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दुख-दर्द

जागिए! रमेश, मनीष की जगह हम-आप भी पिट सकते थे

पत्रकारों की किस्मत में तब तक पिटना लिखा रहेगा जब तक कुछ भड़वे और दल्ले किस्म के तथाकथित पत्रकार हमारे बीच में रहेंगे। ये वे हैं जिन्हें पान, बीड़ी, चाय, पुडि़या, दमड़ी और दारू के लिए अपना जमीर बेचने से भी गुरेज नहीं है। शायद इनका यही स्तर है। हाल ही में मुजफ्फरनगर में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हुए हमले के बाबत मैं यहां मुखातिब हूं। यशवंत जी, यह भड़ास ही है जो आपके मंच के माध्यम से निकाल रहा हूं, कृपया इसे प्रकाशित जरूर करें। हो सकता है पढ़कर पत्रकार जाग उठें या तथाकथित पत्रकारों का जमीर जाग उठे, हालांकि इसकी उम्मीद कम ही है।

पत्रकारों की किस्मत में तब तक पिटना लिखा रहेगा जब तक कुछ भड़वे और दल्ले किस्म के तथाकथित पत्रकार हमारे बीच में रहेंगे। ये वे हैं जिन्हें पान, बीड़ी, चाय, पुडि़या, दमड़ी और दारू के लिए अपना जमीर बेचने से भी गुरेज नहीं है। शायद इनका यही स्तर है। हाल ही में मुजफ्फरनगर में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हुए हमले के बाबत मैं यहां मुखातिब हूं। यशवंत जी, यह भड़ास ही है जो आपके मंच के माध्यम से निकाल रहा हूं, कृपया इसे प्रकाशित जरूर करें। हो सकता है पढ़कर पत्रकार जाग उठें या तथाकथित पत्रकारों का जमीर जाग उठे, हालांकि इसकी उम्मीद कम ही है।

भड़ास पर अमर उजाला और हिंदुस्तान के फोटोग्राफरों पर वकीलों के जानलेवा हमले की खबर जिसने भी पढ़ी निंदा की और जाग जाने की नसीहत भी दी। एक मित्र ने इसे फेसबुक पर शेयर किया तो कई ऐसे लोगों ने भी एक होने की सलाह देते हुए अस्तित्‍व पर मंडराते खतरे की बाबत चेताया, जिनका दूर-दूर तक पत्रकारिता से कोई वास्ता नहीं। कई संगठनों ने कंधे से कंधा मिलाने की हामी भरी, लेकिन शायद हमने भी कसम खा ली की हम नहीं जागेंगे और एक बार फिर पिटने के लिए तैयार हैं। ऐसा ही कुछ हो रहा है मुजफ्फरनगर में। अभी दोनों फोटोग्राफर अस्पताल में जिंदगी और मौत के

बीच झूल रहे हैं। दोनों के जख्म हरे हैं और इन हरे जख्मों पर शुरू हो गई कुछ दल्लों की स्याह सियासत। रविवार को हमले के विरोध में लाइन ऑफ एक्शंन के लिए पत्रकारों की बैठक बुलाई गई थी। बैठक में क्रांतिकारी उद्बोधन के साथ सभी ने अपने विचार रखे। एक साथी पत्रकार ने सोमवार को जिलेभर के पत्रकारों व अन्य संगठनों के सहयोग से डीएम कार्यालय पर ही शक्ति प्रदर्शन का प्रस्ताव रखा ताकि कचहरी में प्रवेश पर पाबंदी लगाने वाले वकीलों को एहसास हो सके कि पत्रकार एक हैं और डरे नहीं है। आगे ऐसी हिमाकत न करें। सभी ने हाथ उठाए सिर्फ तीन दल्ले और तथाकथित पत्रकारों को छोड़कर। इन्हीं तथाकथित पत्रकारों ने शक्ति प्रदर्शन के समय को सोमवार से बढ़ाकर बुधवार कर दिया।

बताना चाहूंगा कि इन तथाकथित पत्रकारों में एक शख्स वो है जो कभी अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिंदुस्तान के दफ्तर के गेट पर विज्ञप्ति लेकर खड़ा रहता था। एक रालोद नेता के पिट्ठू व सांध्य दैनिक अखबार के इस नवस्वयंभू संपादक के दिन ऐसे बहुरे कि तीनों प्रमुख अखबारों के प्रभारी इसके पिट्ठू हो लिए। आलम यह है कि दैनिक जागरण, अमर उजाला और हिंदुस्तान तीनों के प्रभारी अपने दफ्तरों से निकलने के सीधे वहीं हाजिरी लगाते हैं। मानों वह तीनों अखबारों का सामूहिक कैंप कार्यालय है। वहीं चलता है दिन में पान, पुडि़या, चाय पकौड़ी और रात में दारू का दौर। चाहें तो जिले के किसी भी पत्रकार के पास फोन कर इसकी गोपनीय पुष्‍टि कर लें। रालोद नेता के इस पिट्ठू की सेवा पानी का असर ये है कि तीनों अखबारों में वही खबर छपती है जिसका इशारा वह करता है। हमला प्रकरण में भी वहीं हुआ जो वह चाहता था।

रविवार को सुबह शक्ति प्रदर्शन का ऐलान हुआ और शाम को उक्त पिट्ठू ने तीनों दफ्तरों के चक्कर लगाए। दारू का दौर चला… बिना किसी पत्रकार को सूचित किए या विश्वास में लिए मंगलवार को वकीलों के प्रतिनिधिमंडल से वार्ता का प्रस्ताव पारित कर दिया। इनमें कुछ को डीएम-एसएसपी के साथ नाश्ता करने का लालच रहा होगा तो कुछ को वकीलों से यारी निभानी होगी. एक को अपने सियासी ताल्लुकात का मोह रहा होगा। इसी के चलते इन्होंने पत्रकारों का सौदा किया और पत्रकारिता का भी। इन चारों महाशयों (तीनों प्रमुख अखबारों के प्रभारी व उक्त पिट्ठू ) में ऐसे भी हैं, जो अपने ही पत्रकारों की गलती निकालने लगे हैं। अरे, अगर गलती है भी (फिलहाल तो एकदम नहीं है) तो भी उस पर पर्दा डालो, लेकिन यहां मंजर उल्टा है। जो सुबह तक बैठक में क्रांतिकारी होने का मुखौटा लगाए थे रात होते-होते अपने असली रंग में आ गए… भड़वे वाले… दल्ले वाले.

दिल में तो और भी भड़ास है जो निकालूंगा तो शायद ऐसे शब्द निकलें कि आप इसे छापे ही न. खैर, मैं मुजफ्फरनगर के अपने साथी पत्रकारों कहूंगा कि जाग जाओ… भड़वों के चक्कर में न रहो. सोचो अमर उजाला के जिस रमेश चौहान के दोनों कानों के पर्दे फट गए, हिंदुस्तान के जिस मनीष के दिमाग में गहरी चोट है उनकी जगह मैं और आप भी हो सकते थे, अगर नहीं संभले तो शायद होंगे। हालांकि सब कुछ ऊपर तक मैनेज है लेकिन फिर भी दैनिक जागरण, अमर उजाला और हिंदुस्तान के मालिकों-संपादकों को मुफ्त की एक सलाह देता हूं कि अपनी इज्जत बचाओ.. तुम्हारे सिपहसालारों ने मुजफ्फरनगर में अखबार गिरवी रख दिया है।

मुजफ्फरनगर से पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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0 Comments

  1. imran.chodhrey

    January 31, 2011 at 2:40 pm

    likhne wale ne bhi patrkaro ka istemaal kar apni dukan chalayi ab uski band ui to dusre ki khul gayi inki aapas ki ladai me pista field me rahnewala mediakarmi hai ek baat aur jo apni dukan chala rahe hai wo jouranlist hai hi nahi unke liye jouranlissm pesa aur apne hith sadhne aur dalali ki dukan chalane ka jaria bhar hai lekin ab patrkar jaag chuka hai aise logo ki jald hi jute se khbar li jaygi satymev jyate

  2. faizan musanna

    January 31, 2011 at 6:55 am

    [b][i]bhai jagna hi hota to sote hi kyon—-patrkaroon ko jagana pani par lakeer khechna barabar hai[/i][/b]

  3. Kuldeep Bhardwaj

    January 31, 2011 at 6:34 am

    ye Patarkaar nahi hai ye to Saamaj ke dalee(DALAL) hai…………….inko bahiskrat karke hum apni iizat bacha saktey hai

  4. Reporter

    January 31, 2011 at 8:16 am

    Lagta hai ki is mahasay ki dukan band ho chali hai, tabhi to is terha se birad rha hai, wrna aakela chana bhad nhi fodta..ye sab jante hai! magar rassi jal gyi pr bal nhi gya ye halat in mahasay ki ho gyi hai! aur hue bhi kyo nhi bhai!!!!!! dal-roti ka jugad bhi hath se jata dikh rha hai to mahasay ji ki puch nhi ho rhi…unko lgta hai ki is marpeet ki ghatna me invitation chapwakr unko bheje taki wo kisi sanshah ki terha waha aaye aur media ke mafia ki terha unko sab salam kre, jo ki sambhav nhi hai;;; jaho bhi jaho, din nikal gya hai

  5. Reporter

    January 31, 2011 at 8:18 am

    Lagta hai ki is mahasay ki dukan band ho chali hai, tabhi to is terha se birad rha hai, wrna aakela chana bhad nhi fodta..ye sab jante hai! magar rassi jal gyi pr bal nhi gya ye halat in mahasay ki ho gyi hai! aur hue bhi kyo nhi bhai!!!!!! dal-roti ka jugad bhi hath se jata dikh rha hai to mahasay ji ki puch nhi ho rhi…unko lgta hai ki is marpeet ki ghatna me invitation chapwakr unko bheje taki wo kisi sanshah ki terha waha aaye aur media ke mafia ki terha unko sab salam kre, jo ki sambhav nhi hai;;; jaho bhi jaho, din nikal gya hai

  6. rakesh sharma

    January 31, 2011 at 8:24 am

    likhne wale ko bhadhae ek dam sahi likha

  7. anil

    January 31, 2011 at 9:04 am

    haan yeh sach hai
    muzaffarnar se ek reporter

  8. sameerkhan

    January 31, 2011 at 10:35 am

    jisne bhi likha chutia ne yah likha……..yah bhasha kisi gandu ki hi ho sakti hai

  9. sameerkhan

    January 31, 2011 at 10:40 am

    kya aap is aartical ke n t nahi coment show karte kya..mujhe to isme bhads media ki hi chaal lagti hai

  10. vineet

    January 31, 2011 at 2:24 pm

    jaago patkaar jaago. ab nahi jaage to kab jaagoge. ye time hai ki sab hamesha ke liye ek ho jao, taaki bhavishya mein doobara aisa na ho sake. ekta mien anekta ka naara buland kar lo bhaiyon.

  11. राजपाल पारवा,शामली

    January 31, 2011 at 6:49 pm

    बिल्कुल सही लिखा बन्धु,ये दल्ले पहले भी ऐसा ही कर चुके है,रालोद नेता के समय से ही यह माल कमाने मे लगे है,इस ज़िले मे मीडिया बहुत मज़बूत रहा है,पर अब इन दल्लो ने दारु और माल के चक्कर मे मीडिया का बहुत नुक्सान कर दिया है,इन दल्लो ने तो शामली तक भी हाथ साफ़ करना शुरु कर दिया है,

  12. lokesh

    January 31, 2011 at 7:32 pm

    जब बोलते हो तो डरते क्‍यों हो।भाई पत्रकारो को जगाने की बात कर रहे हो और खुद अपना नाम और पहचान भी छुपा रहे हो। डरपोक हो। वैसे तुम वही हो जो कभी जागरण में थे और मुजफफरनगर में रहते हुए काफी घोटाले कर चुके हो। अभी जागरण से जाने वालों में किसी के हाथ में लेकर मेरठ से निकल लिए। इस तरह की राजनीति करके मुजफफरनगर में अपने नाम का एक और पत्‍थर लगवाने का इरादा है क्‍या। भइये चाहते क्‍या हो । भडास निकालो जमकर निकालो लेकिन किसी दूसरे पर पर बिना वजह उंगली मत उठाओ क्‍योंकि तुम भी दूध के धुले नहीं हो। गौरे हो, तुम्‍हारा कद कम है। लेकिन यह भी याद रखो कि तुम जागरण में फेल हो गये थे। तुम्‍हे मार्केट से मिलना बंद हो गया तो दूसरे अखबार में घुस में गये यानि हो तो तुम भी बिकाउू ही।

  13. Sarvender Pundir

    February 1, 2011 at 5:27 am

    meri muzffarnagar ke riporters se riquest hai ki Ramesh aur Manish ke sath hui vardat ko laker sabko ekjut ho jana chahiye.

  14. pradeep mahajan

    February 1, 2011 at 9:15 am

    अखिल भारतीय पत्रकार मोर्चा इस तरह के काण्ड की निंदा करता है और अपने पत्रकार भाइयो से उम्मीद करता है की छोटे बड़े को भूल कर संगठित हो जाओ नहीं तो लोग घर पर जा कर भी मारेंगे दोस्तों ,और एक दूसरे पर इल्जाम लगाने से ज्यादा हमें पेन को जेब में और लात को गाण…………में मारने की सोचनी चाहिए ( प्रदीप महाजन -national president – अखिल भारतीय पत्रकार मोर्चा ) http://www.allindiajournalistfront.com .ph -09810310927 telfax 24 x7 011 22013180

  15. एक पत्रकार

    February 1, 2011 at 9:28 am

    छोटे कद के चिकने भाई सफाचट…तुम दलाली की बात कर रहे हो, लेकिन अपने गिरेबां में भी तो झांक लेते. मैंने तो सुना है कि तुमने जागरण में अपने कार्यकाल के दौरान नए चेहरों को मौका देने में भी नोट बटौरे हैं. अबे जिससे पिटे हो अब उसकी की गोद में खेलने की तैयारी है…अबे मियां जिसके दम पे बोल रहे हो वह तो अभी पैदा भी नहीं हुआ है.

  16. संजय झा

    February 1, 2011 at 10:20 am

    दूसरे के जलते हुए घर हाथ सेंकना अच्‍छी परंपरा नहीं है। कौन क्‍या है सबको अच्‍छी तरह पता है। अभी मौका एक दूसरे के खिलाफ टीका टिप्‍पणी करने का नहीं है। हमें एकजुट होकर सामने आई मुसीबत का मुकाबला करना है। इसमें जो साथ नहीं दे सकते वो कृपया चुप होकर तमाशा देखें बकवास करने की जरूरत नहीं है।

  17. B4M

    February 1, 2011 at 10:41 am

    बुद्धिजीवी हुए वहशी
    मुजफ्फरनगर के दो प्रेस फोटोग्राफरों की बुद्धिजीवी कहे जाने वाले वर्ग के कुछ लोगों द्वारा वहशियाना तरीके से पिटाई की गई। समाज के हर तबके ने इसकी निन्दा की है, लेकिन आश्चर्य है कि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाले अपनी ही लड़ाई ठीक से नहीं लड़ पा रहे हैं। इतनी बड़ी घटना होने के उपरान्त ऐसा लगता है कि पत्रकारों की भारी भीड़ होने के बावजूद उनका नेतृत्व करने वाला कोई नहीं, जो पत्रकार दूसरों को न्याय दिलाने के लिये संघर्ष करते हैं वे खुद न्याय प्राप्ति के लिये दिग्भ्रिमित हो मारे-मारे फिर रहे हैं।
    एक सोचनीय स्थिति यह है कि तीस-तीस संस्करण छापने वाले और देश के सबसे पुराना और राष्ट्रीय समाचार पत्र के छायाकारों को भी न्याय नहीं मिलता है, तो छोटे और कस्बाई पत्रकारों की क्या गत बनेगी? बड़ी शर्मनाक स्थिति है कि पत्रकारों में से ही कुछ लोग अत्याचार के विरुद्ध लामबंद होने के बजाय अपने ही लोगों की खामियां निकालकर पत्रकारों ने भड़ास साइट में इस सच्चाई को बेनकाब किया है। उसकी भाषा और तंज पर किसी को ऐतराज हो सकता है, लेकिन इस वास्तविकता को नकारा नहीं जा सकता कि नेतृत्वविहीन पत्रकारों का उत्पीडऩ तथा अपमान हो रहा है, लेकिन तथाकथित नेता शिखंडी बने हुए हैं, जहां तक न्याय दिलाने की शपथ लेने वालों की बात है, उनके लिये तो राहत इन्दौरी का ये शेर ही मौजू है:-
    इंसाफ ही जब जालिमों के हक में जाएगा, ये बात है तो कौन अदालत में आएगा।
    आशीष यादव
    संपादक सच्चाई अभी तक।

  18. Mirza Gulzar Beg (journalist)

    February 1, 2011 at 5:07 pm

    खंजर पे मेेरे लहू है मेरे ही भाई का, इस बार जंग जीतकर पछता रहा हूं मैं।
    ऐसे वक्त में जब सभी पत्रकारों को एकजुट होने की आवश्यकता है, ऐसे में एक दूसरों पर टिप्पणी कर पत्रकार अपने भीतरघात को सार्वजनिक करने में लगे हुए है, जो पत्रकार हित में कतई सही नहीं है। बडी से बडी परेशानी का सामना यदि मिल-जुलकर किया जाये, तो वह बडी नहीं रहती। आज जिस प्रकार से लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर हमले हो रहे हैं और उन्हें दबाने का प्रयास किया जा रहा है यह पत्रकारों के भीतर घात का ही नतीजा है।
    पत्रकार साथियों द्वारा उपर जिस प्रकार से एक-दूसरे पर टीका टिप्पणी की है, वह कतई शोभनीय है। जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, वह एक पत्रकार कतई नहीं कर सकता। कोई भी परिवार व समाज ऐसा नहीं है, जिसमें शिकवे-शिकायत नहीं होती, परन्तु इसका मतलब यह नहीं होता कि हम अपनी संस्कृति व तहजीब को भूल जायें। यदि परिवार व समाज पर कोई हमला होता है, तो ऐसे समय में अपने सभी गिले-शिकवे भूलकर परिवार की इज्जत बचानी की सोचनी चाहिए, न कि पुरानी रंजिशों को ताजा किया जाये।
    मेरी सभी साथियों से अपील है कि वह अपने गिले व शिकवें जरूर करें, परन्तु सभ्यता के दायरे में। अपनी संस्कृति व तहजीब को गिरवी रखकर नहीं। अगर किसी जंग को जीतने के लिए अपने भाइयों का खून बहाना पडे, तो मैं ऐसी जंग को हारना बेहतर समझूंगा। उपर जिस तरह से पत्रकार भाई टिप्पणी कर रहे हैं, उससे लगता है कि यदि पत्रकारिता का यही हाल रहा, तो मुझ जैसा आदमी तो इस प्रोफेशन को तिलांजलि दे देगा। मेरी सभी पत्रकार भाइयों से अपील है कि वह आपस में प्यार, मौहब्बत व सामंजस्य बनाये रखें यह पत्रकार हित में है।
    मिर्ज़ा गुलज़ार बेग
    मुजफ्फरनगर

  19. Mirza Gulzar Beg (journalist)

    February 1, 2011 at 5:20 pm

    [b]खंजर पे मेेरे लहू है मेरे ही भाई का, इस बार जंग जीतकर पछता रहा हूं मैं।
    ऐसे वक्त में जब सभी पत्रकारों को एकजुट होने की आवश्यकता है, ऐसे में एक दूसरों पर टिप्पणी कर पत्रकार अपने भीतरघात को सार्वजनिक करने में लगे हुए है, जो पत्रकार हित में कतई सही नहीं है। बडी से बडी परेशानी का सामना यदि मिल-जुलकर किया जाये, तो वह बडी नहीं रहती। आज जिस प्रकार से लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर हमले हो रहे हैं और उन्हें दबाने का प्रयास किया जा रहा है यह पत्रकारों के भीतर घात का ही नतीजा है।
    पत्रकार साथियों द्वारा उपर जिस प्रकार से एक-दूसरे पर टीका टिप्पणी की है, वह कतई शोभनीय है। जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, वह एक पत्रकार कतई नहीं कर सकता। कोई भी परिवार व समाज ऐसा नहीं है, जिसमें शिकवे-शिकायत नहीं होती, परन्तु इसका मतलब यह नहीं होता कि हम अपनी संस्कृति व तहजीब को भूल जायें। यदि परिवार व समाज पर कोई हमला होता है, तो ऐसे समय में अपने सभी गिले-शिकवे भूलकर परिवार की इज्जत बचानी की सोचनी चाहिए, न कि पुरानी रंजिशों को ताजा किया जाये।
    मेरी सभी साथियों से अपील है कि वह अपने गिले व शिकवें जरूर करें, परन्तु सभ्यता के दायरे में। अपनी संस्कृति व तहजीब को गिरवी रखकर नहीं। अगर किसी जंग को जीतने के लिए अपने भाइयों का खून बहाना पडे, तो मैं ऐसी जंग को हारना बेहतर समझूंगा। उपर जिस तरह से पत्रकार भाई टिप्पणी कर रहे हैं, उससे लगता है कि यदि पत्रकारिता का यही हाल रहा, तो मुझ जैसा आदमी तो इस प्रोफेशन को तिलांजलि दे देगा। मेरी सभी पत्रकार भाइयों से अपील है कि वह आपस में प्यार, मौहब्बत व सामंजस्य बनाये रखें यह पत्रकार हित में है।
    मिर्ज़ा गुलज़ार बेग
    मुजफ्फरनगर
    [/b]

  20. विजय शर्मा

    February 1, 2011 at 6:40 pm

    इस रिपोर्ट को पढकर मन बहुत आहत हुआ है। न अब पहले जैसी पत्रकारिता रही और न ही पत्रकार। पत्रकारिता के बदलते स्‍वरूप का काफी हद तक कडवा सच भी है इस रिपोर्ट में। पूर्वाभास ही कहूंगा जो बीस साल पहले अध्‍यापन जैसे पवित्र पेशे को चुन लिया। वरना, कोयले की दलाली में हाथ तो काले होते ही।

  21. सुनील शाह

    February 1, 2011 at 6:47 pm

    रिपोर्ट सही है या गलत इस बारे में कोई टिप्‍पणी नहीं करुंगा, लेकिन अमर उजाला पत्रकारिता के तीर्थ से कम नहीं है और इसका नाम इस प्रकरण में जुडना बेहद गंभीर है। कई मुद्दों पर अमर उजाला ने प्रतिद्वंद्वियों को भी पत्रकारिता के नैतिक मूल्‍य सिखाए। जब सभी अखबार रुपये लेकर पेड न्‍यूज छापने में मशगूल थे, तब अमर उजाला ने ही असली पत्रकारिता का मुझाहिरा दिखाया। यहां पूरी रिपोर्ट और मिश्रित कमेंट पढने के बाद दुख हो रहा है और अंदर ही अंदर क्रोध भी पनप रहा है। गंभीर अपराध, गंभीर आरोप।
    सुनील शाह

  22. rajesh verma

    February 1, 2011 at 6:53 pm

    bhai likhne wale kyon apni siahi kharch ki. nango ko aur nanga karne se koi fayada nahi.jinke jamir mar chuke wo jinda lash hain ye tathakathit patrakar wahi hai jinka jamir mar chuka.randi ki kadar ganduo ne kho rakhi hai mere bhai pareshan mat ho

  23. मनीष शर्मा

    February 1, 2011 at 7:38 pm

    आरोप लगाना सबसे आसान काम है। ऐसे वक्‍त में एक-दूसरे की टांग खिंचाई करने से बेहतर है कि साथ चलो या अपने काम से काम रखो।

  24. Vijay Chauhan

    February 5, 2011 at 6:28 am

    Yeh baat sach hai ke Jis tarah se Kuch Bade akhbaar patrakarita kar rahe hai woh bilkul bhi theek nahi hai. Baghpat ka hi udhahran le waha sare akhabar sirf RLD ke agent ki tarah kaam kartey hai

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