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कानाफूसी

क्या पीपुल्स समाचार के कई ब्यूरो बंद होने वाले हैं?

पीपुल्स समाचार को लेकर एक अफवाह बहुत तेज फैल रही है कि प्रबंधन ने इंदौर यूनिट से जुड़े सभी 13 ब्यूरो को बंद करने का फैसला कर लिया है. यह फरमान ब्यूरो चीफों के कानों में भी पहुंच गया है और उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि वे दूसरे अखबार छोड़कर पीपुल्स में आए तो अब पीपुल्स प्रबंधन उनका भविष्य अंधेरे में क्यों धकेल रहा है. अगर पीपुल्स प्रबंधन में होने वाली खुसुर-पुसर पर भरोसा करें तो यह सब हो रहा है पीपुल्स समाचार में कार्यरत एक वरिष्ठ पत्रकार की सलाह पर.

पीपुल्स समाचार को लेकर एक अफवाह बहुत तेज फैल रही है कि प्रबंधन ने इंदौर यूनिट से जुड़े सभी 13 ब्यूरो को बंद करने का फैसला कर लिया है. यह फरमान ब्यूरो चीफों के कानों में भी पहुंच गया है और उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि वे दूसरे अखबार छोड़कर पीपुल्स में आए तो अब पीपुल्स प्रबंधन उनका भविष्य अंधेरे में क्यों धकेल रहा है. अगर पीपुल्स प्रबंधन में होने वाली खुसुर-पुसर पर भरोसा करें तो यह सब हो रहा है पीपुल्स समाचार में कार्यरत एक वरिष्ठ पत्रकार की सलाह पर.

पीपुल्स समाचार के इंदौर के कई ब्यूरो तो ऐसे हैं, जिनका मासिक खर्चा एक-सवा लाख है. स्वनामधन्य वरिष्ठ पत्रकार महोदय ने प्रबंधन को सलाह दी है कि ब्यूरो संस्थान के लिए सफेद हाथी बनते जा रहे हैं. (वैसे स्वनामधन्य वरिष्ठ पत्रकार भी संस्थान के लिए सफेद हाथी से कम नहीं हैं). खर्चा ज्यादा हो रहा है. ब्यूरो ज्यादा विज्ञापन दे नहीं पा रहे हैं, इसलिए क्यों ने ब्यूरो को बंद कर दिया जाए. अखबार खोलकर गलत धंधे में आने की सोच-सोचकर पसीना-पसीना हो रहे प्रबंधन को फोकट की यह सलाह तुरंत ही समझ में आ गई और फरमान जारी हो गया पीपुल्स के ब्यूरो बंद करने का. इंदौर एडीशन से जुड़े ब्यूरो के लोगों तक यह फरमान पहुंच चुका है और वे दुखी मन से नई नौकरी तलाश करने में जुट गए हैं. पीपुल्स समाचार के ब्यूरो बंद करने की शुरुआत इंदौर से हुई है. इसके बाद ग्वालियर-भोपाल और जबलपुर के ब्यूरो ब्यूरो पर ताले लटकाए जाएंगे.

कानाफूसी कैटगरी की खबरें चर्चाओं और अफवाहों पर आधारित होती हैं. इन खबरों पर भरोसा करने से पहले अपने स्तर पर जांच-पड़ताल जरूर कर लें और कुछ हाथ लगे तो हमें भी बताएं, नीचे कमेंट बाक्स में कमेंट करके.

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0 Comments

  1. ajay

    April 1, 2011 at 3:50 pm

    110 parcent sahi khabar hai yha. yaswant jee lage hath SAFED HATHI ka nam bhe awadesh bajaj bata dete to kya bigad jata. ham sab buero wale pareshen hai. bajaj ab hamari nookre khane par tula hai. pahele bhe yah kai logo ke nookre kha chuka hai. daftar me bhadas par ban lagwa dia hai taki iske kartoot malik na pad sake. ise aise lag chaiye jo ise bottel me doobta dhake aur kahe wha sahab aap kitna badia tarte hai. yahi bho shaks hai jisne peoples ke pakad peoples tak nahi hane de. moti sailry pata hai. peoples ke gadi me ghoomta hai. peoples ke hospital me illag karata hai aur hum jaise small sailry walo ke nookri kha raha hai.

  2. एक खबरी

    April 2, 2011 at 2:16 pm

    श्रीमान संपादक जी,
    नमस्‍कार

    आपकी वेबसाइट पर 1 अप्रेल को क्या पीपुल्स समाचार के कई ब्यूरो बंद होने वाले हैं? खबर पड़ी। पीपुल्‍स समाचार के बारे में सागर ब्‍यूरो की एक खबर आपको बताना चाहता हूं… इससे यह पता चलता है कि उक्‍त समाचारपत्र का प्रबंधन किस अमानवीय तरीके से काम करता है। कुछ पत्रकार साथियों से यह जानकारी मिली है और सभी तथ्‍य एकदम पुख्‍ता हैं। कृपया नीचे दिया गया समाचार अपने स्‍तर पर ही प्रकाशित करें। यह मेल सिर्फ सूचनार्थ है। धन्‍यवाद।

    घटनाक्रम इस प्रकार है

    पीपुल्‍स समाचार के सागर ब्‍यूरो में पिछले करीब छह महीने से रिपोर्टर के रूप में काम कर रहे शहर के सीनियर पत्रकार संजय करीर ने गत माह कंपनी से 10 दिन की पैटर्निटी लीव की मांग की तो उन्‍हें नौकरी से निकाल दिया गया। उनकी पत्‍नी अस्‍पताल में भर्ती थीं और उन्‍हें फोन कर कहा गया कि वे या तो काम पर पहंचे या उन्‍हें हटा दिया जाएगा। करीर ने काम पर आने में असमर्थता जताई तो उन्‍हें बिना कोई नोटिस दिए बाहर का रास्‍ता दिखा दिया गया।

    पीपुल्‍स समाचार का सागर ब्‍यूरो कार्यालय पिछले साल सितंबर में बंद होने के कगार पर पहुंच गया था। नवदुनिया से निकाले गए विज्ञापन प्रतिनिधि त्रिभुवन तिवारी इसके ब्‍यूरो चीफ हैं। पिछले वर्ष तिवारी के खिलाफ उनके रिपोर्टरों ने ही विद्रोह कर दिया था लेकिन बाद में वे किसी तरह खुद को बचाने में कामयाब हो गए और दोनों रिपोर्टरों को बाहर का रास्‍ता दिखा दिया।

    बताया गया है कि उस समय सागर ब्‍यूरो बंद होने के कगार पर पहुंच गया था तब त्रिभुवन तिवारी ने शहर के एक वरिष्‍ठ पत्रकार की मदद से संजय करीर को बेहद मामूली वेतन पर अपने यहां काम करने पर राजी करा लिया था। जैसे ही स्थिति सुधरी पहली फुर्सत में संजय करीर को बाहर का रास्‍ता दिखा दिया गया।

    एक और तथ्‍य का उल्‍लेख करना उचित होगा कि संजय करीर करीब 20 साल से सक्रिय पत्रकारिता से जुड़े है। इससे पहले वे सागर में भास्‍कर के मुलाजिम थे। दो वर्ष पूर्व वे सिटी डैस्‍क के प्रभारी के रूप में काम कर रहे थे। भास्‍कर के संपादक नरेंद्र सिंह अकेला ने सागर आते ही सीनियरों को निशाना बनाना शुरू कर दिया था और तब संजय करीर उनके पहले शिकार बने थे। उन्‍होंने अकेला के दुर्व्‍यवहार के कारण इस्‍तीफा दिया था।

    वे इससे पूर्व राजस्‍थान में भास्‍कर के उदयपुर संस्‍करण में भी सेंट्रल डेस्‍क के प्रभारी के रूप में काम कर चुके हैं। इसके बावजूद पीपुल्‍स समाचार ने अमानवीयता का प्रदर्शन करते हुए एक सीनियर पत्रकार को उस वक्‍त काम से निकाल दिया जब उन्‍हें अपने पारिवारिक उत्तरदायित्‍वों का निर्वहन करना था।

    धन्‍यवाद।

  3. ek khabri

    April 22, 2011 at 3:45 pm

    peoples kahi band hone bala nahi hai. itna jarur hai ki afbahon ne nikale gaye aur comptitors ko nakli khusi jarur di. management ke against chalne walo kahi thour tumko mil nahi sakta. peoples group agar loss kam karne ki neeti par kam kar raha hai to aisa karna uska adhikar hai. khusi manane valo ne anpi isi tarah ki soch ke chalte carrier ko choupat kiya aur nikale jane ki jhuthi shikayten karte thakte nahi. peoples to badega hi . shikayatilalo ki fouj bhi apna kam karegi

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