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एक ऐसा अखबार है जहां चरण वंदना संस्कृति नहीं, तरक्की का अकेला रास्ता है

ऐसा क्यों होता है कि पावर मिलने के बाद ज्यादातर हिंदी पत्रकारों के दिमाग ख़राब हो जाते है? ज्ञानी कहते हैं कि जिस व्यक्ति के अन्दर कुछ ख़ास तत्त्व (substance) नहीं होता, वह आक्रामक होने का चोला चढ़ा कर अपनी कमजोरियों को छिपाने का प्रयास करता है और इस प्रक्रिया में अपना असली व्यक्तितत्व खो देता है. एक झूठ में वो लगातार जीता रहता है और अपने अधीनस्थों का जीना हराम कर देता है.

ऐसा क्यों होता है कि पावर मिलने के बाद ज्यादातर हिंदी पत्रकारों के दिमाग ख़राब हो जाते है? ज्ञानी कहते हैं कि जिस व्यक्ति के अन्दर कुछ ख़ास तत्त्व (substance) नहीं होता, वह आक्रामक होने का चोला चढ़ा कर अपनी कमजोरियों को छिपाने का प्रयास करता है और इस प्रक्रिया में अपना असली व्यक्तितत्व खो देता है. एक झूठ में वो लगातार जीता रहता है और अपने अधीनस्थों का जीना हराम कर देता है.

इस बीमार मानसिकता का सबसे बड़ा शिकार दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों से निकलने वाला एक अखबार है.  यह एक ऐसा अखबार है जहाँ चरण वंदना एक संस्कृति ही नहीं, तरक्की का अकेला रास्ता है.  मालिकों ने इस संस्कृति को बाकायदा पनपने दिया और लाला के छुटभैये कर्मचारी से महाप्रबंधक और अघोषित सम्पादक बने लोगों ने इसे खूब बढ़ावा दिया. इस अखबार में काम करने वाले कितने पत्रकार (पत्रकार कहना ठीक होगा क्या?) भला सीना ठोंक कर यह कह सकते हैं कि उन्होंने मालिक और महाप्रबंधक के पैर कभी नहीं छुए.  इक्का दुक्का होंगे- वह भी कहीं किनारे लगे होंगे.

इस चरण वंदना संस्कृति का नया पोषक है, एक शख्स जो आज कल डेस्क का `बादशाह’ है.  लोग कहते हैं तो हम मान लेते हैं कि वो एक पत्रकार हैं, हालांकि मैंने कभी उसका लिखा कुछ पढ़ा नहीं.  पर लोग बता रहे हैं कि आज कल इसने खूब लिखना शुरू कर दिया है.  नहीं– नहीं- अखबार में नहीं, बल्कि एसएमएस पर.  रात की पाली खत्म कर देर से सोने वाले अपने अधीनस्थों की नींद हराम करने के लिए एह शख्स अलसुबह दर्ज़नों एसएमएस पेलता रहता है — जिसमें तत्त्व नहीं बल्कि महज़ भाषण होता है. लोग झुंझलाते हैं, अपनी किस्मत को रोते हैं, पर कुछ कर नहीं पाते क्योंकि अगर उसकी इस सैडिस्ट हरकत की शिकायत भी की तो नौकरी से हाँथ धोना पड़ेगा.

क्यों करता है वह पत्रकार यह हरकत?  जाहिर है छोटी मासिकता का आदमी है. कभी सपना पाला होगा आईएस बनने का. पर क़ाबलियत नहीं थी तो हाथ पैर जोड़ कर इस अखबार में घुस गया और मालिक के चरण छूते छूते दमदार पोजीशन पर आ पहुंचा.  अब एक छोटे आदमी को अफसरी दिखने का मौका जीवन में पहली बार मिला है तो भला उसको कैसे जाने दे? बीमार संस्कृति के पहरुवों के हाँथ पत्रकारिता की बागडोर आ गयी है. जिसे अपनी खुद्दारी और इज्ज़त दांव पर लगा कर पत्रकार बने रहने का मुगालता पाने रहना है, वो झेलता रहे मालिक, जीएम और संपादक जैसे घसियारों को.

राज श्रीवास्तव
दिल्ली

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0 Comments

  1. rajeev singh

    October 2, 2011 at 2:16 pm

    aapne jo kuch likha hai wo toh har jagah hota hai

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