपने हमउम्र चचेरे भाई से जानकारी बटोरी तो पता चला वे मुजफ्फरपुर से आई हैं, जहां एक पूरा मोहल्ला उन्हीं का है। इनके कोठे होते हैं, वे शादियों में नाचती गाती है, यही उनका धंधा है…आदि आदि….।

अब मैं कालेज में पढने मुजफ्फरपुर आ चुकी थी। रानी बाई की सूरत मेरी आंखों में अब तक नाच रही थी। वैसे ही…कौंधती रही थी तबसे। मैं भूला नहीं सकी थी। कैसे भूलती..कई बार अकेले में उसकी तरह नाचने का प्रयास किया था। भईया की डांट सुनी थी कि ये किसी नचनियां का घर नहीं है…। बहकी हुई लड़की का दरजा कई बार मिल चुका था। हमारे समाज में तब कई लड़कियां अपने घरो की कैदी थीं। मैं भी थी। कालेज ने थोड़ी सी आजादी दी। जिसका फायदा उठाना तो लाजिमी होता है हर लड़की के लिए। शहर की सबसे पहली गली जो मैंने पहले रिक्शे से नापी, बाद कई बार पैदल…वो थी, रानीबाई का मोहल्ला! मुजफ्फरपुर चतुर्भूज स्थान!

शहर में घर होते हुए भी होस्टल में रहने के कारण शहर को ज्य़ादा जानने का मौका नहीं मिल पा रहा था। मेरा मन एक ही गली की तलाश में था। मैं डे-स्कॉलर लड़कियों से उस गली के बारे में पूछती और अचंभे से भर जाती। मेरे लिए उस वक्त सर्वाधिक उत्सुकता का केंद्र वह गली थी। एक बार गुजरना था। मेरा बस चलता तो अंदर तक जाकर देखना चाहती थी। कम से कम शाम के वक्त रौनक गली की बहारें,जो उस वक्त की फिल्मों में यदा कदा दिख जाती थी। मन में विद्रोह भी होता था कि भले घर की लड़की होना, क्या इतना बड़ा गुनाह होता है कि आप उस गली का नाम भी बड़ो के सामने ना लें। जाने की बात सोचना तो दूर…। खैर..कुलबुलाते कसमसाते दिन कटते रहे, और चाहत रंग लाई। पता चला कि उस गली के आखिरी छोर पर महाकवि जानकीवल्लभ शास्त्री का घर है। जहां हर साल निराला जयंती बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती है। बस फिर क्या था? हम भी हो लिए। इस विकट योजना में कितने दोस्तों ने साथ दिया ये बताने का वक्त नहीं। मगर मैं उस शाम उधर से गुजरी और वहीं ठिठक गई। दोनो तरफ घने मकान। बाहर चबूतरे पर बैठी कई अटपटी सी दिखने वाली लड़कियां। हंसी, ठिठोली करती हुई। किसी घर से तबले की थाप, कहीं से घुंघरु की छनक। किसी एक घर में बारात के स्वागत सी तैयारी दिखी। पता चला कि आज किसी की ‘नथ उतराई’ समारोह है। भव्य भोज भी होगा! किसी ने दबी जुबान में समझाया था-” कोई कम उम्र लड़की होगी, जिसका सौदा किया होगा शहर के किसी रईस ने और खूब दौलत लुटाएगा इसके बदले।”एक लड़की का कुंवारापन खरीदने का जश्न। पता चला कि इस गली में अक्सर होता है एसा जश्न। फिर वह लड़की धंधे में बाकायदा उतर जाती है। किसी के घर की शोभा नहीं बनती। सुना ये भी कि यहां लड़कियां चुरा कर भी लाई जाती हैं या इन्हीं तवायफो की नाजायज संताने होती हैं। इनके घर में लड़की पैदा हो तो खुशियां मनाई जाती हैं।

मेरा शास्त्री जी के यहां अक्सर आना जाना होने लगा और रास्ता वहीं था। शहर के सारे कवि-कथाकार उनके घर जाने के लिए उधर से ही गुजरते थे। चुपके-चुपके कोठो की तरफ देखते हुए। सिर्फ एक को छोड़ कर। शहर के एक बड़े कवि की प्रेमिका वहां वास करती थीं। वे रोज शाम रिक्शे पर बैठकर उसके पास जाते थे। सुना ये भी था कि कवि के प्रेम में उस तवायफ ने नाच गाना बंद कर दिया था और उनकी रखैल हो गई थी। इतने किस्से थे शहर में उस गली के कि मेरी उत्सुकता जानने की कभी खत्म नहीं हुई। मगर मैंने कवि का पीछा जरुर किया और उसकी प्रेमिका का घर देख आई। मैं कभी हिम्मत नहीं जुटा पाई अंदर जाने की। अब लगता है चली जाती तो क्या होता? शायद कुछ नहीं। फिल्में देख कर ऐसे नाचने-गाने वाली औरतों की जो उनकी छवि बना रखी थी, वो टूट जाती। शायद तभी नरक को करीब से देख लिया होता।

तब हमारे शहर की तवायफें बेहद मशहूर थी। कुछ ने तो फिल्मों में भी काम किया था। उनकी सुंदरता और कीमतो की चर्चा खूब सुनाई देती थी। खासकर शादियों के दौरान, बड़े लोग ही महंगी बाईजी बुला सकते थे। उस जमाने में होड़ थी मंहगी बाईजी बुलाने की। नाच देखने के लिए मार होती थी। जिनके दरवाजे पर सबसे महंगी बाईजी का नाच होता था उनकी समाज में बड़ी प्रतिष्ठा मानी जाती थी। बाबूसाहेब शहर या गांव में कई दिनों तक साफ सफ्फाक धोती पहने मूंछो पर ताव देते चौक चौराहो पर टहलते दिख जाते थे। नाच से कई दिन पहले से गांव-कस्बो  की हवा में सनसनी होती थी…कि फलां बाईजी आ रही है…। लेकिन हमें क्या…लड़कों, मर्दो की चांदी होती थी…मुझे एक दृश्य आज भी याद है । चचेरे भाई की शादी तय हुई तो लड़की वालो नाच की मांग की। घर में कानाफुसी शुरु कि शहर कौन जाएगा और बाई कौन ठीक करेगा। घर में मार-काट मच गई।  सारे भाई-बंधु तैयार थे और जाना एक-दो को ही था। ज्यादा ध्यान नहीं कि किसका नंबर आया, मगर जो भी गया होगा, उससे जले-भुने, वंचित लोग खासे खफा हुए होंगे।

कई स्मृतियां हैं बचपन की। गांव के एक सज्जन ज्यादातर नाच के लिए बाईजी ठीक(विशेषज्ञता) करने में माहिर माने जाते थे। उनकी वहां चलती थी। सुना था। उनका एक 15 साल का बेटा था। एक बार नाच देखकर वो एक बाईजी के पीछे पागल हो गया। बाईजी शहर लौटी तो वो पीछा करते करते कोठे पर जा धमका। बताते हैं, कि बाईजी ने उसे समझाया कि यहां बच्चे नहीं आते, लौट जाओ। यहां बहुत पैसे खर्च होते हैं, तुम नहीं कर पाओगे। जाओ, पहले जवान हो, कमाओ फिर आना…। बच्चे ने अपनी जेब से घर से चुराई हुई नोटो की एक गड्डी निकाली और बाईजी की तरफ उछाल दी। बोला,”हम बच्चे नहीं हैं..और ये लो पैसा।” बाईजी ने दो मुस्टंडो को बुलाया और पैसे और बच्चा उनके हवाले करते हुए कहां कि ले जाओ और फलाना बाबू के घर पहुंचा आओ। दुबारा ये दिखाई ना दे। बाद में उसकी क्या गति हुई नहीं पता, मगर फलाना बाबू ने शादी-व्याह के मौके पर बाईजी ठीक करने का काम हमेशा के लिए छोड़ दिया।

बाद के दिनों में वो शहर छूटा वो गली छूटी, लेकिन बचपन में महफिल से वंचित होने के बाद एक तस्वीर जैसे दिमाग में फ्रिज हो गई-“दाहिने हाथ में बेला के सफेद फूलो की माला लपेट कर सूंघते लोग” आज भी वो अंदाज मुझे मजेदार लगता है। आज भी दिल्ली की रेडलाइट पर बेला का गजरा मिल जाए तो हाथ अपने आप उस अंदाज में उठ कर नाक तक चले जाते हैं। अलबेला था वो अंदाज, अब हास्यास्पद लगे शायद। ये सारे चित्र दिमाग में धंसते रहे…उनके प्रति मन में आकर्षण पनपता रहा। उनकी आजादी भी खासी लुभाती थी। वे सरेआम नाच गा सकती थीं, कुछ भी पहन सकती थीं..मर्दो की महफिल के लायक थीं…मगर हमारे समाज की औरतें..चौखट के अंदर..। दालान में तब आती थीं जब मर्द कहीं बाहर

गीताश्री

गीताश्री

गए हो। लक्ष्मण रेखाओं के भीतर घुटती आत्माओ के साथ बड़े होने के अवसर हमें मिला है।

सामयिक प्रकाशन से प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार-लेखिका गीताश्री की नई पुस्तक ‘औरत की बोली’ के कुछ अंश.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

0 Comments

  1. vandana

    May 19, 2011 at 12:43 pm

    Lajeab. I want to share your experiences. Muje bhi is proffession mein aien ladkiyon ke ander dadkati aag aur deh ke age man mein chchupi manviya bhavnaoon ko pirona ha shabdon mein. If u could help me in that.

  2. वाजपेयी

    May 19, 2011 at 1:03 pm

    सोनागाछी में रह कर ये धंधा करने वाली लडकियां धार्मिक और आस्तिक स्‍वभाव की होती हैं। वे अपने श्रम-धंध के उसूलों का पालन करती हैं। पूरी आस्‍था से व्रत-उपवास भी करती हैं और उस दौरान इस ‘कार्य’ से विरत रहती हैं। धंधे के कपडों को सामान्‍य समय में नहीं पहनतीं। उन्‍हें अस्‍पर्श्‍य मानती हैं।

  3. vandana

    May 19, 2011 at 1:05 pm

    I completely support ur view. Really there is a lot of difference between so called our women and those women.

  4. SANDEEP

    May 19, 2011 at 2:24 pm

    आप तो बडी हिम्मत वाली है,

  5. कुमार सौवीर, ब्‍यूरो प्रमुख, महुआ न्‍यूज, लखनऊ

    May 19, 2011 at 3:40 pm

    आंखें भीग गयीं।
    दैहिक-श्रम करने वालियों का चरित्र तो मुझे उन बदन-छिछोड डालने वाले धनवानों से कहीं ज्‍यादा पवित्र लगता है।
    भडुआगिरी करने वाले गांव के विशेषज्ञ सज्‍जन के बेटे के साथ उस बाई का व्‍यवहार कठोर होते हुए भी एक ममतामयी मां से कहीं ज्‍यादा आत्‍मीय और चरित्रवान दिखायी पडता है।
    काश, ईश्‍वर ने पुरूष को इतना क्रूर ना बनाया होता। सोचता हूं कि अगर हमारी मां-बहनें-बेटियों को कोई बाई बना डाले तो हमें कैसा लगेगा। लेकिन मर्दानगी के आगे स्‍त्रीत्‍व हमेशा मिमियाता ही रहेगा, ऐसा शायद ज्‍यादा दिन नहीं चलेगा।
    कुमार सौवीर, ब्‍यूरो प्रमुख, महुआ न्‍यूज, लखनऊ

  6. RAHUL

    May 19, 2011 at 4:25 pm

    वास्तविकता को समाज को अखरती है लेकिन हकीकत सूर्य से भी तेज होती है। हां पीडा और दर्द देश बदलने से या गरीब अमीर से घटती बढती नही।
    Rahul Tripathi
    http://www.thenews1.com

  7. yagyawalkya

    May 19, 2011 at 5:21 pm

    bahut achche se bayan kiya hai ek acharchit sachai ko.

  8. Mk

    May 19, 2011 at 5:28 pm

    pata nahi lekhakon ke sagal me daliton,piriton,sataye gaye logon ke bareme likhne ki chaah kyun machi rehti hai sayad isse lokpriyata aasaani se mil jaati ho…umeed hai in vidwano ki jamat me se wo paudh nikalegi jo inhe gale lagakar apne ghar me jagah dengi..kaas Gitashri aisa kar pati..ya unke kahani me aisa kuch hota..madam inke jindgiyon me dekhna aasaan hai…lekin ghar me jagah dena utna hi muskil…inka badan ughra hua hota hai..kalam chala dijiye kya jaata hai…

  9. sudhir pandey

    May 19, 2011 at 6:52 pm

    aachacha likha hai geeta ji . badhai . kitab zarur padenge . sudhir pandey

  10. Aham

    May 20, 2011 at 10:32 am

    Abhi ek samptaah pehale hi ek Pakistani Journalist ka article pada Osama Bin Laaden par. Yeh article pad kar us article ki yaad aa gai. Kasab par bhi ek Pakistani Journalist ka article pada, pad kar bahuton ki aankhe kuch isi tarah ‘nam’ ho gai hongi. Geetaji batayengi ki duniya me koi aisa insaan hai jo ‘majboori’ ke bina koi galat kaam karta hai? Why are you justifying which is not justifiable? Ya ye justify isliye kiya ja raha he ki kitaab likhani thi? Stop this non-sense!

    Or jahan tak ye gaon wali aapki tathakathit kahani he, aisa lagata hai ki bollywood film se uthai gai hai. Gaon me maine bhi 20 saal bitaye he jindagi ke, maine to ek bhi baraat me kisi bai ka naach hote nahi dekha. Kahan ki mangadant kahani hai ye! In feminists ko pata nahi kya bimari hai, Western ‘political scientists’ ne ek shabd (Feminism) kya pakada diya, inhe din me har pal, har aurat ke saath jo bhi ho raha hai usko ye ‘feminism’ ki chashme se hi dekhate he or shuru ho jate he…..”is desh me aurato ke saath aisa hota hai, is desh me auraton ke waisa hota hai..”. Come on, upar wale ne sochane ki kshamata de rakhi hai to use ‘feminism’ ke chashme se hi dekh kar aankhon ko mat phod lijiye.

    Right now I am not able to remember the name of that famous Hindi writer who wrote one famous novel in which the daughter of a prostitue return to her ‘life’ (prostitution) eventhough her father tries hard to take her with him to lead a normal life. And mind you, she doesn’t return out of any ‘majboori’ (compulsion) but because she ‘enjoys’ that life! That portrayal is nearer to reality rather than fabricated account of ‘sympathy-seeking’ tales of Geetaji.

  11. Bhupendra Jain

    May 21, 2011 at 8:03 am

    Geetashreeji ne jo bhi likha hai usme se hamare samaj ki mansikta aur hakikat ka pata chalta hai….unki saari baaten hame darpan dikhati hai aur batati hai ki aurton ko dekhne ka nazriya kaisa hai hamara….bravo geetashreeji….weldone.[/b]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...