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झगड़े का बजट और एजेंडा क्‍या है

नीरवजीकल सुबह-सुबह दरवाजे पर घंटी बजी। मुझे झुंझलाहट हुई कि इतनी सुबह-सुबह कौन मेरे घर सिधार गया। सोचा शायद दूधवाला हो। मैं दूध का बर्तन लिए लपककर दरवाजा खोलता हूं। मगर दिन का भ्रूणावस्था में ही सत्यानाश करनेवाले सज्जन पारंपरिक शैली के दूधवाले नहीं थे। वैसे थे वे भी दूधवाले ही। वे मुझे दूध देने नहीं, बल्कि छठी का दूध याद दिलेनेवाले दुर्दांत किस्म के दूधिए थे।

नीरवजीकल सुबह-सुबह दरवाजे पर घंटी बजी। मुझे झुंझलाहट हुई कि इतनी सुबह-सुबह कौन मेरे घर सिधार गया। सोचा शायद दूधवाला हो। मैं दूध का बर्तन लिए लपककर दरवाजा खोलता हूं। मगर दिन का भ्रूणावस्था में ही सत्यानाश करनेवाले सज्जन पारंपरिक शैली के दूधवाले नहीं थे। वैसे थे वे भी दूधवाले ही। वे मुझे दूध देने नहीं, बल्कि छठी का दूध याद दिलेनेवाले दुर्दांत किस्म के दूधिए थे।

वैसे मैं विश्वासपूर्वक कह सकता हूं कि व्यवहार में हमारे और उनके बीच कभी किसी स्तर पर किसी भी प्रकार के, और किसी भी प्रकार से, दूध नामक पदार्थ का कभी कहीं कोई आदान-प्रदान नहीं हुआ। भले ही तब जब कि हम दूध पीते बच्चे ही क्यों न रहे हों। मगर उन्होंने आते ही एक नितांत पारिवारिक ललकार से मुझे संबोधित किया कि- अगर तूने अपनी मां का दूध पिया है तो उतर नीचे। मैं सोच में पड़ गया कि मां का दूध पीने की नितांत मासूम और वात्सल्य प्रक्रिया झगड़े का कारण कैसे बन सकती है। यू भी शरीफ परिवारों में सामाजिक तौर पर मां के ही दूध पीने का रिवाज है। इनके परिवार की मुझे कोई जानकारी नहीं। फिर ये मुझे क्यों ललकार रहे हैं इसलिए कि मैंने मां का दूध क्यों पिया या फिर इसलिए कि मैंने मां का दूध बचपन में क्यों नहीं पिया। और नहीं पिया तो क्यों नहीं पिया। अब मैं और मेरी मां का दूध एक नितांत व्यक्तिगत, अंतरंग प्रक्रिया भला झगड़े का कारण कैसे बन सकती है, यह सोच-सोचकर मैं गहरे सोच में पड़ गया। आखिर ये हैं कौन दाल-भात में मूसलचंद। हमारी पर्सनल लाइफ में टांग अड़ानेवाले। मगर उनकी रावणी मुद्रा देखकर मुझे अपने पर ही शक होने लगा।

मैं एक अनकहे अपराधबोध से भरने लगा। मैं सोचने लगा कि कहीं बचपन में मैंने अपनी मां के धोखे में इन भाई साहब की मां का दूध तो नहीं पी लिया था, जो आज ये साठ साल पहले हुई दूध की डकैती का हिसाब-किताब करने चले आए हैं। मुझे सोच में डूबा देखकर वे किटकिटायमान मुद्रा में बोले, सोच क्या रहा है। मैंने कहा कि- मैं सोच रहा हूं कि दूधवाला अभी तक क्यों नहीं आया। आ जाता तो चाय के प्याले पर बैठकर, खूब चिंतन करते हुए हम आपके यक्ष-प्रश्न का उत्तर तलाशते। क्योंकि आप भी तो साठ साल पहले की हुई वारदात की अचानक फाइल खोलकर मेरे बयान मांगने चले आए हैं। इतनी फुर्ती से बयान देना मेरे वश की बात नहीं है। ऐसे संगीन मामलों में फटाक से बयान तो पेशेवर गवाह ही दे सकते हैं। सच्चे आदमी को तो काफी सोच-विचारकर ही बोलना पड़ता है। वैसे दूधवाला आ जाता तो अच्छा था। मैंने झगड़े की फाइल को ठंडे बस्ते में डालते हुए कहा।

वह बोला, ‘मैं आपको ललकार रहा हूं और आप चाय की रट लगाए हुए हैं।’ मैंने कहा, ‘यही तो हमारी परंपरा है। हम बड़ी-से-बड़ी समस्या बातचीत से ही सुलझाने में यकीन रखते हैं। चाहे वो कश्मीर समस्या हो या नक्सलवाद की समस्या। हम सभी को बातचीत का आमंत्रण देते हैं। झगड़ा करनेवाले से बातचीत करने का हमारा पुराना रिकार्ड है। हम शांतिप्रिय देश हैं। शांतिप्रय लोग हैं। जो झगड़ा करते हैं मूलतः तो वे भी शांतिप्रिय ही होते हैं। वे तो झगड़ा करके सामनेवाले के संयम और विवेक की छमाही परीक्षा लेते है, कोई सच्ची-मुच्ची में थोड़े ही झगड़ते हैं। झगड़ा करनेवाले से बातचीत के लिए हमारे पास हमेशा टाइम रहता है। बस बातचीत को वह तैयार भर हो जाए। बिना झगड़ा किए कोई हमसे बातचीत करने की धृष्टता करता है तो हमारे सुरक्षा अधिकारी उससे झगड़ कर के बंगले से बाहर फेंक देते हैं। अगर वो दोबारा झगड़ा करने आता है तो इस बार हमारे अधिकारी उसे भीतर जाने देते हैं। यहां अब इसे हमारा पीए अपमानित करता है। उसका फिर पीए से झगड़ा होता है। अगर वो पीए को भी झगड़े में रगड़ देता है तो पीए हमसे आकर कहता है कि कि जेनुइन पार्टी है। इससे आपको जरूर मिलना चाहिए। पीए की रिकमंडेशन पर हम बड़ी गर्मजोशी से उसे अंदर बुलाते हैं, उसे चाय भी पिलाते हैं और उसकी समस्या क्या है, यह जानने का भरपेट प्रयास करते हैं।’

अभी एक सज्जन रोज़ आकर मेरे गार्ड और पीए से झगड़ा कर रहे थे। जब सारे चक्रव्यूह पार करके उन्हें मुझसे मिलने का मौका मिला। हमने उनकी समस्या जाननी चाही तो वह बोला- मेरी तो कोई समस्या ही नहीं है। मैं तो खुद अपने इलाके की समस्या हूं, भैयाजी। आप चाहो तो खुद पता कर लो। मैं तो आपका प्रशंसक हूं और आपके लिए पांच किलो घी लेकर आया हूं। शहर का होता तो मक्खन लेकर आता। गांववाले मक्खन नहीं लगाते। लीजिए, मेरी तुच्छ भेंट स्वीकार कीजिए। वैसे कोई समस्या खत्म करनी हो तो हमें याद कीजिएगा। अपनी घनी मूंछों में वह मुस्कराया। यदि कोई समस्या खड़ी करनी हो तो भी बंदे की सेवाएं लेना मत भूलिएगा। हमारी हुनरमंदी देखिएगा। लगता था कि वो अपने झगड़े के खानदानी कारोबार के जनसंपर्क पर निकले थे। शायद किसी झगड़ा संस्थान के सीईओ जरूर रहे होंगे। कुछ ऐसी ही ठसक और खनक थी उनकी आवाज़ में। बड़े सदभाव के वातावरण में वे विदा हुए।

अब आप समझ गए होंगे कि मैं आपको चाय पिलाने को क्यों इतना आतुर हूं। आप भी शरीफ आदमी हैं। क्योंकि हर झगड़ा करनेवाला हमारी नज़र में शरीफ होता है। और प्रभु कृपा से आपकी तो सूरत भी मियां नवाज शरीफ से काफी मिलती है। क्रोध की हवा से भरे गुब्बारे में मैंने चतुराई की कील चुभा दी थी। और अब क्रमशः उसे दयनीयता की हद तक पिचकता हुआ मैं देख रहा था। जैसे किसी खास प्रबल-प्रचंड प्रतिद्वदी की मुझे घोटाले की फाइल मिल गई हो। और वो साष्टांग दंडवत की मुद्रा में आ जाए। इतनी देर तक दरवाजे पर खड़े-खड़े उस दुर्दांत के पैर भारी होने लगे थे। वह लड़खड़ाकर गिरता, इससे पहले ही दूधवाला आ गया। मैंने कहा- भीतर आइए। सांस उखड़ते मरीज़ की धमनियों में मेरी बातचीत का ग्ल्यूकोज दौड़धूप करने लगा था। उसकी सूरत ऐसी हो गई थी जैसे कोई आतंकवादी सरेंडर के लिए रिरिया रहा हो। वह स्वेच्छा से कमरें में सोफा अरेस्ट हो चुका था।

मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूं। प्रश्न के लाईडिटेक्टर के आगे खड़ा करते हुए मैंने पूछा। वो लड़खड़ाया, बोला- मैं आपसे झगड़ा मोल लेना चाहता हूं। चाय का प्याला उसे थमाते हुए मैंने चाबुक फटकारा- झगड़ा खरीदोगे। अमेरिका हो क्या। या बिन लादेन। या फिर दाउद हो। इससे नीचे के टिटपुंजिए लोग झगड़ा खरीदते नहीं हैं, खुद ही झगड़े में खर्च हो जाते हैं। और झगड़ा भी उन्हें खाली पान मसाले के पाउच की तरह मसलकर, कूड़ेदान में फेंक देता है. बाय द वे झगड़ा मोल लेने का आपका बजट क्या है। वो बोला, आप माफिया हैं क्या। मैंने कहा अभी तो तुम पूछ रहे थे कि मां का दूध पिया। और अब कह रहे हो माफिया।

चलो, छोड़ो, बताओ तुम्हारे झगड़े का एजेंडा क्या है। वह बोला झगड़े का भी कोई एजेंडा होता है। हमने कहा- झगड़ा शुरू होता ही एजेंडे से है। सोशलिस्टपार्टी, प्रजा-सोशलिस्ट पार्टी, जनतापार्टी-भारतीयजनता पार्टी, लोकदल-राष्ट्रीयलोकदल, कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस, द्रुमुक-अन्नाद्रुमुक ये सब एजेंडे के झगड़े की ही फसल हैं। वरना किसने किसकी भैंस खोली है। अब तुम आ गए झगड़ा करने। न तुम्हारे पास झगड़े का कोई बजट है, न झगड़े का कोई एजेंडा। अरे बिना बर्फ के हिमालय मुझे यूं ही स्केटिंग को ललकार रहा है। अरे बिना टायर की काऱ। अरे बिना फन के सांप, मत फुफकार। पहले झगड़े का व्याकरण सीख। बिना झगड़े के पाठ्यक्रम को पास किए बिना तू तो क्या अर्जुन भी कौरवों से झगड़ा मोल नहीं ले पाया था। कृष्णजी की ट्यूशन की कृष्णजी ने झगड़ालौजी की पूरी गीता अर्जुन को समझाई तब कहीं जाकर वह कांपते हाथों से धनुष उठाने को तैयार हुआ।

कृष्णजी अर्जुन की ट्यूशन में बिजी थे तो उधऱ मौका देखकर भीष्मपितामह ने पहले ही परशुराम की कोचिंग इंस्टीट्यूट से झगड़ौलोजी में महारत हासिल कर ली थी। अब ये बताओ कि कौन है तेरा कृष्ण। कौन है तेरा परशुराम। किससे ली है तुमने झगड़े की कोचिंग। उसने फटे-जूते-सा मुंह खोला- सर परशुराम तो क्या कांसीराम की भी ट्यूशन नहीं ले सका हूं, मैं तो। मैंने कहा- फिर रहने दो, झगड़ा तुम्हारे बस की बात नहीं है। और मुझे तो लगता है तुम्हारे खानदान में कभी किसी ने ढंग से किसी से झगड़ा नहीं किया होगा। और तुम चले हो झगड़ा करने। वो भी बिना एजेंडे के। बिना एजेंडे के तो तुम चींटी भी नहीं मार सकते। अरे अब तो चींटी भी पहले एजेंडा तय कर लेती है झगड़े का, तभी सर्वसम्मति से उसके पर निकलते हैं। अब तुम्हारे पर कैसे निकलेंगे। और जब पर निकलेंगे ही नहीं तो वो कतरे कैसे जाएंगे। बिना एजेंडे का झगड़ा तो स्वातःसुखाय झगड़ा भी नहीं होता। हां स्वांतःदुखाय जरूर हो सकता है।

ऐसा करो यदि तुम्हारा अपना कोई एजेंडा नहीं है तो किसी और के झगड़े में शामिल हो जाओ, मैंने राय दी। भाड़े के टट्टू बन जाओ। मेरा मतलब है आदमी नहीं तो तालिबान ही हो जाओ। साड़ी और दाढ़ी के लिए झगड़ जाओ। बिना एजेंडे का झगड़ा तो बिना सूंड का हाथी है। ऐजेंडा हो तो हाथी क्या एक हथिनी ही कई सूरमाओं को साइकिल सहित कुचल देती है। समझे बिना लैंस के चश्में। बिना हाथ के पंजे। बिना दांत के शेर। बिना कांटे की घड़ी, बिना पानी के फब्बारे, बिना हवा के गुब्बारे और बिना बैल के हल, चल बाहर निकल…। बड़ा आया मुझसे झगड़ा करने। मैं उसे तोड़ रहा था, निचोड़ रहा था। मैं गुर्राया- आज तक मैंने एजेंडाविहीन किसी झगड़ालू को चाय नहीं पिलाई। मैंने क्या मेरी सरकार ने भी नहीं पिलाई। मुझे तो लगता है कि तू भारतीय ही नहीं है। वरना इस मुद्देप्रधान देश में तुझे झगड़े का एक टिटरूटूं मुद्दा तक नहीं मिला। अरे भाषा, धर्म, क्षेत्रियता, आरक्षण, मंडल-कमंडल, सैंकड़ों मुद्दे अनाथ भटक रहे हैं देश में कि कोई उन्हें गोद ले ले। और एक तू है..।

अरे तुझसे तो गली के कुत्ते बेहतर हैं जो और कुछ नहीं तो कुतिया को ही मुद्दा बनाकर मोहल्ले में घल्लू घारा मचा देते हैं। बिना एजेंडे के- तूने मां का दूध पिया तो बाहर निकल- टाइप के संवादों से बेटे अब झगड़ा नहीं होता, लोगो को हंसी जरूर आती है। मैं तुझसे इसलिए ये नहीं पूछ रहा कि तूने मां का दूध पिया है या नहीं, अगर पिया है तो उस दूध को मत लजा और मेरी सलाह है कि जाकर पहले मदर डेरी का दूध पी। बाद में किसी से झगड़े की सोचना। तुझे झगड़े का एजेंडा हम सप्लाई करेंगे। मेरा एजेंडा मानेगा तो ठीक, नहीं मानेगा तो झगड़ा अपने आप शुरू हो जाएगा। चल अब निकल पतली गली से…केंचुआ..कोबरा बनने चला था..मैंने उसे भरपूर ललकारा मगर वो तो चिप निकले हुए मोबाइल की तरह निर्जीव हो चुका था।

व्यंग्य लेखक पंडित सुरेश नीरव हिंदी काव्यमंच के लोकप्रिय कवि हैं. 16 पुस्तकें प्रकाशित. 7 धारावाहिकों का पटकथा लेखन. अंग्रेजी, उर्दू, फ्रेंच में अनुवाद. 30 वर्ष तक कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध. छब्बीस देशों की विदेश यात्राएं. भारत के राष्ट्रपति से सम्मानित. आजकल स्वतंत्र लेखन और यायावरी. उनसे संपर्क सुरेश नीरव, आई-204, गोविंद पुरम, गाजियाबाद या मोबाइल नंबर 09810243966 के जरिए किया जा सकता है.

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