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गांडीव में हालात खराब, नहीं मिली नवम्‍बर की सेलरी

बनारस के सबसे प्रमुख सांध्‍य अखबार गांडीव की स्थिति काफी सोचनीय हो चली है. पिछले दिनों प्रबंधन एवं कर्मचारियों के बीच हुए टकराव के बाद कार्यालय के भीतर लगातार तनाव का माहौल बना हुआ है. अखबार की आर्थिक स्थिति भी लगातार खराब होती जा रही है. कभी बनारस का विश्‍वसनीय अखबार रहे गांडीव के पास अब कर्मचारियों को देने के लिए पैसे तक नहीं हैं. अखबार के कर्मचारियों को नवम्‍बर माह का वेतन अभी तक नहीं मिला है. संपादक भी कई दिनों से अपने केबिन में नहीं बैठ रहे हैं.

बनारस के सबसे प्रमुख सांध्‍य अखबार गांडीव की स्थिति काफी सोचनीय हो चली है. पिछले दिनों प्रबंधन एवं कर्मचारियों के बीच हुए टकराव के बाद कार्यालय के भीतर लगातार तनाव का माहौल बना हुआ है. अखबार की आर्थिक स्थिति भी लगातार खराब होती जा रही है. कभी बनारस का विश्‍वसनीय अखबार रहे गांडीव के पास अब कर्मचारियों को देने के लिए पैसे तक नहीं हैं. अखबार के कर्मचारियों को नवम्‍बर माह का वेतन अभी तक नहीं मिला है. संपादक भी कई दिनों से अपने केबिन में नहीं बैठ रहे हैं.

सूत्रों का कहना है कि पिछले दिनों जब से संपादक राजीव अरोड़ा की बेटी ने अखबार का काम संभाला है तब से कार्यालय के भीतर की स्थिति बहुत बदल गई है. प्रबंधन के कुछ निर्णयों को लेकर कर्मचारियों से कई बार टकराव हो चुका है. अखबार से कई वरिष्‍ठ लोगों को निकाल दिया गया. पिछले दिनों एक कर्मचारी शिवमूर्ति दुबे को निकालने को लेकर हुए बवाल के बाद गांडीव आफिस में पुलिस तक पहुंच गई थी. शिवमूर्ति ने संपादक समेत चार लोगों पर मुकदमा भी दर्ज कराया था. तमाम कर्मचारियों की शिकायत के बाद श्रम विभाग के लोगों ने कार्यालय आकर जांच-पड़ताल की थी. इसके बाद से प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच संबंध और असामान्‍य हो गया है.

बताया जा रहा है कि संपादक पिछले कई दिन से कार्यालय नहीं आ रहे हैं. किसी तरह अखबार का प्रकाशन हो रहा है. स्थिति ऐसी हो गई है कि अखबार के भविष्‍य को लेकर तरह-तरह के कयास लगने शुरू हो गए हैं. अपने अच्‍छे दिनों में अखबार कर्मचारियों को समय से सेलरी दे देता था. हर महीने के पांच-छह तारीख तक सेलरी मिल जाती थी. इस बार नवम्‍बर माह की सेलरी अब तक कर्मचारियों को नहीं मिली है. सेलरी न मिलने से कर्मचा‍री काफी परेशान हैं.

कुछ कर्मचारियों का कहना है कि संपादक को अब अखबार चलाने में दिलचस्‍पी ही नहीं है. वो अब इसका प्रकाशन बंद करना चाहते हैं. इसके लिए ही इस तरह का माहौल पैदा किया जा रहा है. ताकि कुछ लोग खुद छोड़ कर चले जाए और कुछ लोगों को प्रबंधन किसी तरह बाहर का रास्‍ता दिखा दे. बहरहाल, इस पूरे मामले में सच्‍चाई चाहे जो हो, इस अखबार से पिछले कई वर्षों से जुड़े लगभग पांच दर्जन कर्मचारियों का भविष्‍य भी दांव पर लग गया है. जिन कर्मियों ने अपनी आधी से ज्‍यादा उम्र इस अखबार के साथ गुजार दी, वे खासे परेशान हैं.

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