क्या ये बात सच है कि जैसा राजा होता है प्रजा भी वैसी ही होती चली जाती है. एक पत्रकार की हत्या ने फिर ये सवाल खड़ा कर दिया है. छुरा के पत्रकार उमेश राजपूत की हत्या ने एक और सवाल दागा है कि पत्रकारिता क्यों और किसके लिए? छुरा की राजधानी से दूरी मात्र अस्सी किलोमीटर है. जब मैं अपने वरिष्ठ पत्रकार साथी नारायण शर्मा और साथी संदीप पुराणिक के साथ कल सुबह सात बजे निकले तो रास्ते भर हम यही मनाते रहे कि किसी भी हालत में हमें अंत्येष्टि का भागीदार बनना ही है. ऐसे शहीद पत्रकार को कांधा देना हम अपनी खुशनसीबी समझ रहे थे.
जब हम छुरा पहुंचे तो छुरा पूरी तरह से बंद था. दो तीन लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि उमेश का शव पोस्टमार्टम के बाद उसके गाँव रवाना कर दिया गया है. छुरा से 12 किलोमीटर खरखरा से मुड़कर हम 14 किलोमीटर और आगे उमेश के गृहग्राम हीराबतर पहुंचे तो घर से शवयात्रा बाहर निकाली जा रही थी. घर में कोहराम मचा हुआ था. हम तो किसी को जानते भी नहीं थे. भीड़ में सोचा रायपुर से और कोई नहीं तो कम से कम नई दुनिया से तो कोई आया ही होगा. थोड़ी ही देर में गरियाबंद, मैनपुर, देवभोग और आसपास के कुछ परिचित चेहरे दिखने लगे. उमेश के शव को कन्धा देकर दूर जंगल तक हम गाँव वालों के साथ रहे. जंगल में एक तालाब के समीप चार कच्ची लकड़ियों के सहारे पक्की और जलाऊ लकड़ियों का चबूतरा बनाकर अर्थी रखी गयी. हम सारे पत्रकार साथी उन लोगों की मदद करते रहे.
डेढ़ घंटे बाद सब वापस उमेश के घर लौटे. पत्रकारों ने वहीं मीटिंग कर आगे की रणनीति तय की. सारे साथी छुरा थाने पहुंचे और गरियाबंद के पुलिस अधीक्षक कमल लोचन कश्यप को सूचना दी गयी. जब एसपी को आने में देरी हुई तो छत्तीसगढ़ वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष नारायण शर्मा के नेतृत्व में हमने थाने में ही धरना और नारेबाजी शुरू कर दी. एसपी के आते ही पत्रकार टूट पड़े उन पर. सबने तीन सूत्रीय मांग उन्हें सुनाई. काफी ना नुकुर के बाद छुरा के थानेदार को उन्होंने लाइन अटैच कर दिया और आरोपियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर लेने की बात कही. संदिग्ध महिला सरोज मिश्र और एक चिकित्सक को थाने में हिरासत में रखे होने की जानकारी भी दी गयी. यहां से साथी नारायण शर्मा और संदीप पुराणिक वापस आ गये और मुझे कुछ जिम्मेदारियां देकर गरियाबंद रवाना कर दिया.
आज दोपहर जब मैं रायपुर पहुंचा और अखबारों के इस मामले में कवरेज देखा तो जान जल गयी. नई दुनिया ने छापा है कि स्थानीय संपादक रवि भोई, महाप्रबंधक मनोज त्रिवेदी, प्रसार प्रबंधक केयूर तलाटे और प्रांतीय प्रमुख घनश्याम गुप्ता भी अंत्येष्टि में शामिल हुए. ये झूठ तो मैं पचा भी गया. दूसरा मामला जो मैं हजम नहीं कर पाया वो ये है कि नई दुनिया ने मृतक उमेश को अंशकालिक पत्रकार बताया है. अब मुझे कोई बताएगा कि ये अंशकालिक और पूर्णकालिक क्या होता है. आज ही बताना ज़रूरी था कि उमेश अंशकालिक पत्रकार था. अपना रक्षा धन जमा करके बिना तनख्वाह के और अपनी जान हथेली पर रखकर पत्रकारिता करने वाले अंशकालिक? कौन है पूर्णकालिक? रवि भोई? जो छत्तीसगढ़ के मुखिया की जी हुजूरी करता फिरता है. उन्हीं से सीखा होगा ना कि अपने अधीनस्थ की अंत्येष्टि में जाए बिना विज्ञप्ति जारी कर दो. अरे मेरे भाई अगर अंत्येष्टि में नहीं गये तो क्या हुआ परिवार वालों को सांत्वना तो दे आते. और अगर सांत्वना भी दी तो विज्ञप्ति में लिखवाना था कि नई दुनिया परिवार ने मृतक उमेश राजपूत के परिजनों से उसके गृह ग्राम जाकर भेंट की. ये सब भी अब मुझे ही बताना पड़ेगा.
इधर प्रेस क्लब रायपुर का हाल देखिये. रोनी सी शक्ल लेकर बैठ गये अनिल पुसदकर और शोक सभा ले ली. चूँकि महासचिव ने भी इस्तीफ़ा दे दिया है इसीलिये मैं तो उन्हें अध्यक्ष मानता ही नहीं. वो मानते हों तो एक आमसभा भी बुला लें. खैर.. बाजू में बैठा लिया बिलासपुर के अपने भाई शशि कोन्हेर को. भाई इसीलिये लिखा क्योंकि दोनों ने बेशर्मी से चार साल से चुनाव नहीं करवाए हैं. हो गयी शोकसभा. विज्ञप्ति भी जारी हो गयी. एक और पत्रकार संघ ने भी सब के नाम डालकर विज्ञप्ति जारी की. उनके अध्यक्ष को लिखना-पढ़ना आता नहीं इसीलिये शंकर पाण्डेय को भी साथ ले लिया है. अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा?
अब एक नजर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भी डाल लें. इस घटनाक्रम पर पत्रकार की हत्या के स्क्रोल से लेकर अंत्येष्टि तक सिर्फ जी24 घंटे छत्तीसगढ़ ने नज़र रखी. बाकी चैनलों ने तो पट्टी तक चलाना उचित नहीं समझा. इस पूरी खबर पर जी24 के गरियाबंद संवाददाता फारुक मेमन और उनके कैमरा पर्सन फर्हाज़ जमे रहे. बाद में सहारा ने भी कैमरामैन को वहां भेजा. उसके बाद न्यूज़ एक्स और पी7 ने इस मामले को कवर किया है. मैं नारायण शर्मा या अपनी बड़ाई नहीं कर रहा. जिसके ऊपर ज़िम्मेदारी है उसे तो आगे आना ही होगा, लेकिन बाकी लोग क्या सरकार की तरह राजधानी में ही बैठकर सारी समस्याओं का हल ढूंढ लेंगे. इस संजीदा मामले में पत्रकारों के लिए लड़ने वालों की बात करने वालों की ये अदा मुझे कुछ जंची नहीं. अब तो पत्रकरों को सोचना ही पड़ेगा कि हम आखिर पत्रकारिता में आये क्यों हैं? और किसके लिए कर रहे हैं पत्रकारिता? मुझे जो चीज़ें दिल से बुरी लगीं मैंने लिख दिया. आपको अगर ये सब अच्छा लगा तो प्लीज़……don’t comment here.
लेखक अहफाज रशीद रायपुर में पत्रकार हैं.












rajkumar soni
January 27, 2011 at 1:08 pm
सच तो यह है अहफाज हममें से हर किसी को एक न एक दिन इस दुनिया से कूच करना ही है। यदि हम अभी एकजुट न हुए तो फिर कब होंगे। तुमने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इस पर लोगों की सफाई आनी चाहिए…
आएगी …. पक्का आएगी… कुछ तो असली नामों से आएगी
बाकी बुर्का ओढ़कर टिप्पणी करेंगे
madan kumar tiwary
January 27, 2011 at 6:09 pm
रशीद भाई इतनी समझ तो मुझे है की समझ सकुं कि आप जो बोल रहें हैं, वह शत प्रतिशत सत्य है। ये मादरचोद नई दुनिया वाले का नंबर दो । मै अभी इन कमिनों के साईट पर गया था , कोई नंबर नही मिला जिसपर संपर्क हो सके । सुबह भी इनके नंबर को खोजुंगा । यशवंत तुम भी सुनो , मेरा जैसा आदमी तुमको आदर्श मानता है जबकि तुम बहुत छोटे हो , तुमने क्या सिर्फ़ गुब्बार निकालने के लिये पोर्टल खोला है। अगर सिर्फ़ गुब्बार के लिये खोला है तो यह भी बता दो ,मैं बंद कर दुंगा भडास पर आना । अन्यथा लडना सिखो । जो तीन सूत्री मांगे है , उसे उठाओ । अगर कुछ नहि कर सकते तो कम से कम कमीने अधिकारियों का नंबर तो दो । और रशीद भाई आप को भी एक संदेश , उमेश की पत्नी या परिवार क्या चाहते हैं , वो कैसा इंसाफ़ चाहते है , यह तो बताना चाहिये था ताकि उसके लिये हम संघर्ष कर सकें । आप तो सिर्फ़ अपनी सुनाते रहे । जबकि सबसे ज्यादा क्षति उमेश के परिवार को हुई है ।
shailendra shukla
January 27, 2011 at 6:15 pm
अहफाज भाई यह तॊ वहीं नारायण शर्मा है जिनके बारे में बस्तर बंधु सरकारी पैसे के दुरुपयॊग के बारे में छापा था तॊ शर्मा जी कैसे कर्तव्यनिष्ठ हॊ गए। यह आपस की लड़ाई आप सार्वजनिक मंच पर लेजाकर आखिर क्या जताना चाहते हैं।
dilip sharma
January 28, 2011 at 2:20 am
patrkarita jivan me umesh rajput hamesa soshadh ka sikar raha hai jeske liye mar metane par tayar tha aaj use kiya mela sardhanjali. umesh rajput ki maot ke bad ab to jago