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कानाफूसी

एक निष्ठावान बुढ़ाते पत्रकार के साथ यह अच्छा नहीं हुआ

एक दशक तक दैनिक भास्कर, सागर की इकाई में वफादारी से नौकरी करने के बाद जब जब एक युवा पत्रकार उम्र के ढलान पर पहुंचा और उसने अपने घर मकान बीबी और बच्चों के सन्दर्भ में सोच कर उसी स्थान पर बसने के सोची तो भास्कर मैनेजमेंट को यह नागवार गुजरा कि एक अदना पत्रकार जो उनके कौडियो पर पलने वाला है वह मकान कैसे बनाने की सोच सकता है, अपने बच्चे को कैसे पढ़ाने के सोच सकता है, और मैनेजमेंट ने उस बन्दे का ट्रान्सफर कर दिया.

एक दशक तक दैनिक भास्कर, सागर की इकाई में वफादारी से नौकरी करने के बाद जब जब एक युवा पत्रकार उम्र के ढलान पर पहुंचा और उसने अपने घर मकान बीबी और बच्चों के सन्दर्भ में सोच कर उसी स्थान पर बसने के सोची तो भास्कर मैनेजमेंट को यह नागवार गुजरा कि एक अदना पत्रकार जो उनके कौडियो पर पलने वाला है वह मकान कैसे बनाने की सोच सकता है, अपने बच्चे को कैसे पढ़ाने के सोच सकता है, और मैनेजमेंट ने उस बन्दे का ट्रान्सफर कर दिया.

अनुशासन और स्वर्णिम भविष्य का हवाला देकर उसे विदा किया. उस बुढ़ाते पत्रकार को यह हरकत बुरी तो बहुत लगी परन्तु उम्र के साथ ठंडा होता खून-जुनून, घिसती कलम और कम बैंक बैलेंस ने उसे बगावत न करने पर मजबूर कर दिया. वैसे भी ‘ओल्ड इज गोल्ड’ की कहावत अब मीडिया जगत में नहीं चलती. ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का हवाला देने वाले भास्कर समूह के उच्च श्रेणी के उम्दा मैनेजमेंट ने एक बार भी उससे यह नहीं पूछा कि क्या कोई समस्या है?

उस हताश पत्रकार के दिल की बात यह थी कि काफी दिनों से सागर में काम करने के कारण एक अच्छे स्कूल में उसके बच्चे आधी फीस पर पढाई कर रहे थे. सागर में भी काफी सम्मान था और लोग-बाग उधारी दे देते थे. नई जगह और वह भी परिवार के साथ स्थापित होना कितना कठिन कार्य है, यह तो वही समझ सकते हैं जिन पर गुजरी हो? किसी प्रकार अपने जुगाड़ से वह महोदय अपना गुजर बसर कर रहे थे पर पत्रकारों से तो खुदा भी रूठा रहता है. मैनेजमेंट की अन्दर की बात यह थी कि सागर यूनिट मे सबसे सीनियर होने के कारण हर आम आदमी और कर्मचारी पत्रकार महोदय का सम्मान करते थे और संपादक तथा मार्केटिंग हेड को उनका यह सम्मान पचता नहीं था.

ऐसा नहीं है कि उन्होंने कहीं और ट्राई नहीं किया और ऑफर न आये हों परन्तु वास्तविकता यह थी कि इतने वर्ष नौकरी करने के बाद भी उनका बैंक बैलेंस मात्र १७०००/- रुपये था और वे इस स्थिति में नहीं थे कि रिस्क ले सकें.  कितने आश्चर्य की बात है कि बड़े बड़े पेपरों में बैठे यह आका लोग कितने संवेदनहीन हो जाते हैं और पूरी दुनिया को नसीहत देने का दम भरने वाले खुद कितने खोखले होते हैं, यह कोई इनसे पूछे.

बुंदेली धमाका ब्लाग से साभार

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0 Comments

  1. pankaj

    April 19, 2011 at 7:33 am

    media ke aandar kewal tanashahi hai, bhale bahur ke loktantra ke liye dhwaja uthate ho,

  2. sudhir must

    April 19, 2011 at 12:44 pm

    Dainik Bhaskar sabhi ke saath aisa hui karta ha. Bhiwani(Haryana) me JKVerma ke saath bhi yahi kiya. ye akhbaar subka shoshan karta ha.

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