
स्वर्गीय शशि भूषण
On this Occasion, foundation had also announced the name of the winner of first ‘Shashi Bhushan Smiriti Natya Puraskar’ constituted by the Foundation. First award has been given to hrishikesh Sulabh.
Mrityunjay Prabhakar
Shashi Bhushan Foundation
पहला ‘शशि भूषण स्मृति नाट्य पुरस्कार’ हृषीकेष सुलभ को
विगत वर्ष 4 नवंबर, 2009 को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) की लापरवाही की वजह से काल के क्रूर हाथों ने पटना के एक प्रतिभाशाली रंगकर्मी शशि भूषण वर्मा को हमसे छीन लिया। शशि तब रानावि में प्रथम वर्ष के छात्र थे। इलाज में लापरवाही और अस्पताल प्रशासन की चूक की वजह से हमें इस विलक्षण प्रतिभा से वंचित होना पड़ा। रानावि में दाखिला लेने के पूर्व शशि का रंगमंचीय सफर लगभग बीस सालों का था। वह बचपन में ही रंग आंदोलन में शामिल हुए और तमाम आर्थिक, सामाजिक दिक्कतों के बावजूद उन्होंने अपने रंगमंचीय सफर को निरंतर जारी रखा। अपने बीस साल के रंगमंचीय सफर में शशि की बीहड़ प्रतिभा ने कई मुकाम पार किए और दुर्द्धष संघर्ष की वह जीवटता दिखलाई जो बहुत कम ही रंगकर्मियों में दिखलाई पड़ती है। बिहार की तपती जमीन से शुरू हुआ उनका रंगमंचीय सफर पटना, गया, मसौढ़ी, नौबतपुर जैसे इलाकों और गांव-ज्वार तक फैले खेत-खलिहानों से निकलकर गोवा, रायगढ़, कोलकात्ता, जयपुर, दिल्ली, मुंबई जैसे देश के बड़े शहरों तक गतिमान रहा। उसकी रंगमंचीय प्रतिभा एक साथ कई क्षेत्रों में सक्रिय रही। निर्देशन, अभिनय, संगीत, गायन, वाद्य आदि तमाम रंगमंचीय अवयवों में वह एक साथ सिद्धहस्त थे इसलिए उसकी पहचान एक संपूर्ण रंगकर्मी की थी। अफसोस की हमें इस संपूर्ण रंगमंचीय व्यक्तित्व से असमय ही वंचित होना पड़ा।
शशि भूषण वर्मा की स्मृति में उसके मित्रों, सहकर्मियों और रंगकर्मियों ने शशि भूषण फाउंडेशन की स्थापना की है जिसका एकमात्र मकसद शशि के रंगमंचीय अवदान को उसके पार्थिव शरीर की तरह काल कलवित होने से बचाना और उसके रंगकर्म की आकांक्षा को निर्बाध रूप से जारी रखना है। फाउंडेशन की ओर से उसकी जन्मतिथि (18.07.1975) पर आयोजित पावस नाट्य महोत्सव में हर साल उसके निर्वाण दिवस (04.11.2009) को शशि स्मृति दिवस के रूप में याद रखने और एक नाट्य लेखक को ‘शशि भूषण स्मृति नाट्य पुरस्कार’ की घोषणा करने की बात की गई थी। नाट्य लेखक को पुरस्कृत करने का हमारा एकमात्र मकसद हिंदी रंगकर्म में हो रहे नए नाटकों के अभाव को दूर करना है। इस पुरस्कार के तहत नाट्य लेखक को 11,000 रुपये की राषि, एक शाल और एक स्मृति चिन्ह प्रदान किया जाएगा। यह पुरस्कार हर साल 18 जुलाई को शशि की जन्मतिथि पर नाट्य लेखक को प्रदान किया जाएगा और उसी दिन लेखक के नाट्यलेख की प्रस्तुति भी की जाएगी। पुरस्कारों की घोषणा हर साल उसके निर्वाण दिवस 04 नवंबर को की जाएगी।
पहले शशि स्मृति दिवस के अवसर पर हमें आपको यह सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आज 04 नवंबर 2010 को पहले शशि स्मृति दिवस के अवसर पर कालिदास रंगालय, पटना में पहले ‘शशि भूषण स्मृति नाट्य पुरस्कार’ की घोषणा की गई । यह सम्मान हिंदी के चर्चित नाट्यलेखक, रंग समालोचक और कथाकार हृषीकेष सुलभ को प्रदान किया गया।

ह्षीकेष सुलभ
रंगमंच से गहरे जुड़ाव के कारण कथा लेखन के साथ-साथ नाट्य लेखन की ओर उन्मुख हुए और भिखारी ठाकुर की प्रसिद्ध नाट्यशैली बिदेसिया की रंगयुक्तियों का आधुनिक हिन्दी रंगमंच के लिए पहली बार अपने नाट्यालेखों में सृजनात्मक प्रयोग किया। पहले ही नाटक अमली को देश भर में व्यापक सफलता मिली। विगत कुछ वर्षों से आप कथादेश मासिक में रंगमंच पर नियमित लेखन कर रहे हैं। देश के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण नाट्यसमारोहों में आपके नाटकों का मंचन। नाटक बटोही का राष्ट्रीय नाट्यविद्यालय, दिल्ली के रंगमंडल द्वारा मंचन। पत्थरकट, बँधा है काल, वधस्थल से छलाँग, तूती की आवाज़ और वसंत के हत्यारे शीर्षक से कथा-संकलन तथा अमली, बटोही और धरती आबा मौलिक नाटक, माटीगाड़ी (शूद्रक रचित मृच्छकटिकम् की पुनर्रचना) और मैला आँचल (फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास का नाट्यांतर) तथा तीन रंग नाटक शीर्षक नाट़य संकलन प्रकाशित। इनके अलावा रंगचिन्तन की पुस्तक रंगमंच का जनतंत्र प्रकाशित तथा रंग-अरंग शीघ्र प्रकाश्य। अमली के प्रथम मंचन के पच्चीस साल पूरा होने पर हाल ही में नया संस्करण प्रकाशित। कथा-लेखन के लिए इस वर्ष कथा यूके, लंदन के अन्तर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा-सम्मान से ब्रिटेन के हाउस ऑफ कामन्स में सम्मानित। कथालेखन के लिए ही बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान तथा नाट्य-लेखन एवं नाट्यचिंतन के लिए डा. सिद्धनाथ कुमार स्मृति सम्मान प्राप्त।
मृत्युंजय प्रभाकर
शशि भूषण फाउंडेशन












vijay pandey
November 7, 2010 at 4:51 am
main is aawsar ka pratayakhh darsi tha…….sasahi mere sahkarmi the, aur unko yaad kerna hum logo ka kartavya hai….saath hi sulabh bhaiya ko hardik badhai……
is poore ghatnakram me randhir ke yogdan ko nahi bhulaya ja sakta……