: वर्तमान पत्रकारों का स्याह सच : हम वर्तमान के पत्रकारों (विशेष तौर पर कथित रिपोर्टर्स) को देखकर जिस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं- हो सकता है उससे कुछ ही फीसदी पाठक सहमत हों, फिर भी अपने अन्दर की अनुभूति को लिपिबद्ध कर रहा हूं। वर्तमान में कथित पत्रकारों की बहुलता हो गई है- सम्भवतः वे पढे़-लिखे एवं कम शिक्षित बेरोजगार भी हो सकते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिनको खाने-पीने शराब आदि की लत पड़ गई है, ऐसे में प्रतिदिन 2 से 5 सौ रूपए का खर्चा आता है- ये पैसे कहां से आएंगे? इस समस्या के समाधान के लिए बहुतों ने प्रेस/मीडिया ज्वाइन कर लिया है।
ऐसा नहीं है कि यह मनगढ़ंत है- कुछेक ने अपनी जुबानी इस बारे में मुझे बताया है। उनके अनुसार घर-परिवार के सदस्य उनकी बेरोजगारी से ही तंग हैं, ऊपर से प्रतिदिन सैकड़ों रूपए का खर्च कहां से ‘वहन’ कर पाएंगे। ऐसे बेरोजगारों ने ‘मीडिया’ में रिपोर्टर बनकर धन कमाई का बेतरीन जरिया ढूंढ लिया है। ये पत्रकार लिखने के नाम पर जीरो हैं लेकिन हाव-भाव, बोल-चाल, रहन-सहन, खान-पान में हीरो दिखते हैं।
कुछ तो पुलिस एवं सम्भागीय परिवहन विभाग से दोस्ती करके टैक्सियां चलवा रहें हैं, लगभग 90 फीसदी लोग पुलिस के ‘इन्फार्मर’ भी बन गए हैं। कई पत्रकारों के बारे में सुना गया है कि इनकी दिन-चर्या कुछ अजीब सी है- मसलन सुबह की चाय कोतवाल के साथ, दोपहर का लंच पूर्ति अधिकारी और डिनर (रात का भोजन एवं शराब) किसी दिलफेंक और मस्त किस्म के सरकारी मुलाजिम के साथ करते हैं। इन पत्रकारों के पास महंगे मोबाइल, डिजिटल कैमरे, स्लिप पैड और महंगी कलम होती है। बड़े-बड़े शहरों से प्रकाशित होने वाले अखबारों का ‘रिपोर्टर’ कहलाने के शौक की वजह से ये लोग (कथित पत्रकार) 10-20 प्रतियों की एजेन्सियां खुद के नाम से ले रखा है।
सरकारी कार्य दिवस पर इन पत्रकारों की टीम के सदस्य सरकारी विभागीय कार्यालयों में ‘अफसरों’ के समक्ष/ इर्द-गिर्द चक्कर काटते मिलते हैं। इन्हें देखकर प्रतीत होता है कि विश्व के अति व्यस्त पत्रकारों में से एक ये भी हैं। अखबार तो ‘फ्री’ में बंटता है, रिपोर्टस एक भीं नहीं छपती है, लेकिन सरकारी हल्कों में इन्हें पत्रकार के रूप में अवश्य ही तरजीह दी जाती है। कई सरकारी मुलाजिमों से बात हुई तो वह लोग रूआंसे होकर बोले कि यदि ऐसे लोगों की आवभगत न की जाए तो अकारण ही अनर्गल समाचार छाप देंगे, जो उनकी परेशानी का सबब बन सकता है। इसी तरह अनकों ऐसे सरकारी कर्मियों ने बताया कि आज-कल पत्रकारिता और पत्रकारों का यह स्तर हो गया है कि बस पूछिए मत। ये पत्रकार (प्रेस रिपोर्टर्स) सुबह होते ही अफसरों के पास आ धमकते हैं, जिससे विभागीय कार्यों के संपादन और जनता की समस्याओं का निष्पादन कार्यों में बाधा पड़ती है।
क्या कहा जाए? शायद ऐसे पत्रकारों को यह नहीं मालूम कि सरकारी मुलाजिम हर समय खाली नहीं रहते हैं। दफ्तरों में आएं और अल्प समय में वार्ता निबटाकर वापस हो लें। विभागीय कर्मियों में उलझन सी बनी रहती है और जब ये कथित पत्रकार गण कार्यालय से निकलते हैं, तब उन्हें सामान्य होने में काफी समय लग जाता है- तात्पर्य यह कि पूरा ’कार्य-दिवस’ बगैर कोई ढंग का कामकाज किए ही बीत जाता है। सरकारी कार्यालयों के कर्मचारियों के अनुसार अब तक वह लोग श्वेत वसनधारियों से ही परेशान रहा करते थे, लेकिन वर्तमान में बरसाती पौधों की तरह पैदा हुए पत्रकारों की भीड़ से बहुत ज्यादा दिक्कतें पेश आने लगी हैं। एक आफिसर ने कहा- भाई जी आजकल हम लोग पत्रकारों की भीड़ से ही परेशान हैं, ये लोग न तो विभागीय कार्य करने देते हैं और न ही जनता का- सुबह होते ही आ जाते हैं- एक गया तो दूसरा आया- यह क्रम पूरे दिवस चलता है। किसी से यदि बात न की जाए तो वह लोग बुरा मान जाते हैं। बेहतर होता कि ये लोग ‘माननीयों’ के इर्द-गिर्द रहा करते।
खैर! यह तो रही सरकारी मुलाजिमों की बातें जिनका नजरिया पत्रकारों और उनकी बढ़ती तादात को लेकर सर्वथा नकारात्मक हो चला है। हमने एक नहीं दर्जनों भर कथित पत्रकारों से बात किया तो पता चला कि इनकी सोच ही विपरीत है। एक ने कहा सर जी क्या करें बेरोजगारी है, नेतागण जाति-वादी हो गए हैं- इसलिए दो-चार सौ रूपए का जुगाड़ करने की गरज से विभागीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों से सम्पर्क साधना पड़ता है। पहले सूची तैयार करता हूं फिर सरकारी अफसरों/कर्मियों की कमियां निकालता हूं और भयादोहन (ब्लैक मेलिंग) करके खर्चा-पानी इन्हीं कथित भ्रष्टाचारियों से वसूलता हूं। मैं ही नहीं अनेकों ऐसे पत्रकार भाई हैं, जिन्हें लिखने की तमीज नहीं है, फिर भी अखबारों के प्रतिनिधि बनकर दिन भर इस आफिस से लेकर दूसरे दफ्तरों का चक्कर लगाया करते हैं।
तहसील, कलेक्ट्रेट, विकास भवन, कृषि भवन, शिक्षा विभाग, पूर्ति विभाग, लोनिवि, अस्पताल, थाना-कोतवाली में फरियादियों की कम पत्रकारों की ही भीड़ देखी जा सकती है। सुबह से शाम तक इधर-उधर घूमने वाले पत्रकार सैकड़ों और हजारों रूपए की कमाई कर लेते हैं। चाहे किसी जरूरतमन्द के काम कराने की एवज में या फिर सीधे सरकारी मुलाजिमों से मांग कर। एक ने धृष्टता करते हुए कहा कि आप क्यों नहीं निकलते हैं- बाहर पैसा बरस रहा है- उड़ रहा है आप जैसा सीनियर ‘कलमघसीट’ तो आसानी से हजारों रूपए प्रतिदिन कमा सकता है। लीजिए- यह महंगा वाला ‘गुटखा’ खाने की आदत डालिए- फिर शाम को बढ़िया वाइन पिलाऊंगा ताकि आप भीं इन भ्रष्ट मनचले अधिकारियों की ‘सोहबत’ कर सकें। रोटी-बोटी, सुरा-सुन्दरी का उपभोग कर सकें।
उस मुंह लगे धृष्ट कथित पत्रकार से कहना पड़ा बस करो- यह सब तुम्हारे लोगों को ही मुबारक हो। अपना क्या लेखनी चलती रहे, समस्याएं लिखता हूं नीचे से लेकर ऊपर वाले भगवान सुनें या न सुनें यह उनकी मर्जी। वह हंसता हुआ मुंह में महंगा गुटखा (पान-मसाला) भर लेता है। पान मसाला भरने के उपरान्त वह अगले दफ्तर की तरफ रूख कर लेता है। तो ऐसे हैं आजकल के कथित पत्रकार जो प्रेस रिपोर्टर्स बनकर अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए हर तरह के हथकण्डे अपना रहें हैं।
भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी अम्बेडकरनगर के निवासी तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं.












abhi
October 9, 2010 at 3:24 am
aisa hi hota hai
Reeta Vishwakarma
October 9, 2010 at 5:00 pm
आदरणीय महोदय, मैंने आपका लेख पढ़ा, जो किसी हद तक सत्य हैं। मैं भी पत्रकारिता से सम्बद्ध हूँ, और वाराणसी/जौनपुर से प्रकाशित हिन्दी समाचार-पत्र ‘‘दैनिक मान्यवर’’ की अम्बेडकरनगर स्थित जिला प्रतिनिधि हूँ। आप जैसे वरिष्ठ पत्रकारों का कथन नकारा नहीं जा सकता। मैंने सुन रखा है कि आप विगत 35 वर्षों से हिन्दी पत्रकारिता से सम्बद्ध रहकर अपनी बेबाक रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं। मैं यहाँ पर एक मात्र सक्रिय महिला पत्रकार हूँ। आपके लेख में उल्लेख की गई बातें वर्तमान पत्रकारों (विशेष रूप से छोटी जगहों पर) बिल्कुल सटीक बैठती हैं। यहाँ हम आप जैसे अपवाद रूपी पत्रकारों को छोड़कर अन्य नए पत्रकारों के बारे में जब सुनते या देखते हैं तो आपका यह लेख उन सबकी हकीकत बयां करता हुआ नजर आता है। अपेक्षा करती हूँ कि आपके ज्ञानवर्धक लेख इसी तरह प्रबुद्ध वर्गीय लोगों में अति लोकप्रिय ‘भड़ास 4 मीडिया डॉट काम’ के माध्यम से मुझ जैसे पत्रकारों को पढ़ने को मिलता रहेगा, जो हम जैसे लोगों को ‘‘पत्रकारिता एक मिशन है’’ को विस्मृत करने से बचाता रहेगा। मैं भड़ास 4 मीडिया डॉट काम को आपका लेख छापने के लिए धन्यवाद ज्ञापित करती हूँ।
रीता विश्वकर्मा, अकबरपुर, अम्बेडकरनगर। मो0-9369006284
Abhishek sharma
October 9, 2010 at 6:42 pm
iske liye media ka swaroop jimmedar hai, media walo ko salary milti nahi, dalali majboori hai, gine chune mathaadhish hai jo achchhi salari peet rahe hai… salary do patrakar bhi dalal nahi banna chahte…soch badlo desh badlega….
Abhishek sharma
http://www.exultvision.blogspot.com
Pankaj Dixit
October 9, 2010 at 7:52 pm
यही कडुआ सच है| अब पत्रकारिता के लिए लोग अध्धयन नहीं करते| इनमे से ज्यादातर वो होते है जो नक़ल मार कर डिग्रिया लेते है| झूठ के आडम्बर का लबादा ओढ़ कर आजीवन ग़लतफ़हमी में जिन्दगी गुजारते है|
मायावती के बाद राहुल गाँधी ने भी मीडिया को नकार दिया तो उसके पीछे ये भीड़ भी कारक है|
भूपेन्द्र जी आप से बात करना चाहता हूँ
कृपया सम्पर्क करे 9415333325
kabeer
October 10, 2010 at 1:36 am
darasal iske liye akhbaar bhi kam jimmedar nahin hain. prasar aur vigyapan ke liye reporter banate hain. jyada prasar wale akhbaar bhi reporteron ka shoshan hi karten hain. akhbaarnavisi manhga shauk ho gaya hai. mandeya se bachchon ke liye pure mahine toffy bhi nahin kharidi ja sakti hai. berojgari ke daur men nakabil logon ke liye akhbaar badhiya jariya ban gaye hain. is daur men jo loot maar na kar sake use bhai log chootiya samajhate hain. desk ko ghee, achar, daroo pahunchana aise patrakaron (maaf karen) ki jaroorat hai. phir bhi achche patrakaron ki kami nahin hai.
rakes sinha
October 10, 2010 at 5:34 am
Singh jee, aapka lekh padha. kafi had tak baaten sahi hai.kintu puri taur par aapne in kathit patrakaron ke baare me nahin likhan. panne ka ek bhag padhkar kahani ka saransh nahin samjha ja sakta. kyonki apne us vyavastha ka jikra tak nahin kiya ki akhir ye kathit patrakaro ki bhid kyon badhti ja rahi hai. ye kyon adhikariyon ki chaplusi karke 200-400 ka jugad kar rahe hai. aap jaise log media ke shirsha par baithte hai.aur jab tahsilo me sawad sutra bahal karne ki naubat ati hai tab unhe hajar 2 hajar ki jagah 5 rup./news majduri dete hai. 24 ghante kam ke liye unhe daudaya jata hai. lekin mahine me jodne par pata chalta hai.ki uski kewal 30 khabre chhapti hai.yaani mahine ka kul vetan kewal 150 rupe.aap khud tay kariye .aapki najar me jo aap joaise patrakar hai. unke mahine bhar ki sigrate ka kharcha v isse jyada hota hai. lekin dhup,warish, aur sardi me jan jokhim me dalkar, police aur gundo se panga lekar jo aap jaise “”PATRAKARO””;ke akhbar ki page sajata hai.useke pariwar palne ke liye milta hai.derh se 200 rupya. Singh G , dil ki abhadas likalna aur chhpne ka shauk har kisi ko hota hai.lekin aine ke har pahlu ko samne rakhiye.aap khud bataiye hindustan me mahangai itni badh gayi k ho halla mach gaya hai. har bibhag me vetan badha diye gayae.lekin aap sabo ko bataiye ke bharat k kis media house ne un tahsil patrakaron ki majduri in salon me badhai hai. competition k nam par dauda duada kar mar dete hai.aur milta kya hai. sirf tiraskar , bhukhmari, aur jindgi bhar pachhtane ka awsar ki ””’MAIN MEDIA ME AKHIR AYA HI KYON?????.
Singh g. mera maqsad apki bat ka pratikar karna nahin hai. lekin shirsh par rahnewale aap jaise log agar khun jalane wale ko kathit patrakar kahte rahenge tab tak ye chalta rahega.media houses jab tak shoshan karte rahenge…pariwar ka pet bharne ke liye kathit patrakar kuchh na kuchh jugad karte rahenge. kyonk jis par chuta hai wohi chharta hai.AC me baithkar panne sajanewale unki pida ko nahin samajh sakte. aur samjhenge v to aap jaise lafjo me hi unki nish ha aur karmathta par ungli uthate rahenge. waise jate jate itna hi kahunga ki”””JISKA BADA BHAI HO SARABI… CHHOTA PIYE TO KAHE SHARABI
JA HIND.
RAKESH,bIHAR
dilshad malik
October 10, 2010 at 11:10 pm
yeh ktu stya hai
arvind singh
October 11, 2010 at 2:46 am
bhupendra singh ki baat ekdam sahi hai,lekin usake liye jimmedar hai poora sistam,bhupendra ji ne tathakathit patrakaro ke baare me to apane vichaar vyakta kar diya,lekin un akhabaaro ke baare me nahi likha jo isatarah ke patrakaro ko rakhate hai. samachaar jagat me tammam tarah ki samasyaye hai,akhabaar ke malik aise logo ko reporter rakhaate hai jinhe ek paisa na dena pade aur unako khabar bhi milati rahe to kya karenge o tathakathit patrakaar,samachaar jutane ke liye kaha se kharcha karenge paisa.ye to hui tathtakathit patrakaaro ki baat,lekin kabhi koi un patrakaaro ke baare me sochata hai jo wastav me imaandaari se apana kaam kaarate hai,lekin unaka akhabaar maliko dwaara sosan kiya jaata hai,aise bahut saare prabudha patrakaar aaj kafi pareshaani me jindagi basar kar rahe hai lekin unaki pareshaani dekhane waala koi nahi hai.unako koi jaanata tak nahi bechare poori jindagi kisi akhabaar me kaam karate huye gumnaam hi mar jaate hai.sab bahut ulaza hua mamala hai.aaj wastawikata yah hai ki duniya ki samasya ka samadhaan karane ki baat karane wale patrakaar khud aapani pareshani nahi khatma kar sakate.poori jindagi pareshaani me gujaarane ko majboor hai.lekin unaki taraf dekhane waala koi nahi.
kumar krishna mokama 9852150766
October 12, 2010 at 6:06 am
AAPKI BAATON SE INKAAR NAHI PAR 6th PARAGRAPH ME AAPNE ANEKON LIKHA HAI JO KI GALATA HAI . MAAF KIJIYEGA AAP HAMSE SENIOR HAIN PAR ANEK KHUD EK BAHUWACHAN SHABD HAI ISLIYE MOOL SHABD ANEK HI HOTA HAI JISKA EKWACHAN HOTA HAI EK . PLS MIND MAT KIJIYEGA PAR HAM HI GALAT LIKHEN TO THEEK NAHI . HAM JO LIKHTE HAIN USSE PATHAK DHYAAN SE PADHTA HAI AUR WO BHI AKHBAAR KA INTAJAAR KARKE . SORRY AND THANKS
Akhilesh Upadhyaya
October 15, 2010 at 1:30 pm
It is naked truth.
दिनेश जायसवाल गोसाईगंज फैजाबाद
November 19, 2018 at 4:43 am
वरिष्ठ पत्रकार की जो लेख आप द्वारा लिखी गई है कूट सत्य है आज पत्रकारिता इस दिशा में चली गई है कथाकथित बने पत्रकार को देख कर सिपाही प्रधान आदि व्यापारी मन ही मन क्या क्या कह देते हैं इस लेख में लिखा नहीं जा सकता। थाने पर जब कोई दरोगा सिपाही किसी पत्रकार को देखता है तो वह कहता है आ गया साला दलाल कहीं का एक स्थान पर बैठे थे विभाग के कई लोग थे एक पत्रकार आया जिसका नाम राहुल था यह बदला हुआ नाम है उसके आते ही पुलिस विभाग के लोगों ने चोर पत्रकार दलाल पत्रकार आ रहा है। हमें इतनी शर्म आई कि मुझे अपने आप को पत्रकार कहने में शर्म आने लगी।