: आलोचना से मुझे ताकत मिलती है : आजकल गांव-गली, मोहल्लों-शहर-कस्बों सहित सारे जहान में जहां भी देखो एक चर्चा जरूर होती है कि फलां पार्टी का नेता अपने बेटे, दामाद, भाई, भाभियों और रिश्तेदारों को राजनीति में बढ़ावा दे रहा है, तो कुछ लोग यह चर्चा करते मिल जायेगें कि उस अधिकारी या कर्मचारी ने अपने बेटे, भाई या पत्नी को फलानी जगह स्थापित करा दिया अथवा गलत तरीके से परिवार के सदस्यों को लाभ पहुंचा रहा है।
ऐसी चर्चा करने वालों में हर क्षेत्र में वो लोग अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं, जिनके पैरों में जमीन पर खड़े होने की ताकत तो है नहीं, मगर वो आसमान पर उड़ने को कोशिश करते हुए मुफ्त का चन्दन घिस मेरे नन्दन वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए अपनी असफलता और अकार्य कुशलता की खीझ भड़ास के माध्यम से विष-वमन करके निकाल रहे हैं।इस कहावत को सभी जानते है कि शेर के पीछे हमेशा कुत्ते भौंकते हैं, मगर यह सिद्ध हो जाने के बावजूद कि कुत्तों के भौंकने से कुछ होने वाला नहीं है। और दूसरों के टुकड़ों पर बिना मेहनत करे जिन्दगी नहीं काटी जा सकती, इसके बावजूद कई लोग किसी ताकतवर व्यक्ति के लिए समर्थन जुटाने के नाम पर हमेशा मालपुये खाने की जुगाड़ में लगे रहते है। यह जानते हुए भी कि जूठी काठ की हाड़ी में ज्यादा देर तक कुछ नहीं पकाया जा सकता, के बावजूद मेरे कुछ मुफ्तखोर भइया ऐसे ही घटिया और असफल प्रयास करते रहते हैं, चाहे वह क्षेत्र राजनीति का हो या पत्रकारिता का।
अभी पिछले दिनों भाषाई समाचार पत्रों के सबसे बड़े संगठन इलना के सौ से ऊपर सदस्यों और चार पूर्व अध्यक्षों की मौजूदगी में पूरे नियमानुसार चुनाव की कार्रवाई सम्पन्न हुई, जिसमे देश के कोने-कोन से प्रकाशित होने वाले ऐसे भाषाई समाचार पत्रों के संपादकों ने भाग लिया, जो पिछले दो से पांच दशक पुराने समय से प्रकाशित होते चले आ रहे है और चुनाव में सभी वगों के अखबारों से संबंद्ध मालिक चुने गये, लेकिन क्योंकि इनमें हथेली पर सरसों जमाने वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए सिर्फ जुगाड़ के नाम पर पद हथियाने में लगे एक-दो ऐसे व्यक्ति, जिनके पास न तो कोई अखबार है और है तो वह निकलता नहीं है, वो पद पाने की अपनी कुचालों में सफल नहीं हो पाये तो उन्होंने भड़ास के माध्यम से अपनी कुलषित भावनाओं का ओछा प्रदर्शन किया, जो मेरे जैसे व्यक्ति के लिए प्रसिद्धि और मानसिक मजबूती का माध्यम बना।
जिस प्रकार कुछ व्यक्ति रसगुल्ले खाने में मजा लेते हैं, वैसे ही जब कोई मेरी आलोचना करता है और मेरे बारे में अपने हिसाब से कुछ बुरा कहता है तो मुझे अच्छा लगता है। इससे मुझे मानसिक और आत्मिक मजबूती मिलती ही है, क्योंकि मुझे इससे अपने पुराने वो दिन याद रहते है जब मैं एक चाय वाले की दुकान पर 50 पैसे महीने पर जूठे प्याला धोया करता था, और बाद में पांच रूपये महीने पर एक लाला जी के घर पर झाडू लगाने और बर्तन मांजने की नौकरी करता था। कई दफे वो भी छूट जाती थी तो सड़क पर पड़ी आटे की चोंकर उठाकर उसमें पानी और नमक मिलाकर पकाने के बाद उसे कपड़े में छानकर पेट की भूख मिटाया करता था। तब गरीब की जोरू सबकी भाभी की कहावत पर चलते हुए हर ऐरा-गैरा नत्थू-खैरा मेरी आलोचना तो करता ही था, साथ में प्रसाद के रूप में कुछ गालियां भी दे देता था। मैनें तब चिन्ता किसी की नहीं की तो आज तो परिस्थितियां ही बदल चुकी हैं।
मैं ठहरा अनपढ़-गंवार और निरक्षर इसलिए ज्यादा दांव-पेंच और घुमाव-फिराव की बात जानता नहीं, मगर साफ सी बात है कि दो पन्नों का अखबार छापने वाले मुझ जैसे मामूली व्यक्ति की चर्चा भड़ास जैसे देश के प्रतिष्ठित चैनल पर हुई जो मेरे लिए किसी राष्ट्रीय पुरस्कार से कम नहीं है, मगर मैं इसे अपना दुर्भाग्य ही कहूंगा कि इस काम को अंजाम देने वाला व्यक्ति डरपोक व नपुंसक निकला, क्योंकि उसने अपना नाम प्रकाशित न कराकर अपनी पहचाने छिपा ली और मै इतनी बड़ी खुशी और उपलब्धि जो मुझे उसके द्वारा की गई आलोचना के कारण मिली, मैं उसका इसके लिए आभार व्यक्त करने और उसे मिठाई खिलाने से भी वंचित रह गया। मुझे अपने इर्द-गिर्द बुराई और आलोचना करने वालों को पालने का शौक है, मगर यह मेरा सौभाग्य है कि मेरे साथी ऐसा करना तो दूर सोचते भी नहीं हैं। वो हमेशा हर रूप में मेरी भलाई और प्रगति व उन्नति का मार्ग प्रशस्त करने में लगे रहते हैं।
आलोचक भइया जी पहली बार किसी ने मुझे अपने प्रयासों से इतनी ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। मेरा आप से आग्रह है कि आगे डरपोक व नपुंसक की भांति आप अपना नाम न छिपाना और जितना व जिन शब्दों में हो सके भड़ास व अन्य चैनलों सहित कुछ नामचीन अखबारों में उसे अपने नाम के साथ विज्ञापन के रूप में जरूर प्रकाशित कराना। मैं तुम्हारी बढ़िया दावत जरूर करूंगा। नपुंसक आलोचक जी आप ने नंगी क्या नहायेगी क्या निचोड़ेगी वाली कहावत तो जरूर सुनी होगी, उसे दृष्टिगत रख सोचा जाये तो मेरे पास खोने को तो कुछ है ही नहीं। सो बदनाम हुए तो क्या हुआ, नाम तो हुआ वाली कहावत के समान मेरे नाम का भी कुछ चर्चा आपकी मेहरबानी से होता रहेगा, इसके लिए मै आप का बड़ा आभारी हूं और आपने जो अपनी कुंचाल से मुझे बल दिया उसके लिए मैं आप का आभार व्यक्त करते हुए इस आशा के साथ की भविष्य में भी आप मेरा मनोबल इसी प्रकार से बढ़ाते रहेंगे, मैं आप के परिवार और बच्चों की खुशहाली की कामना करता हूं। आप अपना यह अभियान जारी रखकर मेरा मनोबल बढ़ाते ही रहिये मैं आपका हमेशा ऋणी रहूंगा।
अंकित विश्नोई
अंकित विश्नोई इलना के एक्जक्यूटिव में सदस्य हैं.












Anil
September 29, 2010 at 6:35 am
Kya bat hai ankit ji, ye sher aapke liye
Mukhalfat se meri saksiyat savarti hai
main dushmano ka bhi aithram karta hoon
mahandra singh rathore
September 29, 2010 at 6:41 am
written by mahandra singh rathore
ankit bishnoi aapne thik likha hai. apne attit ke bare mai batna aur usse man lena bari baat hai. apna kaam kerte rehen thanks;
Ankit Bishnoi
September 29, 2010 at 9:47 am
priye sathiyon ye jo upar shirshak (आलोचना तो की, मगर वो डरपोक निकला ) ye Ravi kumar Bishnoi (Dainik Kesar khushbu Times) dwara likhit hai meine to ise pahunchane ke liye sutradhar ki bhumika nibhai hai…………..thanks