: निष्कासित मजदूरों को काम पर वापस लिया : कारखाना मालिक झुकने को मजबूर हुए : 3 जून से चालू हो जाएंगी मिलें : गोरखपुर के मजदूरों को उस समय भारी जीत मिली जब कारखाना मालिक ने तालाबंद कारखानों को चालू करने और निष्कासित मजदूरों को वापस लेने पर सहमति जताई। 18 निष्कासित मजदूरों में से 12 को तुरंत काम पर रख लिया गया है और बाकी के 6 मजदूरों को एक आंतरिक जांच-पड़ताल के बाद वापस लिया जाएगा।
मजदूरों ने मालिकों पर दबाव बनाकर यह तय कराया कि जांच समिति में पबंधन की तरफ से कोई नहीं होगा; इसमें ऑफिस स्टाफ के दो सदस्य तथा एक मजदूरों द्वारा चुना गया प्रतिनिधि होगा। यह निर्णय देर रात जिलाधिकारी के आवास पर हुई समझौता वार्ता के दौरान लिया गया। इस वार्ता में वीएन डायर्स एंड प्रोसेसर्स धागा मिल एवं कपड़ा मिल के दोनों मालिक, जिलाधिकारी, उप-श्रमायुक्त और मजदूरों के सात प्रतिनिधि मौजूद थे। गोरखपुर के बरगदवा क्षेत्र में स्थित इन दोनों मिलों में मालिकान ने 10 अप्रैल से अवैध तालाबंदी कर रखी थी। अजीत सरिया परिवार के स्वामित्व वाली इन दोनों मिलों में लगभग 500 मजदूर काम करते हैं जिनका सालाना टर्नओवर 150 करोड़ से ज्यादा का है। इन दोनों मिलों के 18 मज़दूरों को मालिकान द्वारा निष्कासित कर दिया गया था।
मज़दूर अपने साथियों को काम पर वापस लेने और फैक्टरियों को फिर से चालू करने के लिए आंदोलन कर रहे थे। उनके आंदोलन ने तब एक नया मोड़ ले लिया जब मज़दूर मांगपत्रक आंदोलन के आह्वान पर बरगदवा और गीडा औद्योगिक क्षेत्रों की कई फैक्टरियों के लगभग 1500 मज़दूर दिल्ली में मई दिवस में भाग लेने के लिए चले गये। लगभग सभी स्थानीय उद्योगपति मज़दूरों को इस रैली में शामिल होने से रोकने का प्रयास कर रहे थे और यहां तक कि मंडलायुक्त ने मज़दूरों के नेताओं को धमकी दी थी कि अगर वे मज़दूरों को ”भड़काना” जारी रखते हैं तो उन्हें बख्शा नहीं जायेगा।
दिनांक 3 मई की सुबह अंकुर उद्योग लि. नामक एक अन्य धागा मिल में रैली से लौटकर आये 18 नेतृत्वकर्ता मज़दूरों को निष्कासित कर दिया गया था। इस मिल में लगभग 900 मज़दूर काम करते हैं। जब मज़दूरों ने निष्कासन के इस कदम का विरोध किया, तो फैक्टरी मालिक अशोक जालान द्वारा बुलाये गये भाड़े के अपराधियों ने मज़दूरों पर गोलियां चलायी। इसमें 19 मज़दूर घायल हो गये। एक मज़दूर को पेट में गोली लगी जो उसकी रीढ़ तक पहुंच गई। उसकी हालत अब भी गंभीर बनी हुई है।
इसके विरोध में मज़दूरों ने मज़दूर सत्याग्रह की शुरुआत कर दी और उन्हें खुले तौर पर मालिकान के पक्ष में खड़े पुलिस तथा प्रशासन की ओर से भारी दमन का सामना करना पड़ा। आंदोलनरत मज़दूरों पर बार-बार लाठीचार्ज किया गया और यहां तक कि उन्हें शांतिपूर्ण रैली भी नहीं निकालने दी गयी। गोलीकाण्ड के मुख्य अभियुक्तों में से किसी की भी गिरफ्तारी नहीं की गयी और उल्टे कई मज़दूरों पर ही झूठे मामले दर्ज कर दिये गये। फिर भी, मज़दूरों के संकल्पबद्ध संघर्ष और देश-विदेश से मिले व्यापक समर्थन के कारण प्रशासन पीछे हटने को बाध्य हुआ और निकाले गये 18 मज़दूरों को अंकुर उद्योग लि. में वापस ले लिया गया और 11 मई से फैक्टरी चालू कर दी गयी।
लेकिन, वीएन डायर्स के मालिकान मज़दूरों को वापस नहीं लेने और किसी भी कीमत पर उनके आंदोलन को खत्म कर दिये जाने पर डटे रहे। मज़दूरों ने 16 मई से वीएन डायर्स धागा मिल के गेट पर ‘आमरण अनशन’ शुरू करके अपने सत्याग्रह आंदोलन के दूसरे चरण की शुरुआत की। मज़दूर निकाले गये मज़दूरों को काम पर वापस लेने, बंद कर दी गई मिलों को खोलने, गोलीकांड के आरोपियों को गिरफ्तार करने, घायल मज़दूरों को मुआवजा दिए जाने, और गोलीकांड की घटना तथा मज़दूरों के दमन पर एक उच्च स्तरीय जांच कराये जाने की मांग कर रहे थे।
भूख हड़ताल के पांचवें दिन, यानी 20 मई को, मज़दूर जब जिलाधिकारी से मिलने के लिए जा रहे थे, तो उन पर जबर्दस्त लाठीचार्ज किया गया जिसमें 25 से ज्यादा मज़दूर बुरी तरह घायल हो गये, और 73 मज़दूरों को गिरफ्तार कर लिया गया। ज़्यादातर मज़दूरों को देर रात को छोड़ दिया गया था लेकिन उनके 14 नेताओं को फर्जी आरोप लगाकर जेल भेज दिया गया, जिसमें दो महिला कार्यकर्ता भी शामिल थीं। आखिरकार, उन्हें एक सप्ताह बाद जमानत पर छोड़ दिया गया। मज़दूरों को एक और नैतिक विजय तब मिली जबकि चिलुआताल पुलिस थाने के थाना प्रभारी का तबादला कर दिया गया जिन्होंने मज़दूरों का बर्बरता से दमन करने में अहम भूमिका निभायी थी।
कारखानों के मालिक, श्रम विभाग और स्थानीय प्रशासन, मजदूरों को थका देने या उनकी एकजुटता को तोड़ने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। उन्होंने मजदूरों के बिना ही प्रशासन से ”वार्ता” भी कर ली और उन 18 मजदूरों के बिना मिल चालू करने की घोषणा भी कर दी थी जिन्हें मालिकान ने ”सेवा से निवृत्त” घोषित कर दिया था। पिछले कुछ दिनों से, मालिकान निष्कासित मजदूरों को काम पर रखे बिना मिल चालू कराने का प्रयास कर रहे थे लेकिन मजदूरों ने अपने निष्कासित साथियों को काम पर वापस लेने तक काम करने से इंकार कर दिया। यहां तक कि कारखाना मालिकों ने नए मजदूरों की भर्ती करके मिल दोबारा चालू करने की धमकी भी दी।
बीती 30 मई को, मजदूरों ने धागा मिल में घुसकर उसपर कब्जा कर लिया। इससे प्रबंधन बिना मजदूरों को काम पर वापस लिए मिलें चालू नहीं कर सकता था और उस पर मजदूरों की मांगें मानने का दबाव भी पड़ा। मजदूरों धागा मिल में घुसने के बाद उसकी सभी दुकानों पर कब्जा कर लिया था। तभी से वे पुलिस और पीएसी से मिल रही धमकियों के बावजूद कारखाने पर कब्जा किए हुए थे। इस बीच, बड़ी संख्या में मजदूर कारखाने के बाहर निगरानी कर रहे थे और अंदर मौजूद मजदूरों तक खाना पहुंचा रहे थे।
बुधवार रात प्रशासन मालिकों और मजदूरों को वार्ता के लिए बुलाने को बाध्य हो गया और 3 घंटे तक चली बातचीत के बाद अंत में यह निर्णय लिया गया। इस समझौता-वार्ता में जिलाधिकारी और उप-श्रमायुक्त के अलावा, दो मालिक तथा धागा मिल के चार और कपड़ा मिल के तीन मजदूर उपस्थित थे। संयुक्त मजदूर अधिकार संघर्ष मोर्चा ने इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा है कि यह जीत बरगदवा के मजदूरों जुझारू संघर्ष की वजह से मिली है जिन्होंने एकजुट होकर पूंजीपतियों और राज्य की ताकत का मुकाबला किया। हालांकि, मोर्चा ने मजदूरों को इस जीत के बावजूद सावधान रहने के लिए कहा क्योंकि प्रशासन एवं प्रबंधन पहले भी कई बार अपने वायदों से मुकर चुके हैं। इसके अतिरिक्त, मजदूरों पर गोली चलाने की घटना में न्याय दिलाने का संघर्ष जारी रहेगा। मजदूरों पर लगाए गए फर्जी मुकदमे अभी तक वापस नहीं लिए गए हैं।
मोर्चा ने इस विभिन्न तरीकों से इस आंदोलन की मदद करने वाले सभी साथियों, समर्थकों, शुभचिंतकों को धन्यवाद दिया। मोर्चा ने बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, न्यायविदों, मीडियाकर्मियों और ट्रेड यूनियनों से अपील की है कि वे 3 मई के गोलीकांड और गोरखपुर के लगभग हर उद्योग में श्रम कानूनों के उल्लंघन की उच्चस्तरीय जांच की मांग का अपना अभियान जारी रखें।
— गोरखपुर मज़दूर आंदोलन समर्थक नागरिक मोर्चा












