स्थानीय संपादक, पॉयनियर हिंदी, लखनऊ…महोदय… हालात ऐसे हो गये हैं कि मैं आपके अखबार से इस्तीफा देने के लिए बाध्य हूं। मैंने आपके यहां 16 दिसंबर तक काम किया है, इसका मेहनताना दिलवाने की कृपा करें। यहां एक फिर स्पष्ट कर दें कि यह आपके द्वारा पैदा किये गये हालात हैं, जो कि मुझे नौकरी छोड़ने जैसे अतिवादी कदम को उठाने के लिए विवश कर रहे हैं।
आपने लगातार दो महीनों तक खटाया और उसके बाद जब साप्ताहिक अवकाश तय हुआ तो एक साथी के अवकाश वाले दिन अनुवाद पर पूरी तरह से आधारित दो पेजों यानी एडिट पेज और ओपेड का जिम्मा पूरी तरह से दो लोगों पर आ जाता था और आपके एसोसिएट एडिटर श्रीमान रामसागर वीकएंड पर निकलने वाले रंगीन पन्नों का पूरा अनुवाद तीन भले लोगों से करवाने के लिए निरंतर दबाव बनाते रहते थे। गुजरे शक्रवार को तो हद हो गयी। श्रीमान रामसागर टहलते और दबाव बनाते हुए कह रहे थे कि मुहर्रम के अवकाश वाले दिन घर से अनुवाद करके लाने के लिए मैटर ईमेल कर देंगे। ऐसे हालात में दिमागी संतुलन भी अगर बिगड़ जाये तो हैरत की बात नहीं।
: एक बेहद मामूली लेकिन बेहद अहम बात : बिल्कुल शुरू में ही मैंने आपसे गुजारिश की थी कि कंप्यूटर और कीबोर्ड के बीच की दूरी अत्यंत कम है और आंखों पर बहुत जोर पड़ रहा है तो आप मेहरबानी करके कीबोर्ड रखने के लिए स्लाइडर लगवा दें। हमारी इस वार्ता को रिपोर्टिंग टीम के साथी भी सुन रहे थे और आपके जबाब को सुनकर हैरान रह गये। एक साथी ने तो यहां तक कह दिया कि कामता जी, हम मुलाजिम हैं और मुलाजिम की औकात मालिक की नजर में बेजान कंप्यूटर से भी कम कम होती है। इस पर आपका कहना यह था कि अंग्रेजी पॉयनियर में भी कीबोर्ड रखने का जो स्लाइडर रखा है उसे भी आप हटवा देंगे।
लकड़ी से भी कठोर कुर्सी पर बैठकर जो हठयोग मैंने किया उसका नतीजा यह निकला कि मेरे कंधे निरंतर दर्द करने लगे और रीढ़ की हड्डी में भी दर्द है। मैं चाहूंगा कि मेरा पारिश्रमिक का चेक मेरे घर भिजवा दिया जाये। एक हजार रुपये आपके एचआर ने एकाउंट खुलवाने के लिए लिए थे, उसे भी वापस करवा देंगे तो बड़ी कृपा होगी।
भवदीय
कामता प्रसाद












alok ojha
December 20, 2010 at 5:29 pm
ye ramsagar hai hi dogy. vijay prakash ka. 20 saal se journalism ke bahar tha. thakurwad ke chalte vijay ise le aaye aur apna bantadhaar karwa baithe. is aadmi ko tameej hi nahi hain. translater hain. vijay ji ko abhi samajh nahi aa raha hain jab hosh aayega der ho chuki hogi. kai achhe log to jansandesh chale gaye.
kamlesh
December 23, 2010 at 12:20 pm
;D;D;D;D;D
raj
December 23, 2010 at 2:00 pm
inhe ghar se nikala ja raha hai, charago se ujala ja raha hai, khuda mahfooz rakkhe es chaman [ pioneer] ko, yaha patjhar ka mausam aa raha hai