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दुख-दर्द

जिस जमीन पर उन्‍होंने पौधा लगाया, उससे बार-बार बेदखल किया गया

: स्‍मृति शेष : प्रदीप संगम जी को जानते हुए एक दशक से ज्यादा का समय हो गया होगा। वह मेरे वरिष्ठ साथी थे। पर मेरे मन में उनके लिए विशेष आदर था। सचमुच वह आदरणीय थे। उनको रोल मॉडल बनाया जा सकता था। वह खुद मेहनती थे। साथ उतने ही रचनात्मक भी। पर कुछ ऐसे प्रतिभाशाली होते हैं जिनकी प्रतिभा पर नजर गड़ाने और उसे सम्मानित करते समय सब आंख मूंद लेते है।

: स्‍मृति शेष : प्रदीप संगम जी को जानते हुए एक दशक से ज्यादा का समय हो गया होगा। वह मेरे वरिष्ठ साथी थे। पर मेरे मन में उनके लिए विशेष आदर था। सचमुच वह आदरणीय थे। उनको रोल मॉडल बनाया जा सकता था। वह खुद मेहनती थे। साथ उतने ही रचनात्मक भी। पर कुछ ऐसे प्रतिभाशाली होते हैं जिनकी प्रतिभा पर नजर गड़ाने और उसे सम्मानित करते समय सब आंख मूंद लेते है।

उनके बनाए रास्ते पर शिलान्यास कोई और करता है। पेड़ वह लगाते थे। फल खाने से पहले उनको उस जमीन से ही बेदखल कर दिया जाता था, जहां वह पौधा रोपा गया था। पर फिर भी वह हार नहीं मानते थे। नया पौधा उगाते और फिर से माली की तरह उसके रखरखाव में लग जाते। पर इस बार ऐसा नहीं हो पाया। वह व्यवस्था के सामने बेबस हो गए। किसी से कोई शिकायत नहीं की। जैसा आदेश हुआ मान लिया। वैसे भी वह शिकायत नहीं करते थे या कहिए चुगलखोरी। जो आज की पत्रकारिता का शायद पहला पाठ बन गया है। इसीलिए वह सिर्फ सीढिय़ा गिनते गए सीढिय़ा चढ़ नहीं पाए। सांप और सीढ़ी के खेल में न जाने कितने सांप उनको डस गए।

वह जुनून की तरह करते हैं। हिंदुस्तान में पहले  दिल्ली के रंग नाम से फीचर छपता था। वहीं मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई। फिल्म, कविता, कहानी, संगीत, स्वास्थ्य जैसे विषयों में उनको महारत हासिल थी। वह बड़े विनम्र व्यक्ति भी थे। नए लोगों को मौका देने में उनको एक सुकून मिलता था। हिंदुस्तान की फीचर टीम में हम सभी साथी परिवार की तरह काम करते थे। मेरे कई लेखों पर हैंडिंग उन्होंने ही लगाए थे। एक हेडिंग मैं कभी नहीं भूल पाती। वह है तीन बहनें  तीनों ने पहने सुरताल के गहने। वह बहुत अच्छी हैडिंग लगाते थे। पूरा लेख उनके हैडिंग से चमक जाता था।

जिस दिन उनके पेज में मेरी कवर स्टोरी होती वह लेख के साथ ही साथ पेज को कलात्मक बना देते। अगर उनके टिफिन में कोई ऐसी चीज है जो मैं पसंद करती हूं वह फोन करके मुझे बुलाते। इन सबसे मैं अपने प्रति उनके स्नेह को देख पाती। वह मेरी कविता के पहले पाठक भी होते। मेरे लेख किसी भी अखबार में उनको दिख जाए वह पढ़ते और तुरंत फोन करते। हिंदुस्तान छोड़ देने के बाद भी लगातार हमारा संपर्क बना रहा।

पत्रकारिता में चुनौती का सामना करना मैंने उनसे ही सीखा। अभी कुछ समय पहले ही की बात है सुबह उनका फोन है ग्रीन टैक्नोलॉजी पर लेख चाहिए 2 बजे तक मिल जाना चाहिए। मैंने कहा, इतनी जल्दी लिखना संभव नहीं है। वह बोले, मुझे मालूम है तुम लिखोगी। मैंने वह स्टोरी उनको समय पर दे दी, और वह छपी। उनके साथ जुड़ी कई यादें है लगता है वह मेरे सामने बैठ गुनगुना रहे हैं। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें।

अनुजा  भट्ट

[email protected]

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0 Comments

  1. arun kumar

    June 12, 2011 at 10:11 am

    thanx …..anuja ji

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