कुछ महीने पहले एक पत्रिका के लिए कुछ लिख कर देने के लिए कहा गया था… जब पहले पहल बोला गया कि लिखना है मीडिया पर… लगा मैं क्या लिखूंगा, क्या ढाई साल थोड़े कम नहीं है अनुभव के लिहाज़ से। लेकिन तुरंत ही अगले एहसास ने पहले को लगभग धूल चटाते हुए अपनी ज़मीन तय कर ली थी। यानी मुझे पता लग गया कि मुझे क्या लिखना है।
वो सब जो पिछले ढाई साल से जज़्ब था शायद कहीं। मौक़ा ही नहीं दिया किसी ने शायद ये सोच कर कि पत्रकारिता की नई पौध बहुत निकम्मी, अज्ञानी और अहमक़ क़िस्म की है। आइए, हम अहमक़ों के बारे में ग़लतफ़हमियां यक़ीन में बदलें, उससे पहले उन्हें दूर कर लें। टीवी पत्रकार हूं तो बात अपने यहां की करुंगा लेकिन यकीं है कि हम ‘मूर्ख’ पत्रकार हर जगह फिर चाहे वो प्रिंट हो या टीवी, ख़ून के घूंट पीते होंगे, उबलते होंगे, गरियाते होंगे और फिर आ जाते होंगे…अगले दिन काम करने।
मेरे कई दोस्त छोड़ कर चले गए टीवी न्यूज़… कई कोई भी बेहतरीन मौक़ा मिलते ही छोड़ने की फ़िराक़ में हैं… अपने आसपास ज़रा ग़ौर से देखिए… दर्द बहुत गहरा है साहब…ये न तो ख़ामख़्वाह का स्यापा है… न ख़बरों की भाग दौड़ से दूर कहीं सुकून ढूंढ़ने की कोशिश। क्यूंकि जब उन्होंने इस दुनिया में क़दम रखा था विकल्प उनके पास तब भी मौजूद थे एमबीए करके कॉर्पोरेट दुनिया का हिस्सा बनने के या फिर कुछ और मां-बाप का सुझाया करने के।
लेकिन उन्होंने वो नहीं चुना, पत्रकारिता चुनी… जानते हैं, क्या सोच कर। ये कि हम कुछ बहुत अलग सी, अच्छी सी, नोबेल चीज़ का हिस्सा बनने जा रहे हैं। और फिर साल-दो साल की पढ़ाई और इतने ही वक़्त का काम जोश के सारे गुब्बारों को सुई चुभो चुभो कर फोड़ डालता है। क्यूंकि वो सब ये करने तो क़तई नहीं आए थे, चैन की ज़िंदगी को छोड़ कर।
ऐसा भी नहीं कि वो नासमझ क्रांति करना चाहते थे, वो तो बस जर्नलिज़्म करना चाहते थे… सीधा-सादा, बिना मिलावट का जर्नलिज़्म। इससे ज़्यादा की ख़्वाहिश नहीं थी उनकी। इस अजीब माहौल में जब हौसले के लिए अपने से वरिष्ठ की तरफ़ देखा गया तो या तो दुनियाबी ज्ञान मिला या बेबसी। तो क्या, सालों के अनुभव वाले पेड़, बढ़ती हुई पौध को संरक्षण नहीं दे सकते। शायद, उनमें दम नहीं है इतना। ख़ैर, जो पत्रकारिता छोड़ कर चले गए, भगवान उनकी पत्रकार आत्मा को शांति दे, कॉर्पोरेट आत्मा को उन्नति दे।
एक और भाव जो ज़्यादातर वरिष्ठ पत्रकारों के चेहरे पर चिर-चस्पा रहता है वो है… नए पत्रकारों की जानकारी का मखौल। यानी जो नम्बूदरीपाद, कानू सान्याल, कालाहांडी, संथाल विद्रोह, राजीव गोस्वामी के बारे में नहीं जानता, वो स्साला पत्रकार कैसे हो गया। अब जो पांच-सात साल की टीवी ख़बरों के बीच पांच बार भी ऐसे नामों से रू-ब-रू नहीं हुआ और जिसे टीवी पत्रकार बनने के बाद भी ऐसे नामों से दूर रहना है, उसके कौन से ज्ञान का इम्तेहान लेना चाहते हैं आप।
पूछना ही है तो ये पूछिए कि राखी सावंत ने जिस दिन अपने बॉयफ़्रेंड को थप्पड़ मारा था, उसके विजुअल का टेप नंबर क्या है। पूछिए कि जो बच्ची विषकन्या है, सांप सपेरों के बीच रहती है, जिसने डेढ़ महीना पहले छप्पड़ फाड़ के टीआरपी दी थी वो हमने पिछले हफ़्ते कब कब रिपीट किया था। पूछिए कि रणबीर-दीपिका के अलगाव की ख़बर के लिए इस समय बैकग्राउंड में कौन सा गाना फ़िट रहेगा। और जब वो इन सवालों के जवाब देने में नाकाम रहे तो आपको पूरी छूट है उसकी जानकारी का मखौल उड़ाने की। उस बेचारे को काहे आप इन ‘सीरियस’ चीज़ों में उलझाते हैं।
सोचिए साहब सोचिए वरना कुछ सालों बाद ये साली नई पौध पत्रकारिता के ताबूत में पड़ी लाश को आप ही के पते पर पार्सल करेगी ये सोच कर कि आपका कोई चहेता रिश्तेदार शायद न्यूज़रूम में छूट गया है!
प्रबुद्ध जैन का यह लेख उनके ब्लाग इसी बहाने से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.












vikash makkar
June 6, 2011 at 2:27 pm
I can understnd your pain dear drnd .
rajiv kishor
June 7, 2011 at 5:54 am
kuch din chutti laker aaram kar lo.
manish gupta
June 7, 2011 at 11:58 am
भाई बात तो तुम्हारी बिलकुल सही है लेकिन यदि पत्रकारिता में रहना है तो इसकी आदत तो अब डालनी ही पड़ेगी क्योंकि चकल्लस चलाना अब चैनल में टीआरपी के लिए जरूरी हो गया है ।
mahendra singh
June 11, 2011 at 6:16 am
yeh to hona hi Tha- mahendra amarujala ftp
Baba ramdev jabtak yog sikhate rhe sab kuchh teek cal rha tha lekin jaise hi unki rajnitik mattvakanchha samane ayi unke dusmano ki fehrist badne lgi. jiska andaja baba ko shayad hi rha ho but ye to hona hi tha…aage abhi kya-kya na ho jaye![s][/s]
mahendra singh
June 11, 2011 at 6:28 am
Badboli madam-
Baba ramdev par 4 june ko hui police karyvahi ke baad up ki cm mayawati ne jis prakar unka bacho karte hue upa sarkar ko aade hathon liya usse yhi laga ki madam baba ki badi hitasi hai lekin up me jab aandolan k liye baba ko jagah dene ki baat aayi to up sarkar ne kanoon vyawstha ki baat kahkar mamle se kanni katna hi behate samjha ab bjp jase dal madam ko kos rhe hai saath hi unke badbolepan ki chutkiyan le rhe hai…..!!