: राजीव अरोड़ा का कच्चा-चिट्ठा खोला डा. राधा रमण चित्रांशी ने : राजीव अरोड़ा जी, मेरा यह पत्र देखकर चौंकेंगे नहीं कि आखिर मैं यह पत्र क्यों लिख रहा हूं. मैं यह पत्र इसलिए नहीं लिख रहा हूं कि आप मुझे मेरा जीवन बन चुके ‘गांडीव हिन्दी दैनिक’ में पुन: सेवा करने का अवसर प्रदान करेंगे, बल्कि इसलिए लिख रहा हूं कि मेरे मन में इस बात का संशय उठ रहा है कि आखिर अचानक उस राजीव अरोड़ा जी ने- जो मुझे अपना दाहिना हाथ मानते रहे, बड़े भाई की तरह 40 वर्षों से प्यार व सम्मान देते रहे, उसमें क्या कमी आ गयी, जो मुझे ऐसा फरमान सुना दिया कि अब आपकी जरूरत गांडीव को नहीं है.
क्या पिछले 6 माह में ही मुझमें इतनी कमी आ गयी कि जिसके चलते आपकी उस बेटी ने, जिसे मैंने अपनी गोद में खिलाया था, बरगला कर उसने आपको क्या कह कर भ्रमित कर दिया कि आपने उस बेटी की उम्र से भी बड़े, भाई से प्रिय बनकर हर दु:ख, संकट की घड़ी में साथ रहने वाले से एक झटके में नाता तोड़ लिया. हालांकि मैं जानता हूं कि इन दिनों आप मानिसक, शारीरिक रूप से बीमार होने के साथ ही ‘नर’ की क्रियाओं से थक व वंचित हो चुके हैं. यही कारण है कि आपकी याददाश्त की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी है. अब तो आप दो मिनट पूर्व में कही बात भी याद नहीं रख पाते हैं.ऐसे में आपको आपके द्वारा कही गयी बातों को याद दिलाना व्यर्थ ही है. फिर भी याद दिलाने का प्रयास कर रहा हूं.
आपको याद करा दूं कि गांडीव में 1972 में आने तथा विशेष प्रतिनिधि पद पर कार्य करने के दौरान आप मुझ पर लगातार दबाव बनाते रहे कि मैं लखनऊ जाकर कार्यालय का कार्यभार संभालू, लेकिन किन्हीं पारिवारिक कारणों के चलते मैं वाराणसी छोड़कर लखनऊ जा पाने की स्थिति में नहीं हो पा रहा था. तब आपने लक्ष्मी नारायण पाठक को लखनऊ भेजा. इसके बावजूद आपके मेरे प्रति अटूट विश्वास में कोई कमी नहीं आयी. आपके पिताजी और आपने मुझ पर भारी दबाव देकर गांडीव से जोड़ा और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी जिसका मैं हमेशा सफलतापूर्वक निर्वहन करता रहा. मैं आपके विश्वास पर हमेशा खरा उतरता रहा. मैं आपका तब से प्रिय रहा हूं जब आपने गांडीव का काम पूरी तरह नहीं संभाला था. गांडीव के स्थापना काल से ही जुड़े निर्मल जी, मुझे साथ लेकर गांडीव पर आए और हर संकट का मुकाबला किया, इसमें परम पूज्यनीय डा. भगवान दास अरोड़ा का आपातकाल में जेल जाना आदि शामिल रहा. इसी दौरान बहन डा. उषा चोपड़ा की दिल्ली में शादी हुई, जिसमें मैं भी शामिल रहा. गांडीव का कार्यभार संभालने के पूर्व से ही आप काफी रसिक मिजाज रहे. जासूसी और रंगीन अश्लील पुस्तकें व मैगजीन को भी पढ़ने का आपको चस्का लग चुका था. इसी दौरान वर्ष 76 में आपका विवाह सर्वगुण सम्पन्न महिला सुश्री मीरा अरोड़ा के साथ वाराणसी के पटेल धर्मशाला में सम्पन्न हो गया. मुझे साथ लेने के बाद आपने वर्ष 80 तक गांडीव को आर्थिक रूप से सम्पन्न बना दिया कि गांडीव में आधुनिक मशीनें लग गयीं.
विवाहित होने के बावजूद आर्थिक समृद्धि का नशा आपके सिर इस कदर चढ़ा कि आप ‘जिन्दा गोश्त’ व शराबखोरी में डूब गये. विवाह होने के बावजूद आप लगातार दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, कोलकाता जाकर होटलों में शराब व ‘जिन्दा गोश्त’ के शौक को पूरा करने के लिए लाखों रुपया उड़ाते रहे. इसी बीच गांडीव का नया कार्यालय नये भवन में आ गया. इसके बावजूद आप अखबार की ओर कम, शराब व जिन्दा गोश्त की शौक को पूरा करने में ही ज्यादा समय देते रहे. आप मुझे अपने साथ दिल्ली, मुंबई, लखनऊ व कोलकाता ले गये और वहां शराब व ‘जिन्दा गोश्त’ के खेल में कई-कई बार मुझे भी धकेलने की कोशिश की, लेकिन मैं संयमित रहा और आप बर्बाद हो गये. आपके इस गंदे खेल की तारीखें मैं अपनी डायरी के पन्नों से दे सकता हूं. मेरे मना करने पर आप मुझ पर भड़क जाते रहे. उसी दौरान मैंने कई बार सुझाव दिया कि नई मशीनों के लगने के बाद पुरानी मशीनों को लखनऊ या सोनभद्र में लगा के प्रकाशन शुरू किया जाय, जिससे गांडीव की स्थिति मजबूत रहे, लेकिन आप शराब व ‘जिन्दा गोश्त’, अय्याशी में इस तरह डूबे कि मेरी कही बातों की ओर ध्यान ही नहीं दिया.
वर्ष 2002 आते-आते आपने अपना शौक पूरा करने के लिए बैंकों को कर्जदार बनने के बाद निजी क्षेत्रों से सूद पर रुपया लेना शुरू कर दिया. साथ ही बैंक को धोखा देकर रुपया लेकर अपना शौक पूरा करते रहे. आपने अपने इर्द-गिर्द चाटुकारों की फौज जुटाना शुरू कर दिया. आपने अखबार का सर्कुलेशन बढ़ाने के संबंध में दिए गये मेरे सुझावों को अनसुनी कर दिया. जिसका असर ये हुआ कि अखबार का सर्कुलेशन, जो 90 के दशक के बाद 18 हजार तक पहुंच गया था, 2005 के बाद से लगातार गिरता चला गया व आज 3 हजार तक पहुंच गया. श्रद्धेय डा. भगवान दास अरोड़ा द्वारा लगाया गया गांडीव रूपी वट वृक्ष की जड़ें आपकी अय्याशी रुपी मट्ठे डालने से सुखती ही चलीं गयीं और आज यह वट वृक्ष जड़ से उखड़कर धराशायी होने की स्थिति में पहुंच चुका है.
अपने कृत्यों के चलते आप कई गंभीर बीमारियों में जकड़े हुए हैं. इस कारण आपने अपने मर्द होने की पहचान ही खो दी. आपकी याददाश्त ही लुप्त हो चुकी है. यही कारण रहा कि आपने मुंबई के सिद्ध विनायक मंदिर में मेरा हाथ पकड़कर जो शपथ ली थी कि- ‘डाक्टर मेरा साथ कभी मत छोड़ना और मैं भी जीवनभर तुम्हारा साथ नहीं छोडूंगा’ उसको भूल गये. बहरहाल भूलने की तो आपकी वर्तमान स्थिति गंभीर बन गयी है. आप बराबर हमसे यही कहते रहे कि सर्कुलेशन लगातार गिर रहा है, लेकिन इसके बारे में मैं जब भी आपको कोई सुझाव देता आप उसे टाल देते. इसके बावजूद आप रिकार्डो में हेराफेरी कर गांडीव का सर्कुलेशन 3-4 हजार होने के बावजूद सरकार को धोखा देकर सर्कुलेशन 15 हजार से ज्यादा दिखाकर सरकारी रेट पर भुगतान लेते चले आ रहे हैं. इतना ही नहीं विज्ञापन छपने की तारीख बीतने के बाद भी विज्ञापनों के पेज नं. 3, 4, 5, 6 पर बिना तारीख लिखे छापकर सरकार से अब तक भुगतान लेते चले आ रहे हैं. इतना ही नहीं आप तो अब धोखा देने में भी माहिर हो गये हैं.
अपना सब कुछ लुटाने तथा कर्मचारियों का हक हड़पने के बाद भी आपने सिंडिकेट बैंक को धोखा देकर वर्तमान भवन के ऊपर बिना नक्शा पास कराये निर्माण कार्य कराने के लिए लाखों रुपये कर्ज ले लिया और निर्माण भी नहीं कराया. वरन फर्जी बिल बाउचर लगाकर बैंक से धन निकासी कर अपने किसी निजी कार्य में खर्च कर दिया. इतना कुछ होने के बावजूद अपनी जर्जर व नंगी हो चुकी छवि को छिपाने का आप असफल प्रयास करते चले आ रहे हैं. आपने कभी भी इस बात पर पश्चाताप नहीं किया कि जो आपने लाखों-लाख रुपये शराबखोरी व ‘कालगर्लो’ पर फूंका, ऐश किया, उसी का फल है कि गांडीव जैसा वट वृक्ष सूखने के कगार पर है.
इस वर्ष पूरे जाड़े भर आप कार्यालय में लगभग आए ही नहीं. इसी बीच आपने अपनी लाड़ली बड़ी बेटी, जिसके आचरण व चरित्र से तंग होकर उसका पति घर छोड़कर कहीं चला गया, उसी बेटी को आपने कार्यालय में बैठाना शुरू कर दिया. आपने इसे कैसा संस्कार दिया है ये तो पता नहीं, लेकिन इसने कार्यालय में जब से आना शुरू किया तब से कार्यालय का वातावरण तनावपूर्ण हो चला. इस लड़की में अपने से बड़ों का सम्मान करने का भी संस्कार नहीं है. इसने सबको अपमानित करना शुरू कर दिया.
सही तो यह है कि अय्याशी में चूर रहने के कारण आप अपनी संतानों को कोई संस्कार नहीं दे सके. आपकी बड़ी पुत्री रचना संस्कारविहीन होने के कारण ससुराल जाकर वहां के लोगों की ऐसी-तैसी की. कई बार जहर खाने का नाटक किया और पति के घर को लात मारकर आपके पास आने के बाद गांडीव की ऐसी-तैसी कर रही है. आप जिस रास्ते पर चलते रहे अब शायद उसी रास्ते पर उसके मित्र ले जाने में लगे हुए हैं. ये ‘मित्र’ आपकी कृपा से गांडीव के सीईओ तथा संपादक बनकर शहर में घूम रहे हैं.
इसने आते ही अपने पास राजीव सिंह विशेन को बैठाकर गुफ्तगू करना शुरू किया, जो इस कदर बिगड़ा की उसने फोन पर अश्लील बातें करना व बाहर के जिलों से अश्लील मैसेज भेजना शुरू कर दिया. जिसे बाद में हमने किसी तरह सर्विलांस की मदद लेकर उसे खतम कराया. हमसे भी आपकी लाड़ली बेटी बेवजह की बातों को लेकर उलझने लगी. हमने उसे समझाना चाहा, जिससे वह बुरा मानने लगी. इसका परिणाम यह हुआ कि ये आपको व आपकी पत्नी को मेरे द्वारा कही बातों को तोड़-मरोड़कर बताकर आपके दिमाग में मेरे प्रति जहर भर दिया. संभवत: इसी कारण आपने मुझसे किये गये वायदे को भुलाते हुए 30 जुलाई को गुचचुप ढंग से मेरे अवकाश ग्रहण करने का भ्रामक समाचार निकलवाकर खुद पढ़ा व उसमें अपने हाथों से संशोधन करके अगले दिन 31 जुलाई को काशी का फ्लैश बनवा दिया.
इन दिनों पुन: आपकी पुत्री को राय देने वाले शुभचिन्तकों में लोकनाथ पांडेय शामिल है, जिसे आप ही कई वर्षों से दुश्चरित्र व फ्राड घोषित करते आ रहे थे. वह कौन सा गलत काम है जो नहीं करता है. पिछले 2-3 माह पूर्व उसकी सारनाथ क्षेत्र में उस समय जमकर गांव वालों ने पिटाई किया था, जब उसने अपनी रखैल की युवा पुत्री के साथ भी सम्भोग करने के प्रयास में पकड़ा गया. उसकी लोगों ने जमकर पिटाई कर दी, मामला पुलिस तक पहुंचा था, आपके कहने पर मैंने किसी तरह इस मामले को निपटा दिया था. इसके बारे में कुछ वर्ष पूर्व, जब लालजी राय नगर आयुक्त थे, तब हमने आपसे इसे नगर निगम का समाचार संकलन कराने की बात कही तो आप मुझ पर बिगड़ गये और कहा कि ये फ्राड व दुश्चरित्र है. ये नगर निगम को बेच खायेगा. अब यही आपका भी कृपापात्र बन गया. जब आपको भूलने की बीमारी है तो इसे भी भूल गये होंगे. खैर छोडि़ये मैं यह पत्र आपको इसलिए भेज रहा हूं कि आप इस बात का मनन करें कि आखिर गांडीव को रसातल में ले जाने के लिए कौन जिम्मेदार है ? आपकी शराबखोरी, अय्याशी या मैं और गांडीव के अन्य कर्मी ?
आपने कर्मचारियों के साथ ही मेरे साथ भी धोखाधड़ी की. 1972 से गांडीव में कार्यरत रहने के दौरान आप मेरा पीएफ काटकर जमा करने की बात करते रहे लेकिन बाद में राज खुला कि वर्षों तक मेरा पीएफ जमा ही नहीं किया. जिससे मुझे भविष्यनिधि राशि की चपत तो लगी ही, पेंशन से भी वंचित कर दिया गया. मेरी ग्रेच्युटी की राशि भी कई बार अनुरोध करने के बावजूद अब तक आपके द्वारा न दिया जाना आपकी हड़पने की नीति का परिचायक है. संस्थान के छोटे से लेकर बड़े कर्मचारियों का भी वेतन आदि हड़पकर आपने अय्याशी का जो मजा लिया, वो काबिल-ए-तारीफ है.
आपने जिस आनन-फानन में मुझे हटाया मैं उस विष को भी पी गया. लेकिन आपने अचानक 31 जुलाई को गांडीव में जिस तरह से मेरे बारे में भ्रामक समाचार छापा उससे मैं आवाक रह गया. इसके बावजूद भी मैं उहापोह से जूझ रहा था. रक्षाबंधन के दिन दोपहर जब आप मेरे घर अचानक पहुंचे तो एक बार फिर मेरे दिल में आपके प्रति नफरत की ज्वाला भभक पड़ी और मुझे यह लगा कि मैं आपको पत्र देकर दिखाऊं कि आपका असली चेहरा क्या है?
बहरहाल मेरे आपसे कुछ सवाल हैं-
1- आपके पिता श्रद्धेय स्व. भगवान दास अरोड़ा व आपने मुझे मेरी अच्छी खासी क्लीनिक तुड़वाकर इस आश्वासन पर गांडीव से जोड़ा था कि जब तक गांडीव रहेगा तब तक आप कार्य कर वेतन पाते रहेंगे. मैं आज भी पूरी तरह से मानसिक तथा शारीरिक रूप से कार्य करने में सक्षम हूं और करता रहा हूं, फिर मुझे क्यों हटाया गया?
2- आपने कागजों में हेराफेरी करके मुझे इस लायक भी नहीं छोड़ा कि मैं पेंशन पाकर अपना व अपने परिवार का खर्च चला सकूं. आखिर क्यों ?
3- आपने मुझे हटाते समय विधिक रूप से दी जाने वाली ग्रेच्युटी की धनराशि भी नहीं दिया ताकि मैं जीवन जी सकूं.
4- आप और आपका परिवार सुख भोग रहा है जबकि गांडीव के कर्मचारी वेतन के लिए तरसते रहते हैं. आखिर यह कब तक चलता रहेगा?
5- जैसा आपने मेरे साथ किया वैसा ही गांडीव में वर्षों से कार्यरत कर्मचारियों के साथ आज भी कर रहे हैं. मेरा और इन कर्मचारियों का क्या अपराध है?
विश्वास है कि पत्र पाने के दो दिनों के अंदर उपरोक्त सवालों का जवाब आप जरूर देंगे, ताकि मैं आगे की सोच बना सकूं.
यह पत्र ना तो आपका चरित्र हनन करने के लिए है और न ही बदनाम करने की कोशिश है. न ही आपसे कोई अनुचित लाभ लेने का प्रयास है. जो वास्तविकता आपके साथ लगभग चालीस साल रहकर मैंने देखी, जिसे आप स्वयं जानते है, उसे यदि आपको याद नहीं दिलाऊंगा तो यह बेमानी होती. सच कभी छिपता नहीं और किसी की आह बेकार नहीं जाती.
आपका भूला बिसरा
डा. राधारमण चित्रांशी
दिनांक 25 अगस्त 2010












bhanwar
September 12, 2010 at 12:50 pm
chitransi ji jo bhi hota hai ache ke liye hi hota hai…aap jaise adami ka es gande kunbe sai bahar aana hi baihtar tha…rahi bat gandiv ke malik ki to khud kabir keh gaye….mare bail ke cham so loh bhasm ho jay….PHUT PHUT KAR NIKLANGE..vaise aapne yad dilakar acha kiya
शैलेन्द्र द्विवेदी, भोपाल
September 12, 2010 at 1:06 pm
वाकई बेहद अफसोसनाक है कि सालों सेवा के बाद भी त्रिपाठी साहब को इतनी जिल्लत देकर संस्थान से बाहर किया गया। लेकिन डा. साहब आपने मि. अरोड़ा से जो सवाल किये हैं वो उचित हैं। ये पत्र उनको भी नसीहत है जो तन,मन,धन से संस्थान के साथ जुड़े रहकर अपने हित दरकिनार कर देते हैं क्योंकि आखिर में मिलता है…..बस बाय-बाय……..
sunil
September 12, 2010 at 1:51 pm
पत्र को पढ़कर ये स्पष्त्यः जैसी करनी वैसी भरनी वाली बात लगती है. अगर आपकी लिखी सारी बाते सच भी हैं तो स्पष्ट है की प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से आप सभी नैतिक एवं कानूनी अपराधो के प्रत्यक्षदर्शी एवं भागीदार रहे है.
आखिर जब आपकी खुद की नौकरी गयी तभी इन सब बातो को लिख कर आप अपने आपको समाज अथवा देश के प्रति किये अपराध से मुक्त तो नहो कर सकते.
जिस तरह से आपने अपने विरोधियो के पारिवारिक जीवन पर टिप्पणियां की है, उसे किसी भी मायने में उचित नहीं ठहराया जा सकता.
sunil barua
September 12, 2010 at 5:02 pm
डाक्टर साहब. आपका पूरा पत्र पढा१ आपसे सहानुभूति भी होती है१ जिस संस्थान के उत्थान के लिए आपने जीवन के ४० वर्ष लगा दिये उसी संस्थान द्वारा आपके साथ ऐसा व्यवहार किया किया गया है१ इसे विडम्बना ही कहा जायेगा१ वैसे किसी भी एक मालिक के भरोसे में आकर जमी जमाई डाक्टरी छोडकर पत्रकार बनना उचित फैसला नहीं कहा जा सकता है१ खैर ये आपका नजरिया रहा होगा१ रोजगार के मामले में रिश्तों का कोई मतलब नहीं होता१
यह सब तो हो गया१ लेकिन आपने ये जो पत्र लिखा है उसे पढकर खेद के साथ लिखना पडा रहा है कि आपने इतनी पत्रकारिता करने के बाद भी सामान्य चीजों पर ध्यान नहीं दिया१ आपने जिस तरह से वैयक्तिक आचरण पर आरोप लगाये हैं क्या आपके पास उसके पुखता सुबूत हैं१ आपको मालुम होना चाहिए कि इस तरह के आरोप किसी स्तरीय अखबार में तो कतई नहीं छापे जा सकते हैं१ हां इस तरह के पोर्टल पर दिखाया जाये तो मैं कुछ नही कह सकता हूं१ यह सीधे तौर पर मानहानि का मामला बनता है१ आपने जो बातें कुछ लोगों के बारे में बेबाकी से लिखी हैं उसके लिए पुखता सुबूतों की जरूरत होती है१ आपने तारीखें और बातें अपनी डायरी में नोट कर ली हैं१ ये सुबूत न्यायालय में टिकने वाले नहीं हैं डा. साहब१ कोई औरत कितनी भी दुश्चरित्र हो आप उसे दुश्चरित्र नहीं कह सकते१ यह तो सीधे सीधे चरित्र हनन है१ बेहतर होता आप इसे इसे अपने मन में ही रखते और इस तरह से उजागर नहीं करते१ आपने तो अरोडा जी के पूरे परिवार का पूरा चरित्र चित्रण कर दिया है१ अगर आपको उन्होंने न्यायालय में घसीट लिया जिसकी आशंका है तो आपको बुढापे में न्यायालय के चक्कर काटने पडेंगे१ वह भी ऐसी बेरोजगारी में१ और जब इतना सहा है तो इस उम्र में चुप रहना ही बुद्धिमत्ता होती१ खैर आपके लिए खैर ही मनाई जा सकती है१ ईश्वर आपकी रक्षा करे१
xyz
September 12, 2010 at 5:14 pm
Dr. Chitranshi ji ,
Aap ne likha — आप अखबार की ओर कम, शराब व जिन्दा गोश्त की शौक को पूरा करने में ही ज्यादा समय देते रहे. आप मुझे अपने साथ दिल्ली, मुंबई, लखनऊ व कोलकाता ले गये और वहां शराब व ‘जिन्दा गोश्त’ के खेल में कई-कई बार मुझे भी धकेलने की कोशिश की, लेकिन मैं संयमित रहा और आप बर्बाद हो गये. Yaani Arora Sahab *Zinda gosht* ka khel khel-ne ke liye agar kisi ko (Darshak ke rup mein ) saath le jana munaasib samajhate the to wo – Aap the ! Wah ! kamaal ka vyaktitwa hai aap ka ! Ek taraf aap (Patrakaarita se judi ) apni kaabiliyat bata rahe hain aur dusari taraf Arora jee ke **Zinda gosht ** ke khel ko SIRF DEKHNE KE LIYE (?) saath jaate the ! Khair ! aap ne puri tarah se Kutnitik andaaz mein Charitrahanan (Muaf kijiyesga) , Arora jee ke Charitra ko batlaane ka prayaas kiya hai , jis mein aap safal rahe, par saath mein *Zinda Gosht* ka khel dekhne waale darshak ke rup mein, Aap ne khud ko katghare mein khada kar liya hai !
Yaki maaniye ki patrakaarita se sahi maayane mein jude log , kisi ka charitrahanan kar apnee lekhnee ko mazbut nahi bana te hain ! Iska udaaharan dekh sakte hain ki Rajeenti se jude Zyaadatar *KARNDHAARON* ke chaaritrik charche amuman sabhi patrakaaron ko malum rahte hain, par ek journalist kisi ke charitra ka jaayaza lene ki bajaay uskee ( *karndhaaron* ki ) zimmedaariyon aur us se judi naakami aur safalata mein dilchaspi rakhta hai . Khair ! Aap ka apna andaaz hai so aap ne likh diya . Thodi bahut Sahaanbhuti aap ko Zarur mil jaayegi (Jis ke liye aap ne is tarah ki apni *pratibha* ka parichay diya)
Raha sawal Naukari jaane ka , to us mudde par Aap ke saath har koi khada rahega !
radha sharma
September 12, 2010 at 7:16 pm
राधा रमण चित्रांशी जी , माफ़ कीजिये लेकिन आपके साथ जो हुआ आप उसी के पात्र थे। अगर आपकी नौकरी नहीं जाती तो आपको चार दशकों की तरह आज भी अपने उस मालिक में कोई खोट नज़र नहीं आती जिसके तलवे चाटते हुए आपने पूरी उम्र गंवा दी।
abhuday
September 13, 2010 at 2:25 am
वैसे ये बातें आप वेब साईट की ज़गह खुद राजीव अरोड़ा से पूछते तो बेहतर होता इस तरह संस्थान अपने मालिक और खुद की इज्ज़त को नीलाम करने का हक़ आपको किसने दिया वैसे मै एक टेलिविज़न का पत्रकार हूँ जिसे वास्तव में छ: साल पूरे पूर्वांचल सहित बिहार और दिल्ली में काम करने का सौभाग्य मिला है फिर भी सुनने को मिलता है की टीवी वाले पत्रकार होते ही नही !
यदि यही पत्रकारिता का असली चेहरा है तो आज मै गौरवान्वित हूँ की मैं किसी अखबार का पत्रकार नही ! क्योकि यदि मेरा चैंनल मुझे पड़ विहीन भी कर दे तब भी मैं संस्थान के वरिष्ठ पदाधिकारियों के लिए ऐसी गन्दी भाषा का प्रयोग नही करूंगा !
डाक्टर चित्रांशी जी आप मेरे पिता के उम्र के है और आप के लिए मेरे मन में बहुत सम्मान है और उतार चढ़ाव हर किसी के कैरियर में आते हैं ! लेकिन बुरा वक्त ही हमारे संयम की परीक्षा लेता है !
और बुरे वक्त में भी एक अच्छाई होती है की वो भी गुजर जाता है उम्मीद है की मेरी इन बातों को एक अनुभव हीन टीवी पत्रकार की बाते समझ कर आप ध्यान ना दे लेकिन इसमें कितनी सच्चाई है आपको ज़रूर समझ आयेगा !
अपनी बातों को विराम देने के पहले मैं एक बात और बता दूं की मै राजिव अरोड़ा को जानता भी नही इसलिए मेरी इन बातों को पक्षपात पूर्ण रवैये से ना देखे !
—
Thanks & Regards
Abhuday, Varanasi
kahbri
September 13, 2010 at 4:08 am
चित्रांशी जी जो कुछ आने लिखा वो काफी घिनौना है। राजीव अरोड़ा तो फल भोगेंगे ही आप का भी उनसे बतदर हाल होगा। एकदम विभीषण हो गये हैं। इतने दिनों तक मलाई काटी । अब चले है मालिक की बुराई करने। पत्रकारवार्ता में आगे बैठकर अधिकारियों की चमचागिरी में कौन कौन से कसीदे पढे है बताउगां तो सारा लिखा हुआ धरा का धरा रह जाएगा। शीशे के घरों में रहने वाले दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकतें।
anoop kumar
September 13, 2010 at 7:46 am
chitransi ji aap se mujhe puri sahanubhuti hai lekin aaj aap jo kaat rahen wo bhi to aap ka hi boya huaa hai. jb tak aap per aanch nahi aai aap ne maaliko ki han me han milana jari rakha ab jb aapka khud ka ghar jalne laga to sabki yaad aane lagi aur dusroo ki madad lene ke nikal pade. us waqt aapka jamir aur ye imandaari kahan chali gai thi jab aapki naukri bani hai thi aur baki ki jaa rahi thi, aap ke malik aaiyashi kar rahe the aur aap us per parda daal rahe thei.
suraj
September 13, 2010 at 11:13 am
dr. sahab dusro ko sanskaar ka aap updesh de rahe hai kya aapne apne pariwaar ke taraf kabhi dhyan diya … aap ne patni ke rahte apne clinic ki nursh se shaadi kar li .. pahli patni w apne 5 banchcho ko saiydraja chhodkar varanshi aa kar rahne lage …. aapke sanskaar ka ashar aapke beti pa pada jisne ghar se bhaagkar shaadi kar li … ye aapke hi sanskaar hai ki aap ka bada beta ajay chitranshi ka kai ladkiyon se saiydraja me anaitik sambandh raha … jaise taise uski shaadi hui … yahai haal aapke dusre bete vijay chitranshi ka hai . wo bhi apne anaitik sambandh ke chalte pure saiydraja me charchit hai . aapke pariwaar ne gandiv ko saiydraja me jamkar becha aur khub rupya kamaya . kahte hai ki jiske khud ke ghar shishe ke hote hai wo dusro ke ghar par pathar nahi feka karte ……………… same on you ……………….
sachkaha
September 13, 2010 at 11:22 am
SACH KAHU…. AAPKO YEH SAZA ISLIYEH MILI KI AAP BHI UNKEY GANDEY KAARNAMO MAI UNKEY SAATH THEY AUR AAPNEY KAI MAMLO MAI UNKI MADAD BHI KI THI. AB JAB AAPKO BHI UNHONEY NIKAL DIYA TAB AAP YEH LETTER LIKH RAHEY HAI. AAP ITNEY DINO SEY CHUP KEY THEY. AAKHIR BURE KAAM KA BURA NATIZA TO MILNA HI THA SO AAPKO BHI MILA.
राजवीर सिंह, मुंबई
September 13, 2010 at 11:54 am
भाई राधा रमण तिवारी जी,
आपके साथ जो भी हुआ है, उसके जिम्मेदार आप खुद है। आपको शर्म आनी चाहिए कि एक ही आदमी के साथ इक ही जगह पर आप 40 साल तक नौकरी करते रहै और आपके मन में एक बार भी नहीं आया कि आप अपनी जिंदगी के विकास के बारे में विचार करें। जो लोग अपने बजाय दूसरों की चिंता करते हैं, उनका यही हश्र होता है।
आप असफल हैं। और बेवकूफ भी। 40 साल तक जब तक नौकरी चलती रही, आपको गांडीव के मालिक में कोई कमी नजर नहीं आई। अब जब सड़क पर आ गए हैं, तो जम कर उनके खिलाफ बोल – लिख रहे हैं। भैया…, अपनी चिंता करते तो, इस उमर में ये दिन देखने नहीं पड़ते। आप लिखते हैं कि जब अखबार का सर्कूलेसन 3-4 हजार होने के बावजूद सरकार को धोखा देकर गांडीव के मालिक 15 हजार से ज्यादा सर्कुलेशन दिखाकर सरकारी रेट पर भुगतान लेते चले आ रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है. देश के सारे अखबारों के मालिक, जी हां सभी ऐसा ही करते है। तभी आप जैसों को तनख्वाह भी मिलती है भाई। कोई माई का लाल ऐसा नहीं है जो अपना असली सर्कूलेशन बताता हो। यह व्यापार है। जिसमें सब जायज है।
आपने लिखा है कि आपकी अच्छी खासी क्लीनिक तुड़वाकर जब तक गांडीव रहेगा तब तक आप कार्य करके वेतन पाते रहेंगे, का आश्वासन दिया गयाफिर भी, आपको हटा दिया गया। तो जान लीजिये, जो लोग अपने घर को बरबाद करके दूसरों के आशियाने के साये में जिंदगी की तलाश करते हैं, उनके साथ ऐसा ही होता है। रही बात गोंडीव के मालिक के परिवार के सुख भोगने और कर्मचारियों के वेतन के लिए तरसते रहने की, तो भाई उन करम्चारियों को किसने बांध कर रखा है। वे चले जाएं और कहीं। कोई और काम कर लें। बिना तनख्वाह के गांडीव में ही काम करते रहने की सलाह क्या किसी डाक्टर ने दी है।
ऐसे लोगों के साथ ऐसा ही होता है।
भारत की पत्रकारिता में सेवा का दौर कभी का खत्म हो गया। अब तो अपनी सेवा करो, मस्त रहो। नौकरी मत करो, काम करो। मालिक से खुलकर बात करो, कि बोल भाई – मेरे काम का तू क्या मोल देगा। जैसा काम वैसा दाम। देता है, तो दे नहीं तो तेरे जैसे मालिक मेरे जूते पे। सवा हाथ के कलेजे की हिम्मत के साथ बात करोगे, तो मालिक भी झुकेगा। वरना रोते रहोगे। और रोने धोने से कुछ नहीं होता। हिम्मत से ही सब कुछ होता है। मीडिया में अब कलेजे वालों की कदर होगी। चूतियों की कहीं भी कोई कदर नहीं होती। बात गलत तो नही ?
tomar
September 13, 2010 at 1:08 pm
kisi bhi malik ka apne karmchariyo ko nikalne aur rakhne kauska apna adhikar hai. naukri jane ka dukh to jaroor hota hai, par malik ka is tarah sarvjanik taur par chritrahanan karna ek patrakar ko shobha nahi deta hai.
AAM AADMI
September 14, 2010 at 9:56 am
Dr.Chitransi Ji Sb.,
Jab tak chalat rahal naukariya tab tak sab thik , Rajeev Ji bhagwan ab jab Naukariya gail to uhe bhagwan Shaitaan dekaye lagal !!!!!!.. Jaye da GURU rahe da ab E sab………
yashveer singh
September 15, 2010 at 5:26 am
chitranshi jee, jab ek hi gaand se hagte the tab kyon nahi samajh me aaya,aaj arora ko beijjat karne ke chakkar me khud bhi to beijjat ho rahe ho.banaras kee patrkarita ke sirmaur banne chale the ,tum to jutee banne ke laayak bhi nahi ho,arora jee ka kya charitr hai mujhe nahi pata lekin tumhara charitr pata chal gaya….