एक रात की बात है, मैं और मेरे दोस्त के बीच न्यूज चैनल को लेकर चर्चा छिड़ गई.. चूंकि दोनों ही इडियट बॉक्स के इडियोटिक माहौल से वाकिफ हैं…लिहाजा चर्चा में आधार और आयाम तय करने की जरूरत ही नहीं हुई…. अक्सर बात निकलती है तो दूर तलक जाती है…लेकिन उस रात बात निकली तो दूर नहीं अपने ही करीब आ पहुंची… करीब बेहद करीब… जर्नलिज्म की जो घुट्टी कॉलेज के दिनों में पी थी, शिफ्ट ओवर होने के बाद उसी घुट्टी के घुटन से चर्चा हुई… और जल्द ही अपकमिंग चैनलों पर जा टिकी… चर्चा थी कि कुछ नए चैनल आने वाले हैं…
तभी मेरे एक और दोस्त जिनका मीडिया से कोई सरोकार नहीं… वो आ टपके और चर्चा को लपकते हुए ये कह डाला कि, अरे ये चैनल हैं या चेन… तुकबंदी के लिहाज से तो उनकी बात ने हमें एक पल को ठिठका दिया, लेकिन महज तुकबंदी ही नहीं मजाक मजाक में दिए गए उसके तर्कों ने भी, हमें एक पल को बुत बना दिया… क्या थे उसके तर्क आप भी गौर कीजिए….
तर्क नंबर 1-
उसने कहा कि चैनल तो आजकल चेन की तरह खुलते और बंद हो जाते हैं… जिसका जब जी चाहता वो चेन की तरह चैनल खोल देता है… और उसी गति से बंद भी कर देता है… कुछ चैनल तो ऎसे हैं जो चेन की तरह खुल आसानी से गए हैं… लेकिन बंद नहीं हो पा रहे हैं…. मामला जाम हो गया है… मोम से भी काम नहीं चल रहा…
तर्क नंबर 2-
चैनल और चेन में बड़ा बदलाव आया है… पहले चेन लंबे हुआ करते थे, आजकल छोटे चेनों का जमाना है… आदमी बड़ा हो या छोटा, लंबा हो या नाटा, चेन छोटे ही होते हैं… ठीक आजकल के न्यूज चैनलों की तरह, जिनका टार्गेट बड़ा हो या छोटा, बजट छोटा ही होता है… और उससे भी काम नहीं चलता तो कॉस्ट कटिंग का शिगूफा तो है ही…
तर्क नंबर 3-
पहले के चेन लंबे पतले और इजी टू यूज आते थे… आजकल आर्कषक पीतल वाले छोटे चेन आ गए हैं.. जो देखने में तो बेहद खूबसूरत और टिकाऊ लगते हैं… लेकिन उनमें जाम की शिकायत ज्यादा आती है…. ठीक उन न्यूज चैनलों की तरह जिनकी ओपनिंग धांसू होती है… दफ्तर किसी मल्टिनेशनल कंपनी सरीखा होता है, देखने से लगता है कि फलां चैनल और चैनलों से ज्यादा मालदार है.. सबकी छुट्टी कर देगा…. लेकिन चंद दिनों में ही उसकी रंगत फीकी पड़ जाती है… मामला जाम हो जाता है…. फिर मोमबत्ती से भी बात नहीं बनती… क्योंकि ये पीतल वाला है, वो पुराना वाला नहीं कि मोम के आगे पिघल जाए….
तर्क नंबर 4-
चेनों के आधुनिक बाजार ने भले ही लोगों की सहूलियत का ख्याल रखा हो या न रखा हो, उनके फीचर्स चैनलों से बेहद मेल खा रहे हैं… अब देखिए न बाजार में आजकल चेन को बटन ने रिप्लेस कर दिया है… इन दिनों चेन की जगह पर बटन लग रहे हैं… साफ है कि ऎसे विकल्पों में हड़बड़ी की कोई गुंजाइश नहीं है… धीरज है तो फैशन की इस धारा में आएं, ऎसा ही हाल कुछ अपकमिंग चैनलों का भी है, जो सालों से अपकमिंग हैं… जिनके लेटेस्ट होने की हवा है, पर वो कब आएंगे, कब ऑऩएयर होंगे, इन सवालों का जवाब धीरज में छिपा है….
तर्क औऱ भी थे लेकिन उनको कलमबंद करने में मर्यादा आड़े आ रही थी, पर यकीन जानिए कि जो तर्क मर्यादा की भेंट चढ़ गए… वो उस जामुन की तरह हैं कि जिसे खाकर ऎसे चैनलों के तथाकथित हेड जुबान नीला किए फिरते हैं, और जताते है कि वही भगवान शंकर हैं जो हर रोज विषपान कर रहे हैं…..
लेखक राकेश कुमार दिल्ली में पदस्थ टीवी जर्नलिस्ट हैं.












Ratan jaiswani
November 11, 2010 at 4:20 am
bahut sundar rakesh ji, lekin aap yah likhna bhool gaye shayad ki chen khuli rah jaye to usme se kya-kya dikhta hai,
manish choubey
November 11, 2010 at 11:00 am
bahut aacha hai bhai dil ko chu gai aap ke baat :'(
Nikku
November 11, 2010 at 11:45 am
AALEKH BAHUT ACCHA TO HAI LEKIN ESKAA SAAR MAI SAMAZ NAHI PAA RAHAA KI AAP KAHANAA KYA CHAHATE HAI.AGAR NEWS CHANNELS KUKURMUTTE KI TARAHA KHUD RAHE BAND HO RAHE TO ES KAA CHAIN SE KYA TAALLUK HAI JANAB
shravan shukla
November 12, 2010 at 6:09 am
ghatiya lekh..koi arth nahi niklta..kahi koi waakya poora nahi kar paaye jo arthpoorn ho..
Pradeep Arora
November 12, 2010 at 7:54 am
Kya matlab ?
Chain and Channel me koi samanta nahi hai.
Halka- Fulka manoranjan wala lekh likha hai ye.
Apani kalam- Syahi ko / keyboard ke batano ko kisi kranti vicharo ki aur modo bandhu.
NCR REPORTER
November 13, 2010 at 4:30 am
rakesh ji bahut badiya ye hakikat ban gayi hai media jagat ki kyunki kabhi sarkari vibhag or anya private vibhag ( unke naam na bata kar ) patrakar or media jagat se ek doori banakar rakhte the ki kahi ye patrakar apni lekhni se meri chutti na kara de …. or patrakar bandhu hi kaha jata tha chahe vo dar se ho ya izzat se lekin aaj jis tarah se news channel khul rahe hai or band ho rahe hai vo to chain ko bhi maat kar rahe hai aaj ki date me patrakaro ki izzat me vo dam nahi raha hai jo pahle hua karta tha …..kyunki aaj patrkarita nahi chaturkarita or chamchagiri matr rahe gayi hai ……. jisse or kuch nahi loktantr ka ye choutha stambh apni jade hilte hue mahsoos kar raha hai …..ise ham bhi dekh rahe hai kyunki main bhi patrkarita me pichle 4 saalo se kaam kar raha hu lekin aaj ki date me jab mein kabhi fursat ke pal me un logo ke beech ja baithta hu jo kabhi patrkaro ko bahut bada admi samajte the vo bhi aaj media jagat ki mukhalfat karte najar aate hai ……ye baat aapne bhi bata di ab channel chain jaise ho gaye hai ………..lekin abhi kisi kisi me vodam bacha to hai jinhe halaat or head ki maar jhelni padti hai ya nokri se haath dhona padta hai ……..
Raj
November 13, 2010 at 5:16 am
बिल्कुल सही वजह फरमाया जनाब, सच्चाई तो ये है कि आज जिसके पास भी 5 से 10 करोड़ रुपये हैं वो भी चैनलों की इस अंधी दौड़ का हिस्सा बनना चाहते हैं, भले ही एक-दो महीनों में उस चैनल का पलीता गीला हो जाए। ऐसे कई चैनल हैं जिसे आप भी जानते हैं, और मैं भी, बावजूद इसके हैरानी की बात ये है कि चैनलों का खुलना बंद नहीं हो रहा है। एक तरह से ठीक भी है और नहीं भी, ठीक इसलिए क्योंकि बहुत सारे पत्रकार बंधुओं, जो पत्रकारिता के नए पौध हैं, उनके लिए शुरुआत आसान हो जाती है, लेकिन दु:ख तो तब होता है जब चैनल कुछएक महीनों में ही दम तोड़ देते हैं, और नेशनल चैनल में कदम रखना सबके बस की बात भी नहीं है। ऐसे में क्या करे, क्या ना करे वाले कहावत सही चरितार्थ होती नजर आती है।
Gaurav
November 16, 2010 at 3:07 pm
बेहतरीन लिखते हो भाई। मज़ा आ गया….