छत्तीसगढ़ में श्रमजीवी पत्रकार संघ का अध्यक्ष बताकर हेराफेरी करने के आरोप में जेल भेजे गए नारायण शर्मा के बारे में खुलासा हुआ है कि उन्हें पूर्व डीजीपी विश्वरंजन ने साजिश रचकर जेल भिजवाया है. नारायण शर्मा ने विश्वरंजन तथा उनकी टीम के सिपहसालारों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था. इसी से नाराज विश्वरंजन ने पत्रकारों के पुराने आपसी झगड़े की आड़ लेकर नारायण शर्मा को निपटा दिया.
जानकारी के बाद जो तथ्य खुलकर सामने आए हैं, उसमें नारायण शर्मा ने अपनी वेबसाइट तथा पत्रिका में विश्वरंजन तथा उनकी टीम के खिलाफ अभियान छेड़ रखा था. इन लोगों के कई कारनामों को प्रकाशित किया था. वे अपनी ऑल इंडिया न्यूज सर्विस (ains.in) और पत्रिका ‘बिल्ड इंडिया’ में इन लोगों के खिलाफ मुहिम चला रखी थी. बताया जा रहा है कि इसमें इनको कुछ नेताओं और अधिकारियों का भी शह प्राप्त था. इधर, डीजीपी विश्वरंजन के तबादला का फरमान राज्य सरकार ने सुना दिया. बताया जा रहा है इसी से कुपित विश्वरंजन ने अपना हिसाब चुकता करने के लिए नारायण शर्मा के मामले में कमजोर कड़ी खोजी तथा पहले से चल रहे विवाद को नए सिरे से करवाकर नारायण शर्मा को जेल में डलवा दिया. उन पर धोखाधड़ी की धाराएं 419, 420, 467, 468, 471, 409, 511 लगाया गया. अब बताया जा रहा है कि उनके परिजनों को भी उनसे मिलने नहीं दिया जा रहा है.
आरोप है कि पुलिस ने पत्रकारों के संगठन के जिस विवाद का सहारा लिया वो तीन-चार साल पुराना है. वर्ष 2005 में छत्तीसगढ़ श्रमजीवी पत्रकार संघ के नाम से श्रम विभाग में एक पंजीयन क्रमांक 163 कराया गया. तब इसके अध्यक्ष विद्याशंकर शुक्ला और महासंचिव योगराज भटिया बने. इसके बाद इस संगठन के अध्यक्ष सी.के.त्रिवेदी और महासचिव अरविंद अवस्थी नियुक्त हुए. यह छत्तीसगढ़ श्रमजीवी पत्रकार संघ प्रदेश में के विक्रम राव के संगठन इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन (आईएफडब्ल्यूजे) से संबद्ध हो गया. वर्ष 2007 में आईएफडब्ल्यूजे के अध्यक्ष के.विक्रम राव ने छत्तीसगढ़ श्रमजीवी पत्रकार संघ का अध्यक्ष नरायण शर्मा को बना दिया. श्री शर्मा ने संगठन का कार्यभार और हिसाब-किताब सी.के.त्रिवेदी और अरविंद अवस्थी से मांगा, परन्तु इन लोगों ने विवरण नहीं दिया, जिसका विवाद श्रम न्यायालय में चल रहा है. फरवरी वर्ष 2008 में छत्तीसगढ़ श्रमजीवी पत्रकार संघ की राजनीति ने फिर पलटा खाया. के विक्रम राव ने सी.के.त्रिवेदी और अरविंद अवस्थी को फिर से बहाल कर दिया. अब इन पदाधिकारियों ने श्री शर्मा से हिसाब मांगना शुरू कर दिया. इसके बाद पत्रकारों के दोनों धड़ों के बीच पंजीयन क्रमांक 163 को लेकर विवाद न्यायालय में चल रहा है.
नारायण शर्मा पर लगाए गए आरोप मुताबिक उन्हों ने 2008 में छत्तीसगढ़ श्रमजीवी पत्रकार संघ के नाम से लेटर में अपने आपको अध्यक्ष बताकर शासन से पत्रकारों को गोवा टूर ले जाने की बात कर और विज्ञापन के लिए 5 लाख 92 हजार 5 सौ रुपये प्राप्त कर लिया था. इस रुपये का हिसाब भी नहीं दिया गया. नारायण शर्मा द्वारा इसी लेटरहेड से अपने आपको अध्यक्ष बताकर फिर से शासन को श्रमजीवी पत्रकार संघ के लिए पत्रकार जगत नाम से पत्रिका के प्रकाशन के लिए 5 लाख, विज्ञापन के लिए 5 लाख व टेलीफोन डायरेक्टरी के लिए 2 लाख की मांग की गई थी, इसके अलावा वेबासाइट भी शुरू कर शासन की योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए 5 लाख रुपये की मांग की गई थी. जबकि इस बारे में नारायण शर्मा के पक्ष का कहना है कि वो कभी गोवा गए ही नहीं और जिस राशि की बात चेक क्रमांक 128057 की कही जा रही है, वो नमन एविएशन को दी गई थी.
मामला तब से बिगड़ना शुरू हुआ जब नारायण शर्मा ने मई के अंक मं डीजीपी विश्वरंजन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. डीजीपी जुलाई माह में विश्वरंजन के तबादले के तुरंत बाद खारखाई आईपीएस लाबी का प्रभावशाली गुट सक्रिय हो गया. एडीजीपी डीएम अवस्थी ने रायपुर के सिविल लाइन थाने में एक रिपोर्ट लिखाई कि वेब मीडिया एआइएनएस द्वारा उनका आपराधिक तरीके से अपमान किया गया है. इस रिपोर्ट पर तुरंत आईटी सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम की धारा 66 के तहत जुर्म दर्ज कर लिया गया. जबकि कानूनन डीआईजी स्तर के अधिकारी की बिना जांच के पत्रकार पर जुर्म दर्ज नहीं हो सकता, पर यहां पर नारायण शर्मा के खिलाफ मामला दर्ज हुआ. आनन-फानन में सिविल लाइन पुलिस ने शर्मा के कार्यालय के कम्प्यूटर की जब्ती बनाई और उनसे कहा कि छोटा सा जमानती मामला है, थाने चलिए. यहां पर बयान दर्ज करने के बाद उन्हें डीएम अवस्थी की इस रिर्पोट पर छोड़ दिया गया क्योंकि यह मामला जमानती था.
इसी बीच कोतवाली पुलिस को श्रमजीवी पत्रकार संघ के विवाद का ध्यान आया और विरोधी धडे़ के श्रमजीवी पत्रकार संगठन के प्रदेश अध्यक्ष अरविन्द अवस्थी की रिपोर्ट पर थाने में गैर जमानती अपराध दर्ज किया गया. इस में संघ के पंजीयन क्रमांक 163 के इस्तेमाल बाबत पुराना मामला न्यायालय में चल रहा था, पर पुलिस ने इस पर नया लेबल लगाकर शर्मा को फिर उसी दिन थाने बुलाया. शर्मा को इस मामले की जानकारी नहीं दी गई, जैसे वे थाने पहुंचे उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. फिर उनकी कोर्ट में पेशी हुई. ऐसे कोर्ट में पेश किया गया जिसे गैर जमानती मामले को सुनने का अधिकार ही नहीं था, लिहाजा उन्हें जमानत नहीं मिल पाया.












kamal shukla
July 25, 2011 at 6:48 pm
दस बारह दिन पहले भ्रष्ट्राचार और धोखाघड़ी के आरोप में जेल गए अपने साथी के बारे में सफाई खोजने में बहुत देर कर दी अपने , बड़ा लेट चैनल है आपका
manoj sharma
July 31, 2011 at 2:34 pm
आपकी वेब ने देर से ही सही लेकिन सच सामने लाया, इसके लिये आप बधाई के पात्र हैं|यहां छत्तीसगढ में हम पत्रकार सरकार के खिलाफ मुंह खोलने की स्थिति में नहीं हैं|पत्रकारों की गोली मार कर हत्या के दो मामले हो चुके है |आरोपी नहीं पकडे गये फिर भी हम खामोश हैं|पत्रकारों पर आईटी एक़्ट के तीन मामले बिना जांच के दर्ज हो गए, किसी की हिम्म्त नहीं कोई कुछ बोल दे| भाई नारायण शर्मा को फर्जी मामला कायम कर पन्द्रह दिन से जेल में डाला कर रखा गया है|उनके लिये लडना तो दूर की बात छत्तीसगढिया पत्रकारो के लिये चैलेंज है कि वे जेल में उनसे मुलाकात करके तो बता दें| बताते हैं जेल प्रशासन पर भारी दबाव है सरकार चलाने वाले अफसरों और नेताओं का|ऐसे आप की रिपोर्ट यहां के कलमकारों को जगाने के शायद काम आए|
B4M
August 1, 2011 at 5:48 am
भाई साहब सादर अभिवादन ,
छत्तीसगढ़ के २००० से भी जादा पत्रकार साथियों की भावनाओ से आपको अवगत करा रहा हु नारायण शर्मा छत्तीसगढ़ श्रमजीवी पत्रकार संघ का कभी सदस्य नहीं रहा पदाधिकारी होने का तो सवाल ही नहीं है संघ के नाम का दुरूपयोग कर अधिकारियो नेताओ को लगातार ३ साल से ब्लेकमेलिंग कर रहा था और अपने दुष्कर्म का दंड भोग रहा है
आपको किसी ने गलत जानकारी देकर आपके साइड में गलत समाचार जारी कराया गया है आप ये आदमी अगर पत्रकारों का नेता होता तो छग के पत्रकार खोमोश नहीं रहते ,सरे समाचारों ने इक साथ इनके फर्जीवाडा को प्रकाशित किया आप हमारे साइड पर देख सकते है सारी सच्चाई आपको समझ आ जाएगी ,
पुनः सादर अनुरोध के साथ