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कल उसका गम भी मुझ तक पहुंचेगा

तहसीनहम सब एक हैं और एक से ही जुड़े हैं. वह एक जो है भी और नहीं भी है. वह हर जगह है और कहीं नहीं है. नज़र आता है और छुपा भी रहता है. रात भी है और दिन भी है. इधर भी है उधर भी, यहाँ भी है वहां भी, हर जगह है और कहीं भी नहीं है, जब हम सब एक से जुड़े हैं तो फिर एक दूसरे को पहचानते क्यों नहीं हैं? इसकी सिर्फ एक वजह है कि हम अंधे हो गए हैं और हमें अपने अलावा कुछ दिखता ही नहीं है. हमारा यह मानना है कि हम सब कुछ हैं और दूसरा कुछ नहीं हैं. यही दूसरे को तुच्‍छ समझने की ग़लती हमें उस एक की नज़रों में कुछ नहीं बनने देती है.

तहसीनहम सब एक हैं और एक से ही जुड़े हैं. वह एक जो है भी और नहीं भी है. वह हर जगह है और कहीं नहीं है. नज़र आता है और छुपा भी रहता है. रात भी है और दिन भी है. इधर भी है उधर भी, यहाँ भी है वहां भी, हर जगह है और कहीं भी नहीं है, जब हम सब एक से जुड़े हैं तो फिर एक दूसरे को पहचानते क्यों नहीं हैं? इसकी सिर्फ एक वजह है कि हम अंधे हो गए हैं और हमें अपने अलावा कुछ दिखता ही नहीं है. हमारा यह मानना है कि हम सब कुछ हैं और दूसरा कुछ नहीं हैं. यही दूसरे को तुच्‍छ समझने की ग़लती हमें उस एक की नज़रों में कुछ नहीं बनने देती है.

सच तो यह है कि हम एक दूसरे से इस प्रकार जुड़े हैं जैसे हमारे शरीर के अंग, एक इधर से उधर हुआ नहीं कि शरीर की पूरी इमारत में ज़लज़ला आ जाता है. यही कोहराम तब मचता है जब दुनिया में कहीं भी किसी भी ज़िन्दगी के साथ कुछ बुरा घटता है, लेकिन हम उसे अपनी नासमझी के कारण समझ नहीं पाते हैं. और इस नासमझी की वजह हमारी नासमझी नहीं है क्योंकि समझ तो माशाल्लाह हम में इतनी है कि अच्छे अच्छों की अक़ल ठिकाने लगा देते हैं, मगर वह समझ सिर्फ अपने इर्द गिर्द ही घूमती है. और जब सोच सिकुड़ जाती है तो फिर चिंतन कि शक्ति छीन लेती है. चिंतन गया तो चिंता के लिए रास्ते अपने आप खुल जाते हैं और चिंताएं भी कैसी कैसी ???

तरक्क़ी के इस दौर में चिंताओं का स्तर भी बढ़ गया है. बैंक की मासिक क़िस्तों से लेकर रिश्तों का बिखराव तक हर तरह की चिंता हमारा ओढ़ना  बिछौना हो जाती हैं. नई-नई बीमारियाँ तो एक तरफ, दूसरे की ख़ुशी भी हमें दुखी करने में पीछे नहीं रहती है. अगर ध्यान से देखें तो जीडीपी में अपनी प्रगति नापने वाला आज का इंसान भी उसी तरह घाटे में है जिस तरह उसके पहले के लोग थे. इतनी जान खपा के इतना सब कुछ बनाया और जब गए तो ऐसे कि किसी ने यह भी न सोचा की कफ़न में एक जेब ही लगा देते ताकि कमाया हुआ कुछ तो साथ ले जाते.

अभी अधिक दिन नहीं हुए हम पानी भी सीधे हैण्ड पम्प से पी लेते थे और क्या मीठा पानी होता था, मगर अब हम तरक्क़ी कर गए हैं इसलिए बोतल बंद पानी पीते हैं, वह भी ना जाने कितने बहानों से साफ़ किया हुआ. यह तरक्की की है हमने. कल तक हम चाँद की रोशनी में तनहा सफ़र करते थे. आज बिजली के सूरज रोशन हैं मगर जीवन का अँधेरा है कि ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा है और इंसान दर बदर भटकने पर मजबूर हो रहा है. यह भटकना उसकी मजबूरी नहीं है बल्कि उसका अपना चुनाव है.

जिस इंसान को रहने के लिए ज़मीन दी गयी थी वह आसमान में मंजिलें बना कर रहता है और बहुत गर्व के साथ ऊँगली से इशारा कर के कहता है कि वह हवा में 19वें फ्लोर पर उसका अपना घर है. नादान इतना भी नहीं जानता हवा में घर नहीं हवाई क़िले बनते हैं. अपने बड़े-बड़े घर आंगन छोड़ के छोटी-छोटी गुफाओं में रहता है आज का इंसान और उसे घर कहता है. अंधी दौड़ में  शामिल होने के बाद अब दौड़ते रहना ही हमारा नसीब हो गया है. हमारा रास्ता ऐसा है जिसमें, कहीं भी मील का पत्थर नहीं है. इस अंधी दौड़ में भाग लेकर हम यह भूल गए हैं कि हम एक हैं और एक दूसरे से मज़बूती के साथ जुड़े हैं. इसलिए कहीं दूर रोते हुए इंसान के आंसू अगर आज मेरा दामन नहीं भिगो रहे हैं तो कल उसका ग़म मुझ तक इस तरह पहुंचेगा कि मैं अकेला तनहा उसी ग़म से बोझल होकर चीखूंगा मगर मेरे साथ रोने वाला कोई नहीं होगा. अगर आज मैं किसी के ग़म पर खुश हो रहा हूँ तो कल कोई मेरे दुःख पर क़हक़हे ज़रूर लगाएगा.

हम जुड़े हैं एक दूसरे से तभी तो अफ्रीका के जंगल से चली कोई बीमारी हमें भी बीमार कर देती है. हम जुड़े हैं अच्छाइयों के साथ भी और बुराइयों के साथ भी. जब हम अच्छाइयों को बढ़ावा देते हैं तो अच्छाई मिलती है, जब बुराइयों को बढ़ाते हैं तो बुराइयाँ हमारी उँगलियाँ थाम कर घर तक चली आती है. मैं चाहे आलीशान फार्म हाउस में ही क्यों न रहूँ, अगर मेरे घर काम करने वाला इंसान बदतर ज़िन्दगी गुज़ार रहा है तो वह ज़िन्दगी मुझ तक ज़रूर पहुंचेगी. मैं बच गया तो मेरी औलाद को लपेटेगी, नहीं तो औलाद की औलाद को, इसलिए हम सबका जीवन एक सा होना चाहिए क्योंकि जो  हाथ चक्की का आटा पीस रहे हैं वह अगर गन्दगी से सने हैं तो मैं चाहे जितनी सफाई का ख्याल रख लूं मुझ तक उसका निवाला ज़रूर पहुंचेगा. और यह तब ही मुमकिन है जब हम सब अपने मन को साफ करना सीख लें. मिलकर खाएं. मिलकर रहें और एक से एक को पहचाने. हमें याद रखना है हम एक हैं और एक से जुड़े हैं. यही सच है और इसी को समझना ही सत्य की खोज है.

हम ने ख़ुद उसको भूला रखा है
वरना हर दिल में ख़ुदा रखा है.

लेखक तहसीन मुनव्‍वर बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. प‍त्रकारिता से लेकर लेखन तक के कई आयाम नापे हैं. पत्रकार हैं, एंकर हैं, शायर हैं, लेखक हैं, टीचर हैं, कवि हैं, गीतकार हैं, कहानीकार हैं यानी कई शख्सीयतों के संगम हैं. हिंदी, उर्दू, पंजाबी सहित कई भाषाओं के जानकार हैं. विज्ञापनों और जिंगल से लेकर फिल्‍मों, धारावाहिकों, रेडियो तथा टीवी के लिए लेखन कर चुके हैं. कश्‍मीर में इन्‍होंने दूरदर्शन के लिए उस समय रिपोर्टिंग और एंकरिंग की जब वादी गोलियों की तड़तड़ाहट एवं बमों के धमाकों से गूंजा करती थी. कई अखबारों और मैगजीनों में इनके स्‍तंभ छपते हैं. इंदौर में 2008 में निदा फाजली के साथ भरोसा सम्‍मान से सम्‍मानित तहसीन ने अपनी कविताओं की किताब ‘धूप चांदनी’ में जीवन के कई रंगों को उकेरा है. उनकी कहानी की किताब ‘मासूम’ को उर्दू अकादमी ने सम्‍मानित किया है. इसके अलावा भी वे कई सम्‍मानों से नवाजे जा चुके हैं. देश-विदेश में कवि सम्‍मेलनों और मुशायरों में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं. फिलहाल रेल मंत्रालय में मीडिया कंसलटेंट के रूप में कार्य कर रहे हैं. उनका यह लेख  ”दुनिया इन दिनों” से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

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