मित्रों, ख़ुशी की बात है कि आईजेयू (इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष सुरेश प्रसाद अखौरी की शर्मनाक कानूनी हार हो गई है. आईजेयू पर आजीवन कब्ज़ा बनाये रखने का उनका दिन में देखा गया सपना, अंततः टूट ही गया. एक सुन्दर सपना अखौरी साहब का टूट गया.
अपने स्वार्थ के लिए – उनके आजीवन अध्यक्ष पद पर बने रहने की नीयत से यूनियन को गुटीय आधार पर तोड़ने की श्री अखौरी की साजिश को सिविल कोर्ट-१, दिल्ली डिस्ट्रिक्ट जज, जस्टिस जय थरेजा और आंध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी जिले के प्रिंसिपल सिविल जज तदेपल्लिगुदेम के माननीय न्यायाधीशों- के न्याय निर्णयों ने अखौरी साहब के सपनों का किला ध्वस्त कर दिया.
श्री अखौरी जी महाराज के कारनामों ने हमारे बिहार श्रमजीवी पत्रकार संघ में भी जहर घोल दिया था. हमलोग इस मामले में खुशकिस्मत रहे कि हमने अपने यूनियन में इस जहर को ज्यादा प्रभावी नहीं होने दिया. इसलिए कि हमने चीज़ों को ज्यादा तूल नहीं दिया और सीधे संघर्ष से बचते- बचाते रहे. क्योंकि हम भीचाहते थे कि कोई न्याय-निर्णय आ जाये और कानूनी स्थिति स्पष्ट हो जाये ताकि बीडब्ल्यूजेयू में आम सदस्यों को इस सन्दर्भ में किसी फैसले पर पहुँचने में किसी तरह का कोई भ्रम नहीं बना रहे.
जैसा कि मैंने आपको अपने पहले खुले पत्र में लिखा था कि किस प्रकार माननीय अखौरी साहेब ने आईजेयू को अपनी जागीर बनाये रखने के लिए कितने गैर-कानूनी कुकर्म कर रखे थे. इन्हों ने एसएमएस के जरिये ही आईजेयू की दो बड़ी राज्य इकाइयों – तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश – को असम्बद्ध घोषित कर दिया. जबकि आईजेयू के संविधान में किसी भी प्रिंसिपल ऑफिस-बिअरर को इस तरह का कोई अधिकार नहीं दिया गया है. यह सब महज इसलिए कि जिन राज्य इकाइयों की विशाल सदस्य संख्या के आधार पर श्री अखौरी जब तक अध्यक्ष बने रहे अपने को सबसे बड़े यूनियन का प्रतिनिधि बता कर वेज बोर्ड, प्रेस कौंसिल और अन्य कमिटियों का सदस्य बन कर मजे लेते रहे, उन्हीं राज्य इकाइयों से नेतृत्व परिवर्तन की आवाजें उठने लगी थीं. ऐसी हालत में यूनियन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति में अपने को अल्पमत में पाकर उन्होंने राज्य इकाइयों में अपना बहुमत स्थापित करना चाहा. इसके लिए तमाम ऐसी राज्य इकाइयों को असम्बद्ध करना जरुरी था, जो नेतृत्व परिवर्तन के पक्ष में खड़े थे. संयोग से सर्वाधिक सदस्य संख्या वाली दो राज्य इकाइयाँ आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु नेतृत्व परिवर्तन के पक्ष में खड़े थे. इतना ही नहीं पूर्व सेक्रेटरी जनरल के. श्रीनिवास रेड्डी ने अपनी ओर से ना सिर्फ पद छोड़ने की घोषणा कर रखी थी बल्कि वे नेतृत्व परिवर्तन के लिए आम राय बनाने में लगे थे. चेन्नई और हैदराबाद में लगातार बैठकें आयोजित की गयी. जिसमे बिहार से बीडब्ल्यूजेयू की तरफ से राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य की हैसियत से मैं अरुण कुमार और सिवान के अशगर साहब लगातार जाते रहे.
हम दोनों की समझ इस मामले में साफ़ थी कि हमें आइजेयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में चुना गया है ना कि किसी निजी नेता की चाकरी के लिए बीडब्ल्यूजेयू के सदस्यों ने हमें वहां भेजा है. हम यह देख रहे थे कि आईजेयू संविधान में वह सब हक किसी प्रेसिडेंट या सेक्रेटरी जनरल को नहीं दिया गया है. नीतिगत फैसले राष्ट्रीय कार्यकारिणी कर सकती है मगर जहाँ तक राज्य इकाइयों को असम्बद्ध करने का अधिकार है वह जनरल बॉडी को प्राप्त है. अखौरी जी महाराज ने तो यहाँ तक कर दिया कि एक समय उन्होंने सेक्रेटरी जनरल को ही निकालने की घोषणा कर दी. यह सब कोई पागल या मानसिक रूप से असंतुलित प्राणी ही कर सकता है.
शायद लगातार १८ सालों से राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहने के बाद उनको इसकी आदत सी लग चुकी थी और इसके बिना रहने की कल्पना मात्र से ही उनकी स्थिति जल बिन मछली की तरह तड़पती हुई सी हो जाती थी और वे उल्टा-पुल्टा कर डालते थे. इसी मनःस्थिति में उन्होंने सारी गैर-कानूनी हरकतें कर डालीं. मालूम हो कि माननीय पूर्व अध्यक्ष अखौरी जी ने स्वयं ही नई दिल्ली डिस्ट्रिक्ट के सिविल जज १ के कोर्ट में आर्डर ३९ और कोड ऑफ़ सिविल प्रोसिदियोर रुल १ और २ के तहत सेक्रेटरी जनरल के. श्रीनिवास रेड्डी और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कामरेड डी.एस.रवीन्द्र दोस के आईजेयू के सेक्रेटरी जनरल और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के तौर पर काम करने और आंध्र प्रदेश यूनियन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स तथा तमिलनाडु यूनियन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के प्रतिनिधियों को आईजेयू से संबद्ध होने के दावे को चुनौती दी थी.
मगर दिल्ली के कोर्ट ने उनके ही द्वारा दायर केस में न्याय निर्णय देते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि अखौरी जी महाराज को बतौर आईजेयू अध्यक्ष किसी भी ऑफिस बिअरर को हटाने या किसी भी राज्य इकाई को असम्बद्ध करने का क़ानूनी हक़ नहीं था, क्योंकि यूनियन के संविधान में यह हक़ सिर्फ प्लेनरी सेसन को ही है. न्याय निर्णय में यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी को ही किसी को लिखित चार्जशीट का अधिकार आईजेयू संविधान की धारा ६३ और ३४ के तहत प्राप्त है. यह अधिकार किसी एक प्रिंसिपल ऑफिस-बिअरर को प्राप्त नहीं है. यानि कि मियां की जूती मियां के सर लगी. माननीय अखौरी जी महाराज तो गए थे अधिकार मांगने मगर वहीँ से उनको अपनी औकात बता दी गई. बेऔकाती काम करने का यही नतीजा होना ही था. चौबे गए छब्बे बनने दुबे बन कर आये.
उधर माननीय अखौरी जी की हरकतों से – आंध्र प्रदेश इकाई के असम्बद्ध किये जाने से – त्रस्त होकर आंध्र प्रदेश इकाई के एक सदस्य वी सुब्बाराव पस्चुइम गोदावरी जिले के एक कोर्ट में पहुँच गए न्याय मांगने. वहां से सुब्बा राव जी को तो न्याय मिल गया. उस कोर्ट ने भी साफ साफ न्याय निर्णय में लिखा कि श्री अखौरी जी को यह अधिकार प्राप्त नहीं था. यह न्याय निर्णय १ अगस्त २०११ को पारित किया गया. कोर्ट ने अखौरी जी के खिलाफ परमानेंट इन्जन्क्सन भी दे दिया और उनको आईजेयू के बैनर के इस्तेमाल पर भी स्थायी रोक लगाने का न्याय-निर्णय दिया.
आज की तारीख में स्थिति स्पष्ट हो गयी है कि अखौरी जी अब ना तो हमारे आईजेयू के अध्यक्ष रहे और ना ही उनको आईजेयू के बैनर के इस्तेमाल करने का अधिकार रह गया है. ऐसी स्थिति में हमारे वैसे सदस्यों को जो अब तक किसी दुविधा में रहे हों निर्णय लेने में आसानी होगी कि स्वनामधन्य अखौरी जी महाराज का अब आईजेयू से किसी भी तरह का कोई संबंध नहीं है. अब वे अपनी एक अलग यूनियन चला रहे हैं, जिसके साथ बीडब्ल्यूजेयू (बिहार वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन – बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन) का कोई सम्बन्ध नहीं है.
आशा है कि अब बीडब्ल्यूजेयू के साथियों के समक्ष सारी कानूनी स्थिति स्पष्ट हो गयी है. मेरी आपसे यही गुजारिश है कि आप किसी तरह कि ग़लतफ़हमी के शिकार नहीं होंगे और अफवाहों पर ध्यान नहीं देंगे. इसी आशा और विश्वास के साथ नमस्कार.
साभिवादन
अरुण कुमार
महासचिव
बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन
दक्षिणी मंदिरी, विद्यापति मार्ग
पटना-८००००१
मोबाइल : ९४३०६१९५०८












sivendra narayan singh
August 29, 2011 at 7:20 am
mai bhi bihar sarmjivi patrkar union ko 2 bar adhyakas raha.akhauri jee patrkar union ko apni jagir samagh baithai thai] asal mai patrkaro ka kalyan karnai ki jagah unhonai ish sanstha kai madhyam sai apni kamai ka jariya bana rakha tha .unki bidai sai pura patrkar biradari ko khusi huee hai .bhi arun ji ka khula patra asal mai sarmjivi patrkaro ka khula patra hai .mai bhi arun kumar jee kai bicharo sai sahmat hu.
anupnarayan singh
August 29, 2011 at 7:31 am
arun sir apnai akhauri ji ko unki asliyat sai rubaru karakar kalam sai hi sahi jam kar latiyaya hai jai ho
anupnarayan singh
August 29, 2011 at 11:36 am
aab sab pawetra ho njayaga
aazad rajeev
August 29, 2011 at 2:24 pm
der se hi sahi,sahi phaisala aaya hai…