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झेल ले बेटा… तू पत्रकार है

इतने में क्या होगा सर… एडिटर के सामने मिमिया रहा था वो… सर पूरे चार लाख खर्चा किए हैं… मास काम में… देखो बेटा समझा करो… तुम अब पत्रकार हो… इतने में इतना ही मिलता है… आज मीडिया इंडस्ट्री बड़े ही बुरे दौर से गुजर रही है… लोगों को नौकरी नहीं मिल पा रही है और तुम सेलरी बढ़ाने की बात कर रहे हो… लेकिन आपको तो मालूम है सर कितनी मेहनत करता हूं मैं…..हां में सब समझता हूं पर…मैनेजमेंट का यही फ़ैसला है,इसमें मैं भी कुछ नहीं कर सकता…

इतने में क्या होगा सर… एडिटर के सामने मिमिया रहा था वो… सर पूरे चार लाख खर्चा किए हैं… मास काम में… देखो बेटा समझा करो… तुम अब पत्रकार हो… इतने में इतना ही मिलता है… आज मीडिया इंडस्ट्री बड़े ही बुरे दौर से गुजर रही है… लोगों को नौकरी नहीं मिल पा रही है और तुम सेलरी बढ़ाने की बात कर रहे हो… लेकिन आपको तो मालूम है सर कितनी मेहनत करता हूं मैं…..हां में सब समझता हूं पर…मैनेजमेंट का यही फ़ैसला है,इसमें मैं भी कुछ नहीं कर सकता…

सर आप तो खुद इतनी बड़ी-बड़ी बातें करते हैं… मुझे क्या मालूम था कि मीडिया में इतना शोषण होता है… देखो बेटा अब तुम स्टूडेंट तो रहे नहीं अब तुम पत्रकार हो… यू आर ए मीडियापर्सन और सैलरी भी अपने आप बढ़ती जाएगी जैसे-जैसे काम होता जाएगा… समझ जाओ,  अब काम पर ध्यान दो… मुंह लटकाए एडिटर के केबिन से बाहर निकल गया वो… सर्दी के मौसम में भी उसे पसीना आ गया… दिमाग में हलचल तेज हो गई… दिमाग 120 की स्पीड से दौड़ने लगा… छोड़ दी जाए मीडिया-विडिया साला सब भौकाल है यहां… दूसरों की आवाज़ बनने की बात करते हैं लेकिन अपनों की आवाज़ को ही दबा देते हैं… खुद अपने लोगों के नहीं तो किसके बाप के होंगे… एक ही पल में न जाने कितने ख़्याल उसके दिमाग में आ रहे थे…  मैं ही पागल था जो मीडिया में आ गया… इससे अच्छा था एमबीए करता कम से कम अच्छी ज़िंदगी तो गुज़ारता… ये बदत्तर ज़िंदगी तो न गुज़ारनी पड़ती…

अपने केबिन में धम्म से बैठ गया… कैंटीन में फोन करके कहा यार राकेश एक चाय भिजवा दो… लगता है अब रिजाइन देने का वक्त आ ही गया है… अगर यहां कुछ दिन और रहा… तो या तो पागल हो जाउंगा या फ़िर भिखारी… सर चाय… यार राकेश तुम्हारी सेलरी बढ़ी कि नहीं… बढ़ती कैसे नहीं सर… मैने तो दिवाली से ही डंडा देना शुरु कर दिया था… यार मुझसे तो अच्छे तुम हो, क्या मतलब सर… कुछ नहीं यार जाओ… दिमाग घूमने लग गया… घरवालों से कब तक पैसा मंगवाता रहूंगा और अगर यही हाल रहा तो… कब तक… आख़िर कब तक चलेगा ये सब… ये कोई काम है… न्यूज़ लिखने वाले में और टाइपिस्ट में क्या फर्क है… लेकिन टाइपिस्ट तो फ़िर भी ज़्यादा पैसा कमा लेता है… खुद से ही सवाल-जवाब कर रहा था वो…

अरे हां कैसे हो तुम, एडिटर उसे देखकर हल्का सा मुस्कुराया… सर आप ये बताइये सेलरी बढ़ाएंगे या नहीं… अरे फ़िर से वही सवाल… यार तुम कैसे आदमी हो एक बार कहे का समझ में नहीं आता तुमको… यार तुम पत्रकार हो समझा करो…सेलरी बढ़ेगी तो सबकी बढ़ेगी… तुम कोई अलग से स्पेशल तो हो नहीं… पर कब सर… कब बढ़ेगी, वही तो मैं जानना चाहता हूं… देखो बेटा तुम शायद ग़लत फील्ड में आ गए… पत्रकारों को पहले-पहल इतना ही मिलता है… मुझे देखो डेढ़ सौ रुपए से शुरुआत की थी… आज कई सालों बाद भी कुछ हासिल नहीं है… अब मीडिया का नशा है तो झेलो… सर इसी चक्कर मैं तो मार खा गया… अब बहुत पछता रहा हूं… मुझे लगता है कि कुछ नहीं होने वाला… अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं… तुम तो समझदार हो… झेल लो.. जब तक झेल सकते हो…

सच… कब… अभी जाता हूं… क्या हुआ सर इतने उदास क्यों बैठे हो… कुछ नहीं… बस ऐसे ही तुम बताओ… सर मैने सुना है कि कुछ लोगों की सेलरी में कटौती कर दी गई है जिनमें पहला नंबर आपका है… तुम्हे कैसे मालूम… सर अब ये बात छिपती थोड़े ही हैं… अरे पर तुम्हारी तो बढ़ गई न… यस सर… अरे सर कोई बात नहीं आप तो इतने बड़े पद पर हो… झेल लो… आख़िर आप भी तो पत्रकार हो… कह कर मुस्कुराता हुआ कैबिन से बाहर निकल गया वो…

लेखक इंतिखाब आलम अंसारी नोएडा में टीवी पत्रकार हैं.

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0 Comments

  1. Nitesh Mishra

    June 21, 2011 at 12:27 pm

    sir ji badi behtar sthiti banakar sab kuchh kah gaye aap…. par kya kare in sabka media maliko par koi asar nahi padta…..

  2. bebas patrakar

    June 21, 2011 at 3:57 pm

    ye to ETV channel kee kahani hai

  3. johnsujju

    June 22, 2011 at 4:49 am

    सरजी मीडिया में सैलरी आराम से बढती है……….ऐसा नहीं होता की जॉब पर लग गए और २-४ महीने मेही २-३ लाख्स महीने का मिलना शुरू हो जाए………….

  4. raj bharti

    June 22, 2011 at 5:31 am

    यह इस खोखली मीडिया का सच है। कौन अपने को पत्रकार समझता है, काहे का पत्रकार भाई, ये सब बनिए की दुकानें हैं और काम करने वाले नौकर। दो किलो चीनी, आधा पाव बेसन और कुछ सूखी हल्दी ही गांठे तोलते रहो और झेलते रहो। खोखले और कमजोर।

  5. reporterarvind

    June 22, 2011 at 7:58 am

    in sab ko media industri nahi , MEDIA MANDI kahna chahiye

  6. amitvirat

    June 22, 2011 at 10:07 am

    padega jab in haraamjadon ko kaam karne wale log nahin mileinge tab inki haikdi gayab hogi

  7. Naresh

    June 23, 2011 at 5:13 am

    bahut khub likha aapne, media ki sachchai sabhi logon ko pata chalni chahiye, kitna shoshan hai is dhandhe me.

  8. anurag.

    July 17, 2011 at 11:14 am

    jab dam nahi kam pasie me gujara karne ka to kya yahan ragad rahe ho…………..aalochna karne walon doosra dhandha dhoondh lo………………..

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