: ब्लिट्ज वाले संपादक रूसी के. करंजिया और करेंट वाले अयूब सईद की कहानी आउटलुक वाले विनोद मेहता की जुबानी : मुंबई-दिल्ली की मीडिया के दलदल में किनके किनके पैर कीचड़ से सने, कीचड़ में धंसे हैं, इसको लेकर अफवाह और कयासों का बाजार खूब गर्म रहा करता है, समय-समय पर. नीरा राडिया प्रकरण ने इस अफवाह मार्केट में जोरदार इजाफा किया. विदेशों में धन-संपत्ति, फ्लैट आदि होने की खबरों के अलावा तरह-तरह से वरिष्ठ पत्रकारों को ओबलाइज किए जाने के ढेरों किस्से बताए गए.
नीरा राडिया प्रकरण से भी पहले कुछ चर्चाएं बहुत तेज थीं. मसलन एक टीवी जर्नरिस्ट के पास इतनी ब्लैकमनी है कि वह ढेरों कांप्लेक्स, माल, मार्केट आदि में पार्टनर बन चुका है. कुछ पत्रकारों-संपादकों के पास कोल माइन्स, सोने की खदान, पावर प्लांट आदि होने की जानकारी हुई. हथियारों के सौद में दलाली खाने वाले संपदाकों के नाम भी चर्चा में रहे. एपार्टमेंट और हेलीकाप्टरों की खरीद बिक्री कराने वाले भी पत्रकार रहे जो अरबपति होते गए. उपरोक्त कृत्य-कुकृत्य करने वाले किसी एक भाषा के जर्नलिस्ट नहीं, बल्कि सबसे ज्यादा अंग्रेजी फिर अन्य भाषाओं के है. जिनके पास ये सब होने या जिनके इन सब कामों में लिप्त होने की बात बताई गई, वे लोग काफी महान और वरिष्ठ पत्रकार माने जाते हैं. पर इन सबके कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिले, और प्रमाण हैं भी तो सीधे तौर पर नहीं. मान लीजिए किसी के परिजन ये सब करते हैं तो आप कैसे कह सकते हैं कि वह संपादक महोदय का ही किया धरा है. तो बचने की गुंजाइश के कारण लोग बच निकलते हैं. पर इससे उनके दाग नहीं धुल जाते और न ही चेहरे की लीपापोती कम होती है.
वर्ष 1991 में उदारीकरण के जिस दौर की शुरुआत हुई, उसमें मीडिया वालों की सेलरी कई गुना बढ़ी, पहुंच बढ़ी, एडिशन्स बढ़े, चैनलों की दर्शक संख्या बढ़ी, लेकिन पत्रकारीय नैतिकता तेल लेने चली गई. मूल्यों और सरोकारों का पतन इतना गहरा व तीखा था कि अब कोई मिशन और सरोकार की बात नहीं करता. ज्यादातर ने चुपचाप और कुछ ने हो-हल्ला करते हुए मान लिया है कि ये तो ऐसे ही चलेगा क्योंकि बाजार ऐसा ही कहने को कह रहा है और बाजार के बाहर होने का मतलब है मौत और मौत चाहिए नहीं, सो यही सही, भले ही समाज व देश सामूहिक मौत को गले लगा ले पर निजी मौत बर्दाश्त नहीं, किसी एक चैनल या अखबार की मौत बर्दाश्त नहीं सो यही सही, यही पतन सही, यह कुकृत्य सही, यह सब चलेगा, यह सब ठीक है, यह सब मौके की नजाकत है, जो बाजार के विरोध में हैं, वे सड़क छाप हैं, वे फटेहाल लोग हैं, वे मजबूरी में बाजार को गालियां दे रहे हैं आदि इत्यादि किस्म के तर्क-कुतर्क.
खैर, हम लोग बात करने बैठे थे उन दो संपादकों के बारे में जो खाली सूटकेसों के साथ विदेश जाया करते थे. ये दोनों संपादक इन दिनों इस दुनिया में नहीं है. वे भगवान को प्यारे हो गए हैं. सो उनके बारे में बात करना कितना ठीक रहेगा या गलत, यह हम-आप सोच सकते हैं लेकिन आउटलुक के प्रधान संपादक विनोद मेहता ने बात कर दी है. उन्होंने साप्ताहिक मैग्जीन के स्तंभ में नामों को एनाउंस करते हुए काफी कुछ लिखा-बताया है. उनके कहे लिखे का सार संक्षेप इस तरह है.
ब्लिट्ज के संपादक रूसी के करंजिया और करेंट के अयूब सईद. ये महान और प्रख्यात संपादक. ये लोग सालाना दौरा करते थे त्रिपोली का. जहां वे गद्दाफी से उनके टेंट में मिला करते थे. विनोद मेहता याद करते हुए लिखते हैं- अयूब ने बताया था कि जब वे गद्दाफी से मिलने जाते थे दो दो खाली सूटकेस ले जाना नहीं भूलते और लौटते में एक दिन के लिए ज्यूरिख जरूर ठहरते. रूसी ज्यादा धूर्त था, सो वह कुछ स्वीकारता बताता नहीं था. लेकिन यह सच है कि वह यह सालाना तीर्थ करना नहीं भूलता था और भरापूरा होकर लौटता था. उस दौर में केवल ये ही दो पत्रकार संपादक थे जो गद्दाफी से सीधे संपर्क में रहा करते थे. इन्हीं में से एक महोदय ने इंदिरा गांधी तक गद्दाफी का संदेश पहुंचाया था कि लीबिया को बम बनाने की तकनीक दो, बदले में भारत को कभी तेल की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा.












Anil Saxena
March 15, 2011 at 4:44 am
Shayad isee liye us jamane mey “Peet Patrakarita” Shabd ka janm hua tha. Kisi bhi tabloid saaptahik ko “Peet Patrakarita” ka labada pehna diya jata tha. Aaj ke jamane mey yeh baat koi nai nahi lagti, na hi aashcharye hota hai.
shubham-Raghav austraila
March 14, 2011 at 11:14 am
shem! shem!! sashter kranti lani hogi…kranti