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दुख-दर्द

क्‍या पद, पैसे और ताकत बिना नहीं मिलेगा न्‍याय?

: न्‍याय के लिए दर-दर भटक रही है एक महिला : डीआईजी ने एक आईएएस अधिकारी का दबाव बताते हुए मदद से किया इनकार :धिक्कार है कानून के ऐसे राज पर। थू-थू करती हूँ यूपी पुलिस विभाग के आला अफसरों के मुंह पर। दलित और महिला दो गुणों से सम्पन्न मायावाती के मुख्यमंत्री बनने के बावजूद प्रदेश की आम महिलाओं के साथ सरकार की नाक के नीचे राजधानी लखनऊ में जब जनसेवकों, लोक सेवकों की यह करतूतें हैं तो अन्य जगहों पर क्या हो रहा होगा कल्पना करके दिल कांप उठता है।

: न्‍याय के लिए दर-दर भटक रही है एक महिला : डीआईजी ने एक आईएएस अधिकारी का दबाव बताते हुए मदद से किया इनकार :धिक्कार है कानून के ऐसे राज पर। थू-थू करती हूँ यूपी पुलिस विभाग के आला अफसरों के मुंह पर। दलित और महिला दो गुणों से सम्पन्न मायावाती के मुख्यमंत्री बनने के बावजूद प्रदेश की आम महिलाओं के साथ सरकार की नाक के नीचे राजधानी लखनऊ में जब जनसेवकों, लोक सेवकों की यह करतूतें हैं तो अन्य जगहों पर क्या हो रहा होगा कल्पना करके दिल कांप उठता है।

दिनांक 12.11.10 आरोपी मेरे पति निखिल वैश्य, चचेरे ससुर डॉ. सुनील कुमार (सचिवालय में नियुक्ति विभाग में अण्डर सेक्रेटरी के पद पर कार्यरत) व चचिया सास श्रीमती अनीता गुप्ता (जीवनधारा इण्टर कालेज में अध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं) के विरूद्ध न्यायालय द्वारा गैर-जमानती वारण्ट संबधित थाना क्षेत्र गुडम्बा को आरोपियों को तत्काल गिरफ्तार करने के लिए निर्देशित किया गया था।

दिनांक 12.11.10 को ही लगभग-12 बजे सुबह मुझे बाइक सवार हो बदमाशों ने रास्ते में रोककर मुकदमा वापस लेने के लिए धमकी देते हुए कहा कि अभी भी वक्त है केस वापस ले लो नही तो ऊपर पहुँचा देंगे, मैं किसी तरह जान बचाकर कचहरी पहुंची।

शाम को मेरे मोबाइल पर फिर काल आई, जिसमें मुझे जान से मारने की धमकी दी गयी. तब मैंने विवश होकर डीआईजी/एसएसपी लखनऊ को उनके मोबाइल पर फोन करके प्रार्थना की कि मेरी जान खतरे में है, आरोपी यदि अब भी गिरफ्तार नही हुए तो मेरी जान जा सकती है। एक जिम्मेदार आला पुलिस अधिकारी का जबाब सुनकर मेरे होश उड़ गये. डीआईजी ने कहा मेरे ऊपर शासन से एक ब्यूरोक्रेट का दबाव है, मैं इस केस में आपकी कोई मदद नहीं कर सकता।

एक जिम्मेदार पुलिस अधिकारी, जिस पर कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए भरोसा किया जाता है और अंतिम आस को लेकर न्याय की अपेक्षा हेतु गुहार लगायी जाती हो, किन्तु शासन के दबाव के चलते जब वो ही पुलिस नपुंसक बन जाय तो पीड़ित के पास मरने के अलावा और कोई रास्ता नही बचता. मैं भी इन परिस्थितियों में जीने की आस खो चुकी हूँ, अतः अपनी जीवन लीला को समाप्त करने के लिए मैं उसी आला अफसर के आवास के सामने गई कि इस जगह मौत को गले लगाने पर शायद बहरे-गूंगे शासन को महिला उत्पीड़न की भनक सुनाई दे सके. मेरे इस बलिदान से मेरी जैसी अन्य बहनें शायद सुरक्षित जीवन व्यतीत कर सकें. हजरंतगंज के पुरूष पुलिस मुझे जबरन पकड़कर महिला थाने ले आये और आश्वासन देते हुए मुझे बलिदान करने से रोक दिया गया।

यह ताजी घटना तो एक बानगी भर है मेरी शादी वर्ष 2007 में हुई थी, तब से लेकर आज तक जो यातनाए-प्रताड़ना व कई बार सीधे मौत से साक्षात्कार की घटनाएं मेरे जीवन में घटित हुई है वह इस प्रकार है।

1. ससुराल में पहले ही दिन मुझे दहेज के लिए प्रताडि़त किया गया।

2. 12 मई 2007 को मेरा बर्थडे था, उस दिन भी मुझसे दो लाख रूपये की मांग की गयी, तुरन्त पैसे का इंतजाम न हो पाने के कारण मुझे मेरे मायके पर ही छोड़कर चले गये. जब दूसरे दिन पैसे का इंतजाम हुआ तब जाकर मेरी विदाई हो पाई।

3. मई माह 2007 नैनीताल यात्रा के दौरान नैनीताल में डुबाकार मार डालने की कोशिश की गई।

4. जून 2007 को खाने में जहर मिला कर जान से मारने की कोशिश की गई।

5. जुलाई 2007: तीसरी मंजिल से धक्का देकार गिराने की कोशिश की गई।

6. करवाचौथ के अवसर पर अपने गहनें मांगने पर मेरी बहुत बुरी तरीके से पिटाई की गई।

7. दीवाली के बाद भाडे़ के गुण्डों से मुझे अपमानित कराया गया व ट्रक के आगे ढकेल कर जान से मारने का प्रयास किया गया।

इसके बाद भी कई बार मुझे जान से मरवाने का असफल प्रयास किया जाता रहा, अन्ततः मेरा धैर्य जबाव दे गया और मैंने पुलिस अधीक्षक (महिला प्रकोष्ठ) को न्याय दिलाने हेतु सम्पर्क किया किन्तु न्याय नहीं मिल सका।

उसके बाद मैंने राज्य महिला आयोग से गुहार लगायी. मेरे चचिया ससुर डॉ. सुनील कुमार की पहुंच के कारण मेरी फाइल दो बार गायब करवा दी गयी. मेरे गुहार लगाने के बाद ये लोग मुझसे और चिढ़ गये और प्रताड़ना का दौर और तेज हो गया।

विवश होकर मुझे सन 2008 में उपरोक्त तीनों लोगों के विरूद्ध एफआईआर गुडम्बा थाने में लिखवानी पडी़. मेरे चचिया ससुर की पहुँच के कारण थाने में भी मेरे साथ अन्याय ही किया गया और औपचारिकता के तौर पर हल्की धाराओं में केस दर्ज कर दिया गया. इसके लिए उस वक्त भी मैंने सभी संबंधित अधिकारियों के दरवाजे खटखटाएं किन्तु कोई न्याय नहीं मिल सका।

पुलिस प्रशासन द्वारा विरोधियों के आगे घुटने टेकने के कारण मुझे न्यायालय की शरण लेनी पड़ी और मैंने 2009 में तीनों आरोपियों के खिलाफ न्याय दिलाने की अर्जी दी। न्यायालय में आरोपियों के खिलाफ सम्मन जारी हुआ किन्तु आरोपी कानून को मुंह चिढ़ाते हुए हाजिर नही हुए।

न्यायालय द्वारा आरोपी पति निखिल वैश्य, चचेरे ससुर डॉ. सुनील कुमार व चचिया सास श्रीमती अनीता गुप्ता के विरुद्ध गैर जमानती वारंट जारी कर थाना गुडम्बा को गिरफ्तारी सुनिश्चित करने को निर्देशित किया गया किन्तु डीआईजी साहब ने ऊपर के दबाव के चलते न्यायलय के आदेश का पालन करने में असमर्थता जतायी।

मैं सुनकर भौचक्क रह गयी कि डीआईजी जैसा अधिकारी अगर उपरोक्त बात कह सकता है तो क्या होगा मानव अधिकारों का और क्या होगा इस सिस्टम का, मैं नहीं समझ पा रही। मुझे बहुत पहले से लगने लगा है कि ईमानदार बनकर जीते रहने के आप्‍शन बहुत कम रह गये है या तो भ्रष्टाचार के खेल में शामिल होकर पैसा वाला हो जाया जाये और पैसे के बल पर न्याय से लेकर पुलिस तक सबको खरीद लिया जाये। ऐसा करना मंजूर न हो तो दूसरा रास्ता बचता है समाज विरोधी क्रिया कलापों में शामिल होकर हिंसक तरीके से खुद ही सजा दी जाये, परन्तु अच्छे संस्कार व अच्छे परिवार के होने के कारण मेरे अन्दर यह क्षमता नहीं, ऐसे में मान लिया जाये कि हम बिना पैसे, बिना पद और बिना ताकत वाले लोग भ्रष्ट तंत्र से अपमानित होते रहने को अभिशप्त हैं।

अतः मैं आज मीडिया के सामने अपनी बीती सुनने के लिए उपस्थित हूँ और आशा करती हूँ कि शायद इस अबला नारी को न्याय मिल सके। यदि इसके बाद भी न्याय नही मिला तो विरोधियों के हाथों मरने से अच्छा है कि मैं आमरण अनशन पर बैठकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दूंगी, मेरे इस बलिदान से शायद मेरी जैसी पीड़ित लाखों बहनों की जिन्दगी सुरक्षित बन सकें।

डा. रिचा

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0 Comments

  1. dhanish sharma

    November 17, 2010 at 7:22 am

    milaga lakin 40 saal sa 50 saal tak intjaar ka baad.

  2. yashovardhan nayak tikamgarh.

    November 17, 2010 at 3:33 pm

    यशवंत जी , टीकमगढ़ जिला अदालत परिसर में भटकती हीराबाई नाम की औरत अपने दो बच्चो को साथ लिए मुझसे पूछती है, की मुझे धोखा देने वाले वकील को कब सजा मिलेगी बाबू जी ? हीराबाई के सवाल का जबाब किसके पास है ? उसका पति वाहन दुर्घटना में मर गया था .बेईमान वकील ने उसको मिलने वाली मुआवजे की रकम हडपने के लिए हीराबाई की जगह मालतीबाई नाम की महिला को हीराबाई बनाकर अदालत में पेश कर दिया था ,सात अक्तूबर 2006 को यह घटना घटी थी .अतिरिक्त जिला न्यायाधीश पी.सी.अहिरवाल ने मामला पकड़ में आने पर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी को निर्देशित कर जाँच कराई,चार अगस्त 2007 को आरोपी वकील के खिलाफ 1183 / 2007 क्रमांक पर धारा 419 / 420 के तहत क्रिमिनल केस रजिस्टर्ड कर लिया गया . तब से ले कर आज इस मामले में तारीख पर तारीख लगती है .अभी नौ नबम्बर 2010 को एक बार फिर मामले की नई तारीख मुक़र्रर की गई ,अब यह मामला चौदह दिसम्बर 2010 को प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी विवेक पाठक के न्यायालय में सुनवाई हेतु लगा है.इस मामले में दुखद पहलु यह है ,की हीराबाई बेहद गरीब और कम पढ़ी-लिखी है.मामले में पुख्ता दस्तावेजी साक्ष्य है.जिस दिन फैसला होगा आरोपी वकील बच नहीं पाएगा ,इसलिए वह कानून की कमजोरियों का फायदा उठाकर हर पेशी पर तारीख बढ़वा देता है?

  3. Rizwan Mustafa

    November 22, 2010 at 1:02 pm

    dr richa ji ki jeevani padkar hamdardi nahi jagi balki ek aurat kis tarah se apne pariwar walo se nafrat ki aag me jal rahi hai ye samne aaya hai,aapko insaf is liye bhi shayad nahi mil pa raha hai ki pati ke saat saat bhagwan par aapka bharosa unth gaya hai, aap mayawati ki sarkar ko bhagwan maan rahi hai,maut aur zindagi bhagwan ke haat me hai,aapki samajh to bewkufi bhari hai,aur aapko samjhane wale aapki zindagi aur aapki jawani ko pamal karne me maza aa raha hai,aap apne pati aur patriwar walo ko izzat dijiye,maut se mat ghabraiye,aapka ye log kuch nahi kar sakte jab tak aap bhagwan par bharosa kaqrengi,maya wati na insaf de payengi na jawani na zehni sukoon na hi pati,dil jodiye,dil jeetiye,bhagwan par bharosa kar saural jaye,galtio ki maafi maang le dekhiye agar apke pati ki mohabbat,sas sasur agar izzat na dein tab batayee,ziddi batein chod diiye,bhai hoon is liye mashwira de raha hoon

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