
असीमा भट्ट
और समाज सेवा में सच्चे दिल और पूरी ईमानदारी से जुट गए। कभी अपनी सुख सुविधा का खयाल नहीं किया। सालों जेल में गुजारा। लालू यादव से लेकर नीतिश कुमार और जार्ज फर्नांडिस तक उन्हें गुरुदेव कहकर संबोधित करते थे। सारे कामरेड के वह आईडियल थे। आज वह इनसान कहां है? क्या किसी भी नेता को या आम जनता को जिनके लिए लगातार वो लड़े और फकीरों की तरह जीवन जिया, सुरेश भट्ट की कोई खैर-खबर है? उन्होंने कभी सत्ता का लोभ नहीं किया। वो कहते थे –हम सरकार बनाते हैं, सरकार में शामिल नहीं होते। बहुत कम लोग इस बात पर यकीन करेंगे कि सुरेश भट्ट का कोई बैंक एकाउंट कभी नहीं रहा।
जेब में एक रुपया भी रहता था तो वो लोगों की मदद करने के लिए तत्पर रहते थे। और लोगों को वो रुपया दे देते थे। कभी उन्होंने अपने बच्चों की परवाह नहीं की। हमेशा कहा करते थे– सारे हिंदुस्तान का बच्चा मेरे बच्चे जैसा है। जिस दिन सारे हिंदुस्तानी बच्चे का पेट भरा होगा उस दिन मुझे शांति मिलेगी। लाल सलाम का झंडा उठाये रहे पूरे जीवन भर। अपने आप को और अपने स्वास्थ्य को इगनोर किया। अपने प्रति हमेशा ही लापरवाह रहे और घुमक्कड़ी करते हुए जिये। आज वो इनसान दिल्ली के ओल्ड एज होम में गुमनाम जिंदगी जी रहा है। छह साल पहले उनका ब्रेन हेमरेज हुआ था। तब से वे अस्वस्थ हैं। अब दुनिया के सामने एक सवाल है। ऐसे लोगो का क्या यही हश्र होना चाहिए जो दुनिया के लिए जिये, और आज दुनिया उन्हीं से बेखबर है।

अपने पिता सुरेश भट्ट के साथ असीमा भट्ट.
पिता
शाम काफी हो चुकी है
पर अंधेरा नहीं हुआ है अभी
हमारे शहर में तो इस वक्त
रात का सा माहौल होता है।
छोटे शहरों में शाम जल्दी घिर आती है
बड़े शहरों के बनिस्बत लोग घरों में
जल्दी लौट आते हैं
जैसे पंछी अपने घोंसलों में।
यह क्या है/ जो मैं लिख रही हूं।
शाम या रात के बारे में
जबकि पढऩे बैठी थी नाजिम हिकमत को
कि अचानक याद आए मुझे मेरे पिता।
आज वर्षों बाद
कुछ समय/ उनका साथ मिला
अक्सर हम हमने बड़े हो जाते हैं कि
पिता कहीं दूर छूट जाते हैं।
पिता के मेरे साथ होने से ही
वह क्षण महान हो जाता है।
याद आता है मुझे मेरा बचपन
मैक्सिम गोर्की के मेरा बचपन की तरह
याद आते हैं मेरे पिता
और उनके साथ जीये हुए लम्हें।
हालांकि उनका साथ उतना ही मिला
जितना कि सपने में मिलते हैं
कभी कभार खूबसूरत पल।
उन्हें ज्यादातर मैंने
जेल में ही देखा
अन्य क्रांतिकारियों की तरह
मेरे पिता ने भी मुझसे सलाखों के
उस पार से ही किया प्यार।
उनसे मिलते हुए
पहले याद आती है जेल
फिर उसके पीछे लोहे की दीवार
उसके पीछे से पिता का मुस्कुराता
हुआ चेहरा।
वे दिन-जब मैं बच्ची थी
उनके पीछे-पीछे/ लगभग दौड़ती।
जब मैं थक जाती
थाम लेती थी पिता की उंगलियां
उनके व्यक्तित्व में मैं ढली
उनसे मैंने चलना सीखा
चीते ही तरह तेज चाल
आज वे मेरे साथ चल रहे हैं,
साठ पार कर चुके मेरे पिता
कई बार मुझसे पीछे छूट जाते हैं।
क्या यह वही पिता है मेरा… साहसी
फुर्तीला।
सोचते हुए मैं एकदम रूक जाती हूं
क्या मेरे पिता बूढ़े हो रहे है?
आखिर पिता बूढ़े क्यों हो जाते हैं?
पिता। तुम्हें बूढ़ा नहीं होना चाहिए
ताकि दुनिया भर की सारी बेटियां
अपने पिता के साथ/ दौडऩा सीख सके
दुनिया भर में…
लेखिका असीमा भट्ट मुंबई में अभिनय क्षेत्र में सक्रिय हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है. अपने ब्लाग पर असीमा अपना परिचय कुछ इस अंदाज़ में देती हैं- ”मैं कौन हूं. मैं असीमा हूं. इस सवाल की तलाश में तो बड़े बड़े भटकते फिरते हैं। फिर चाहे वो बुल्लेशाह हों-बुल्ला कि जाना मैं कौन..या गालिब हों-डुबोया मुझको होने ने, ना होता मैं तो क्या होता.. सो इसी तलाश में हूं मैं. मुझे सचमुच नहीं पता कि मैं क्या हूं। बड़ी शिद्दत से यह जानने की कोशिश कर रही हूं. वैसे कभी कभी लगता है, मैं मीर, फैज और गालिब की माशूका हूं तो कभी लगता है कि निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो की सुहागन हूं.. शायद लोगो को लग रहा होगा कि पागल हूं. होश में नहीं हूं. मुझे ये पगली शब्द बहुत पसंद है.. कुछ कुछ दीवानी सी.”












manish sharma
May 11, 2011 at 12:39 pm
अक्सर हम हमने बड़े हो जाते हैं कि
पिता कहीं दूर छूट जाते हैं।
Girish Mishra
May 9, 2011 at 3:06 pm
Very touching story. Bhatt was a leader of the agitation against 1955 police firing against students in Patna. He led the agitation in Nawada which was fired at by the police. He was arrested and put behind the bars. During those days, he came to be known as a fire-brand student leader throughout the state. After that I happened to meet him by chance a few times and found that, in spite of advancing age, his enthusiasm had not declined. Sad to learn of his present plight.
Manoj Sharaff
May 9, 2011 at 7:09 pm
yahi hindustan ki sachchai hai.. yaha ke log dare huye hai.. isiliye is desh me badlao ki hawa nahi chal rahi hai… bas log kide-makodo ki tarah jiye ja rahe hai…. apke papa ke jald achchhe ki shubhkamna ke sath… Manoj, Mumbai
श्रवण शुक्ल
May 13, 2011 at 7:58 am
aseema ke blog ka pata dete to behtar h9ota.. yeh kadwi sachhi hai.. log kaam nikal jane ke baad kisi jko nahi poochte.. chahe wo kalaam hi kyu na ho