: क्यों न रावण की जगह आज राम को जलाया जाए : ईरान की एक महिला जेल की सलाखों में बंद है. उसका कसूर था कि उसने अपनी पति की हत्या कर दी. उसका पति एक अय्याश किस्म का आदमी था, जो जबरन उससे वेश्यावृत्ति करवाता था. शादी के बाद अगले ही दिन उसे अपने पति की हकीकत का पता चल गया था. पिछले दस से बारह सालों से वो जबरन उसे वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर करता चला आ रहा था. वह मजबूर थी क्योंकि ईरान के क़ानून में पति से तलाक लेना कोई आसान काम नहीं हैं.
न जाने इतने साल वो कितने ही आदमियों के सामने कैसे खुद को परोसती रही और इन बारह सालों में उसने अपनी मजबूरी को कभी अपनी मर्जी नहीं बनने दिया. एक दिन अपने पति के किसी दोस्त की सहायता से उसने अपने पति की हत्या कर दी. तब से लेकर आज तक वो जेल की सलाखों में बंद है. आज उसे जेल में दस साल बीत चुके हैं और वो पति का दोस्त जिसने उसे हत्या के लिए उकसाया था, आज खुले आम घूम रहा है. ईरान के कानून ने आज उसे सरेआम पत्थर मारकर हत्या कर दिए जाने की सजा दी है.
भारत सरकार से उसने मदद की गुहार लगाई है. यह कहानी ईरान की नहीं बल्कि एक ऐसे संसार की है जहाँ हर कदम पर महिलाओं को एक तुच्छ प्राणी समझ कर उनकी उपेक्षा की जाती है. आखिर क्यों होता है ऐसा कि एक औरत जो कभी माँ बनकर, कभी बेटी बनकर, कभी पत्नी बनकर तो कभी पुत्री बनकर मर्द की सेवा करती है, जब उसे एक दिन जरूरत होती है किसी मर्द की तो उस दिन ये सेवा करने वाले हाथ नदारद होते हैं. आखिर कोई क्यों नहीं समझता कि हर कदम पर अत्याचार सहने वाली ये औरत समाज की सबसे बड़ी जरूरत है, जिसके बिना कोई भी कार्य असंभव है.
कहते हैं कि हर मर्द की सफलता के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है, कहते हैं कि एक औरत ही मकान को घर बनती है, पर क्या ये सही है कि घर बनने के बाद उसी औरत को घर से निकाल दिया जाए? हर अत्याचार आज सिर्फ औरतों के साथ ही क्यों हो रहा है? क्या सिर्फ इसलिए कि आज की औरत कंधे से कन्धा मिला कर मर्द के साथ चल रही है? या इसलिए कि आज उसने बुर्के को उतार फेंका है और मनमाने वस्त्र पहन कर सबके सामने आने लगी है? या इसलिए कि अब उसने घर के सीमा लांघ कर दफ्तर जाना शुरू कर दिया है? या इसलिए कि अब वो एक शादी करके सारी ज़िन्दगी किसी ऐसे आदमी के साथ नहीं गुजार सकती जो उसके सुख दुःख में उसका साथ न दे पाए.
वास्तव में एक कड़वा सच तो यही है कि ये वो देश है जहाँ राम बसते थे, जिन्होंने स्वयं अपनी पत्नी सीता पर अत्याचार किया था. जिन्होंने निर्दोष होने पर भी अपनी पत्नी सीता की अग्निपरीक्षा ली थी और इस अग्निपरीक्षा के उपरान्त भी उन्होंने सीता को घर से निकाल दिया था. अगर वे भगवान थे तो उनके लिए अपनी पत्नी का परित्याग करना सही नहीं था. क्योंकि वो जानते थे कि सीता निर्दोष हैं. उसी राम का अनुसरण तो करता है ये संसार और इसीलिए उस राम को पूजा जाता है और रावण को जलाया जाता है. सुन कर भले ही अजीब लगे परन्तु ये एक तथ्य है कि रावन बहुत ही धार्मिक किस्म का आदमी था. जिसने अपनी कठिन पूजा के बल पर अमर होने का वरदान प्राप्त किया था. उसने अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए अपना राज्य, अपने प्राण और अपने वंश को भी दांव पर लगा दिया था.
आज भी न जाने कितने ही राम अपनी पत्नियों को घर से निकाल देते हैं, चाहे वे दहेज़ के कारण निकालें या फिर शक के आधार पर. तथ्य तो यही है कि वो आज के युग के राम हैं. और न जाने कितने ही रावण आज भी अपनी बहन बेटी और माँ की इज्ज़त के लिए लड़ते हैं, पर आज भी बदले में उन्हें वही आग नसीब होती है, जिसमें रावण आज भी जल रहा है. औरत के साथ अन्याय आज कोई नयी बात नहीं है, वो तो किसी न किसी रूप में होता ही रहता है, चाहे वो दहेज़ का मसला हो, चाहे भ्रूण हत्या का या फिर कोई और. ये मानसिक रूप से विक्षिप्त इसी समाज की कहानी है, जिसने अपनी संकीर्ण मानसिकता के चलते कितनी ही स्त्रियों को मौत की नींद सुला दिया. न जाने कितनी ही समस्याओं के कारण आज भी हमारा समाज लड़कियों को वो जगह नहीं दे पाया, जिसकी वे हकदार हैं.
आज भी बहुत सी लड़कियां ऐसे माहौल में जन्म लेती हैं, जहाँ लड़की का जन्म होते ही वातावरण में अजीब सी चुप्पी और ख़ामोशी व्याप्त हो जाती है. लड़के के इंतज़ार में बैठे गाने बजाने वालों को घर के बुजुर्गों द्वारा मूक भाव से जाने का संकेत दे दिया जाता है. और यही लोग फिर कन्याओं की भ्रूण हत्या करने से भी नहीं चूकते. उपरोक्त कहानी भी ईरान की नहीं बल्कि इस पूरे संसार की है, जहाँ हर कदम पर महिलाओं को संघर्ष का सामना करना ही पड़ता है. पर अब महिलाएं कमजोर नहीं हैं. अब वो हर राम का मुकाबला करने में काफी हद तक सक्षम हैं. अगर आप सहमत हैं तो क्यों न निश्चय करें कि इस बार रावण की जगह राम को जलाया जाए?जय हिंद!
लेखिका अलका शर्मा दिल्ली में एक कंपनी में कार्यरत. ब्लागिंग में सक्रिय.












पंकज झा.
March 9, 2011 at 2:56 pm
अजीब दास्ताँ लिख दी अलका जी ने तो..पता ही नहीं चला कहाँ से शुरू और कहाँ से खतम कर दिया. अब नारी के अपहरणकर्ता को पूज्य बना देना नारी से संबंधित लेख में ही, इसके अलावा रावण को धार्मिक बता देना औए ऐसे ही तर्कों की बारंबारता ने एक अच्छे हो सकने वाले लेख की ऐसी-तैसी कर दी.इं सब भरकाऊ चीज़ों से बच कर भी इसे अच्छा लिखा जा सकता था.
alok misra
March 10, 2011 at 2:29 am
ma’am ap se gujarish hai ki ap Ram Charit Manas ka hindi anuvad jarur pade.
sanjay
March 10, 2011 at 4:31 am
ये वो लोग हैं जो अपने महापुरुषों, इतिहास, संस्कृति आदि को अपमानित कर अपने को सम्मानित समझते हैं. यदि घटना ईरान की है तो मुहम्मद साहब को कहो. राम, बुद्ध एवं गाँधी को समझना इनके वश की बात नहीं. अधजल गगरी छलकत जाये.
sunita gupta
March 10, 2011 at 4:54 am
RAm aur Ravan ki tulna hum na he karen to achha lekin kisi ke kahne matra se apni patni seeta ko ghar se nikal dene par Ram bhi stree virodhi he kahlayenge. Is such ko likhne ka sahas karne par Alkaji ko badhai.
alka sharma
March 10, 2011 at 5:26 am
lagta hai pankaj ji ne abhi ramayan padi nahi hai or agar padi hai to upar se nikal gai .
rajesh kumar
March 10, 2011 at 6:13 am
gud alka ji. achha likha aapne.
rajesh kumar
[email protected]
atul shrivstava
March 10, 2011 at 6:17 am
अच्छा लेख।
शुभकामनाएं आपको।
rahul singh
March 10, 2011 at 6:40 am
बहुत अच्छा उद्धरण दिया मोहतरमा ने ….सायद इन्हे रावन जायदा पसंद है …. इस वक्त रावन की समाज में कमी नहीं है …. इनके मानसिक इस्थति को देख भगवान राम से दुआ करुगा इनहे रावन जेसा पति या दोस्त ही मिले …..आमीन …..Rahul
lucky
March 10, 2011 at 8:18 am
इस बात को नहीं नाकारा जा सकता क अलका के यहाँ नारी के लिए सम्मान क साथ साथ दर्द भी छुपा है जो के प्रकिर्तिक है! अलका, आज काफी कुछ बदला है लेकिन मैं ये भी मानता हूँ क अभी और आवश्कता है पुरुष समाज क सहयोग की और वो धेरे धेरे बढ़ ही रहा है, कम नहीं हो रहा! आपका लेख काफी जोशीला और धमाकेदार है लेकिन अलका अगर पुरुष की बात की जाये तो पुरुष की इस सोच में भी नारी का ही योगदान है. जन्म से कोई ऐसा नहीं सोचता क महिला को आगे नहीं बढ़ने देना, लार्कियाँ कुछ नहीं क्र स्क्ती या उनसे प्र्तीस्प्रधा! इसमें अधिकतर सोच का हिस्सा परिवार से संस्कारों में मिलता है क्यूँ क वो बचपन में बहन के साथ होता वेव्हार देख रहा है! क्यूँ माँ सदा बेटी को ही काम क लिए बोलती है ! आप स्वम बताएं कितनी बार ऐसा हुआ क छुट्टी क दिन किसी भाई ने घर में चाये या खाना बनाया. बोहत कम ऐसा होता है.
अवेश्कता है सोच बदलने की अपनी भी और समाज की भी जिसमे शताब्दियाँ लग जाती हैं! क्या आपने कभी सोचा क सारे धर्म कर्म क कार्यों के लिए महिलायों को ही क्यूँ प्रेरित किया गया या कभी आपने किसी महिला पंडित से भेंट की या महिला मुल्ला से या फिर महिता सिख प्रीस्ट से!
शायद आपको याद होगा क एक महिला ने एक देश में नमाज़ पढ़ा दी थी उसपे हंगामा हो गया जबके वो महिला पी एच डी थीं इस्लामिक स्टडीज़ में! ठीक इसी प्रकार क्या आपने किसी महिला को विवाह की प्रक्रिया सम्पन्न करते देखा, शायद नहीं! मैंने भी किसी सिख महिला को ग्रुद्वारे में पुरुषों के इस्थान पे पाठ और सम्बन्धित कार्य करते नहीं सुना! इससे आप अंदाज़ा लगा स्कटी हैं क जो आप कह रही हैं वो कितना ठीक है! न ही सारे परुष ग़लत हैं और न ही साडी महिलाएं सही. हम दोनों को ही अपने अपने अंदर झांकना चाहिए और बदलने का प्रयास अवश्य करना चाहिए!
आपकी स्टोरी में दम है लेकिन दलीलों में नहीं क्यूँ क इस देश में सबको सम्मान और अधिकार समान हैं और मीडिया वालों का दाइत्व आम जन से कहीं अधिक है.
जहाँ तक रावण का प्रश्न है तो मुझे नहीं पता उन्होंने इतिहास में कहीं कोई ऐसा कार्य किया हो जिसमे उनका स्वार्थ न हो जबके राम ने अपने लिए कुछ नहीं किया ! रही बात गयान की तो अलका जी ज्ञान केवल ज्ञान के लिए नहीं बलके अपने जीवन में उन आदर्शों को प्र्क्तिकली करने क लिए होता है , गयांन ग़लती से रोकने क लिए होता है न क मनमानी करने क लिए … रावण बोहत गयानि था परन्तु रामचन्द्र जी ने सबकुछ स्वम क्र क दिखाया! क्यूँ क वो उस समय एक आम जन का प्रिनिधित्व क्र रहे थे! कुछ बातें केवल समझने से सम्बन्धित होती हैं जो समझ लेता है उसकी हो जाती हैं !
समाज में बदलाव अगर कोई ला सकता है तो वो केवल और केवल मीडिया !!!!!!
charanjeet
March 10, 2011 at 8:54 am
pankaj g shayad apne thik se pada nahi ki alka g kya kehna chahti hai. pehle un ki baat ko thik tarah se samjhiye vir koi uttar dijiye.
VS
March 10, 2011 at 10:00 am
I wish Alka Sharma gets her Ravan very soon! Best of luck.
waseem
March 10, 2011 at 10:54 am
Nudity kho ladkiya he bara thi hey agar who movies mey bold scene or fashion show mey bra or panty ka prachar bandh ker dey tho acha hey,mujko lagta hey aap log iran key khilaf tho boltay ho but america duwara baniyi zari blue film ko nari ki azadi ka prateek manatey ho
मदन कुमार तिवारी
March 10, 2011 at 4:53 pm
पंकज जी राम के नाम का प्रयोग सांकेतिक रुप में किया गया है । अलका ने पुरुष प्रधान समाज की सोच पर चोट किया है , वैसे भी राम को तो बुरे लोगो ने हाईजैक कर लिया है ।
lucky
March 11, 2011 at 4:52 am
इस बात को नहीं नाकारा जा सकता क अलका के यहाँ नारी के लिए सम्मान क साथ साथ दर्द भी छुपा है जो के प्रकिर्तिक है! अलका, आज काफी कुछ बदला है लेकिन मैं ये भी मानता हूँ क अभी और आवश्कता है पुरुष समाज क सहयोग की और वो धेरे धेरे बढ़ ही रहा है, कम नहीं हो रहा! आपका लेख काफी जोशीला और धमाकेदार है लेकिन अलका अगर पुरुष की बात की जाये तो पुरुष की इस सोच में भी नारी का ही योगदान है. जन्म से कोई ऐसा नहीं सोचता क महिला को आगे नहीं बढ़ने देना, लार्कियाँ कुछ नहीं क्र स्क्ती या उनसे प्र्तीस्प्रधा! इसमें अधिकतर सोच का हिस्सा परिवार से संस्कारों में मिलता है क्यूँ क वो बचपन में बहन के साथ होता वेव्हार देख रहा है! क्यूँ माँ सदा बेटी को ही काम क लिए बोलती है ! आप स्वम बताएं कितनी बार ऐसा हुआ क छुट्टी क दिन किसी भाई ने घर में चाये या खाना बनाया. बोहत कम ऐसा होता है.
अवेश्कता है सोच बदलने की अपनी भी और समाज की भी जिसमे शताब्दियाँ लग जाती हैं! क्या आपने कभी सोचा क सारे धर्म कर्म क कार्यों के लिए महिलायों को ही क्यूँ प्रेरित किया गया या कभी आपने किसी महिला पंडित से भेंट की या महिला मुल्ला से या फिर महिता सिख प्रीस्ट से!
शायद आपको याद होगा क एक महिला ने एक देश में नमाज़ पढ़ा दी थी उसपे हंगामा हो गया जबके वो महिला पी एच डी थीं इस्लामिक स्टडीज़ में! ठीक इसी प्रकार क्या आपने किसी महिला को विवाह की प्रक्रिया सम्पन्न करते देखा, शायद नहीं! मैंने भी किसी सिख महिला को ग्रुद्वारे में पुरुषों के इस्थान पे पाठ और सम्बन्धित कार्य करते नहीं सुना! इससे आप अंदाज़ा लगा स्कटी हैं क जो आप कह रही हैं वो कितना ठीक है! न ही सारे परुष ग़लत हैं और न ही साडी महिलाएं सही. हम दोनों को ही अपने अपने अंदर झांकना चाहिए और बदलने का प्रयास अवश्य करना चाहिए!
आपकी स्टोरी में दम है लेकिन दलीलों में नहीं क्यूँ क इस देश में सबको सम्मान और अधिकार समान हैं और मीडिया वालों का दाइत्व आम जन से कहीं अधिक है.
जहाँ तक रावण का प्रश्न है तो मुझे नहीं पता उन्होंने इतिहास में कहीं कोई ऐसा कार्य किया हो जिसमे उनका स्वार्थ न हो जबके राम ने अपने लिए कुछ नहीं किया ! रही बात गयान की तो अलका जी ज्ञान केवल ज्ञान के लिए नहीं बलके अपने जीवन में उन आदर्शों को प्र्क्तिकली करने क लिए होता है , गयांन ग़लती से रोकने क लिए होता है न क मनमानी करने क लिए … रावण बोहत गयानि था परन्तु रामचन्द्र जी ने सबकुछ स्वम क्र क दिखाया! क्यूँ क वो उस समय एक आम जन का प्रिनिधित्व क्र रहे थे! कुछ बातें केवल समझने से सम्बन्धित होती हैं जो समझ लेता है उसकी हो जाती हैं !
समाज में बदलाव अगर कोई ला सकता है तो वो केवल और केवल मीडिया !!!!!!
Tarun Sisodia
March 11, 2011 at 7:15 am
अच्छा लेख है। इसमें महिलाओं पर हो अत्याचार की पीड़ा साफ झलकती है और यह सही भी है। लेकिन आपने राम और रावण का जो उदाहरण दिया है, उसे दुरूस्त करने की जरूरत है।
पंकज झा.
March 12, 2011 at 2:13 pm
अलका जी रावण के बदले राम को जलाना चाहती हैं ..अब क्या बचा है कहने को…?
मैंने रामायण पढ़ी या नहीं इसके बारे में क्या कहूँ…लेकिन अपने ही बाप-पुरुखों को गरिया कर अलका जी ने अपना प्राप्य हासिल किया. बहुत टिप्पणी मिल गयी उनको बधाई.
मदन जी आप और कुछ नहीं तो इनका अंतिम वाक्य पढ़ लीजिए जहां ये सीधे तौर पर रावण के बदले राम को जलाने की बात करती हैं.चलिए….. भगवान सबको सनमित दे.
siddhartha
March 13, 2011 at 6:07 am
मुँह की लागी कुतिया बोले ताल बेताल। कहने से पहले सोचना जरूरी होता है,हो सके तो
रामायण पढ़ लेना।राम ने सीता के लिए ही रावण से युद्ध किया था।जहाँ तक भारत का प्रश्न है तो हमारी संस्कृति में आज भी स्त्री को आदर की नजर से देखा जाता है।मगर ये जानने के लिए संस्कृती का ज्ञान आवश्यक जो शायद आपको संस्कारों में नहीं मिला महोदया।
nagmani pandey
March 13, 2011 at 11:11 am
ALKA JI lekha acha jisme mahilawo ka saman ki bat kahi hai ….. lekin ram ki tulna ravan se kiya hai use sudhare taki ….jo aap ko galt bata rhe hai unhe jawab mil jaye…
pradeep sundriyal
March 13, 2011 at 3:17 pm
बहुत अच्छा लेख है लेखिका ने औरत पर हो रहे ज़ुल्म के बारे में सटीक लिखा है परन्तु “राम रावन” का उदहारण सही नहीं दिया………..आपकी सोच को में समझ सकता हूँ पर आपके शब्दों में कुछ सुधर की जरुरत है……………….
alka sharma
March 14, 2011 at 5:07 am
आप सभी ने जो तर्क दिए उसका मैं आदर करती हूँ पर यहाँ बताना चाहूंगी की मैं कोई पुरुष विरोधी नहीं और ना ही राम के खिलाफ और रावण के पक्ष मैं हूँ , मैं तो सिर्फ सच्चाई का साथ दे रही हूँ और समाज को बता रही हूँ की गलत चीज हमेशा गलत होती है चाहे वो इंसान करे या भगवान् !राम ने अपनी गर्भवती पत्नी सीता को घर से चाहे किसी भी कारण घर से निकला हो मगर हम सब जानते हैं की वो सहीं थी भले ही रावण की कुटिया मैं वो कई दिन रहीं परन्तु यह भी एक सच्चाई है की रावण ने उनको हाथ तक नहीं लगाया !फिर हमारा आज का कानून कहता है की भले ही सौ अपराधी छूट जाएँ परन्तु एक भी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए तो फिर सीता को किस बात की सजा मिली थी ? सिर्फ इस बात की कि उन्होंने भी एशो आराम छोड़ कर अपने पति के साथ वनवास भोगना उचित समझा ?
और जहाँ तक लक्की जी का सवाल है कि यह पुरुष प्रधान सोच हमे हमारे संस्कारों से मिली है जो कि घर पर सिखाया जाता है कि माँ बहने काम करें और भाई कुछ नहीं तो इसके लिए लक्की जी ये संस्कार भी पुरुष प्रधान समाज से ही हमारी माँ और बहनों को मिले हैं क्योंकि उन माँ बहनों के ऊपर भी कोई परिवार है जो उन्हें ये सब करने के लिए विवश करता है! ये सब संस्कार हम इंसानों द्वारा बनाये गए हैं किसी ने इन्हें बना कर धरती पर नहीं भेजा ! भूल गए वो सब प्रथाएं सती प्रथा ,बहु विवाह प्रथा और भी ना जाने कितनी प्रथाएं जिन्हें आज हमारे जैसे ही किसी इंसान के संघर्ष के कारण बंद कर दिया गया !वरना वो भी हमारे रीती रिवाज़ ही कहलाती थीं !
दीपक कुमार पुष्पद
April 11, 2019 at 10:17 am
अच्छी बात है आपने औरतों के ऊपर अत्याचार के बारे में बात जो लिखी है मैं समझता हूं कि जो आपने लिखा है वह आपकी नजर में सब सही हो परंतु राम के चरित्र पर और सीता जी को हुए अन्याय की की बात को आपने इसमें इस प्रकार से बनाया है कि राम कोही आपने पूरा दोषी करार दे दिया है मैडम जी थोड़ा सा समझें हमारे प्राचीन ग्रंथों के स्टडी करें उनके अनुवाद को समझें और फिर अपना तर्क वितर्क इस प्रकार के लेख में लिखें क्योंकि जरूरी नहीं कि जो हम समझ रहे हैं वही सत्य है ग्रंथों के अंदर समझाया गए सत्य की मार्मिक समीक्षा करें और फिर अपनी समझ को इसमें सम्मिलित करें फिर देखें कहीं ना कहीं आप कुछ गलत कह रही हैं