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पत्रकारिता छोड़ अब खेती करने जाएंगे यशवंत भटनागर

: चीफ सब एडीटर यशवंत ने अजमेर भास्कर से किया राम-राम : उधेडबुन के एक लंबे दौर के बाद आखिर यशवंत भटनागर ने दैनिक भास्कर, अजमेर छोड़ दिया। 24 दिसंबर 2010 को इस्तीफे की एक महीने की मियाद पूरी हो गई और वे सिटी डेस्क इंचार्ज का अपना काम पूरा करने के साथ ही साथियों से राम-राम कर आए। यशवंत ने इस्तीफा क्यों दिया, सवाल यह नहीं है? सवाल यह है कि उन्होंने अब तक इस्तीफा दिया क्यों नहीं था? और इस सवाल के जवाब में हमारे सामने वह सारा सच फिर रिवाइंड हो जाएगा जो ‘भड़ास’ पर हम रोज पढ़ते हैं। दैनिक भास्कर में तेरह साल की चाकरी, चीफ सब एडीटर से आगे पदोन्नति नहीं, शाम चार बजे से सुबह चार बजे तक की नौकरी, छुट्टियों का कोई अता-पता नहीं, कभी भी- कहीं भी तबादले की तलवार और छंटनी का खौफ और तनख्वाह सिर्फ 19 हजार जो सालाना वेतनवृद्धि से बढ़ते-बढ़ते इस आंकडे़ तक पहुंची थी।

: चीफ सब एडीटर यशवंत ने अजमेर भास्कर से किया राम-राम : उधेडबुन के एक लंबे दौर के बाद आखिर यशवंत भटनागर ने दैनिक भास्कर, अजमेर छोड़ दिया। 24 दिसंबर 2010 को इस्तीफे की एक महीने की मियाद पूरी हो गई और वे सिटी डेस्क इंचार्ज का अपना काम पूरा करने के साथ ही साथियों से राम-राम कर आए। यशवंत ने इस्तीफा क्यों दिया, सवाल यह नहीं है? सवाल यह है कि उन्होंने अब तक इस्तीफा दिया क्यों नहीं था? और इस सवाल के जवाब में हमारे सामने वह सारा सच फिर रिवाइंड हो जाएगा जो ‘भड़ास’ पर हम रोज पढ़ते हैं। दैनिक भास्कर में तेरह साल की चाकरी, चीफ सब एडीटर से आगे पदोन्नति नहीं, शाम चार बजे से सुबह चार बजे तक की नौकरी, छुट्टियों का कोई अता-पता नहीं, कभी भी- कहीं भी तबादले की तलवार और छंटनी का खौफ और तनख्वाह सिर्फ 19 हजार जो सालाना वेतनवृद्धि से बढ़ते-बढ़ते इस आंकडे़ तक पहुंची थी।

यशवंत की पत्रकारिता की शुरूआत सन 1982 में दैनिक रोजमेल से हुई। इसके बाद आधुनिक राजस्थान, दैनिक न्याय, दैनिक नवज्योति के बाद सन 1997 में दैनिक भास्कर का दामन थाम लिया। कुल मिलाकर सक्रिय पत्रकारिता में अठाइस साल निकाल दिए। हर पेज पर और हर डेस्क पर काम किया। शुरू से संपादन में रहे इसलिए रिपोर्टिंग से वास्ता नहीं रहा। रोजमेल, नवज्योति और भास्कर तीन अखबारों में अपन और यशवंत साथ-साथ रहे। कई दफा तो एक ही डेस्क पर, इसलिए दावे के साथ कह सकता हूं कि यशवंत जैसा सीधा-सज्जन, अपने काम से काम रखने वाला, सरल स्वभाव बंदा पत्रकारिता में तो नजर नहीं आया। डेस्क पर होने वाली बहस, चर्चा गंभीर हो या चटपटी यशवंत निर्विकार, निर्लिप्त भाव से अपने काम में डूबे रहते। कम बोलने की आदत के कारण नवज्योति में श्याम जी अकसर उन्हें टोकते रहते, यार कुछ तो बोला कर, नही तो तेरा नाम गूंगा संपादक रख दूंगा। एक महीने पहले पत्रकार बने नौसिखियों की शहर में तूती बोलती थी, उन्हें लिखना नहीं आता, यशवंत की कलम उन्हें आवाज देती, उस छपी खबर पर नौसिखियों की दुकान चल पड़ती परंतु यशवंत भटनागर नामक एक पत्रकार है जो 28 साल से जुटा हुआ है, उसे बाकी और कोई तो क्या दूसरे अखबारों के पत्रकार तक नहीं जानते।

दैनिक नवज्योति के स्थानीय संपादक ओम माथुर जैसे और भी पत्रकार हैं जो यशवंत भटनागर को अपना प्रेरणा स्त्रोत या गुरू मानते हैं। इंदुशेखर पंचोली ने न्याय और नवज्योति में भटनागर के साथ काम किया था। अच्छी दोस्ती हो गई थी जो भास्कर में दुखदायी हो गई। पंचोली भास्कर के स्थानीय संपादक बन गए। वे सुबह 10-11 बजे से शाम 4-5 बजे तक और शाम 6-7 से सुबह 5-6 बजे तक  दफतर में रहते थे और बाकी से भी उम्मीद करते थे कि अधिक से अधिक समय दफतर में गुजारे। यशवंत का काम हो जाता था रात 2-3 बजे तक, पंचोली रोक लेते चाय पिलाने, उन दिनों रोज सुबह 6-7 बज जाया करती थी। दोस्ती होने के बावजूद पंचोली का स्वभाव और काम का तरीका उन्हें पसंद नहीं था और कई दफा उनका मूड काम छोड़ने का हुआ परंतु वह ऐसा कर नहीं पाए। यशवंत अब क्या करेंगे ? फिलहाल तो कुछ सोचा नहीं, अगर जंच गया तो हो सकता है बघेरा चला जाउं, पुरखों की ठीक-ठाक जमीन है, अभी दूसरों को दी हुई है, अब खुद खेती शुरू कर दूंगा।

राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट

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0 Comments

  1. kamal jain

    December 31, 2010 at 6:26 am

    bhaskar se alag hone par bhi yashwantji ka yash kam nahi hoga lakin bhai papi pet ka jawab kheti nahi hai alok tomar ji tare ginana chate hai to abhi badal hatne do .hada ji ne yashuda ke bahane apni peda bhi rakh di

  2. kamar ahamad khan

    December 26, 2010 at 12:17 pm

    neev ka pathar bhale hi imarat ke liye kitna hi importent kyo na ho, per badnasibi ye ki use na koi dekhta hai, na uskd dard samjhta hai. akhbaaro ki bedard dunia me ye desk ki nokri bhi kisi badnasibi se kam nahi.

  3. neeraj jha

    December 26, 2010 at 1:51 pm

    aap jase nek log jab kheti karenge to es desh ka bhala ho jayega

  4. आलोक तोमर

    December 26, 2010 at 2:13 pm

    मुझे यशवंत भटनागर जैसे दोस्तों पर गर्व है.जब जो जी छाहे करो. एक ज़िंदगी है वो भी ससुरी सूस्रों की शर्तों पर जी तो क्या फायदा. नवज्योति तो फिर भी इंसानों का अखबार है, भास्कर में तो इंसान से ज्यादा मशीन की कीमत है. भास्कर इसीलिये किसी महान पत्रकार/ सम्पादक जे लिए जाना नहीं गया.यशवंत जी कभी अपने खेत पर हमें भी बुलाएँ, तारे गिने ज़माना हो गया.[b][/b]

  5. rsdhamu

    December 27, 2010 at 5:15 am

    ab aise patrkaro ki poochh nahi hoti, chatukaro ki tooti bolti hai. kheti karo jee, uske liye dher saari badhai

  6. GHANSHYAM RAI

    December 27, 2010 at 9:56 am

    sir prnam ! aapne jo kiya achchha kiya.aapko to mai nhi janta lekin mujhe aasha h any akhabar aap k lie drwaja khula h. best of luck sir

  7. pramodpal singh

    December 28, 2010 at 5:40 pm

    yashwantji ke samrpan ko pranam.patrakarita se palayan thik nahi hai.chunuoti dijiye.aapni team khadi kijiye.

  8. Teerth Gorani

    December 30, 2010 at 7:48 pm

    Yashwant Bhatnagar ek aise purane bande rahe hain jise bhaskar management sajaijh rachkar nikal nahin paya varna ysne kayee purane patrakaron ko bakayada plan se nikala ya nikaljane ko majboor kiya. Girdhar tejwani, prem anandkar, hadaji etc misal hain. Albatta pancholi ji ke unki dosti itana kaam jaroor aayye ki uneh kisi saajish ka shikar nahin nahin hona para. Ek baat aur’ bhatnagji ke faisle ke peeche kush hadtak main bhi hoon jisne businees ke luye is line ko good bye kar diya hlanaki khuda ne apni khudai dikah dee.

  9. Teerth Gorani

    December 30, 2010 at 7:51 pm

    Yashwant Bhatnagar ek aise purane bande rahe hain jise bhaskar management sajaijh rachkar nikal nahin paya varna ysne kayee purane patrakaron ko bakayada plan se nikala ya nikaljane ko majboor kiya. Girdhar tejwani, prem anandkar, hadaji etc misal hain. Albatta pancholi ji ke unki dosti itana kaam jaroor aayye ki uneh kisi saajish ka shikar nahin nahin hona para. Ek baat aur’ bhatnagji ke faisle ke peeche kush hadtak main bhi hoon jisne businees ke luye is line ko good bye kar diya hlanaki khuda ne apni khudai dikah dee.

  10. tejwani girdhar

    March 4, 2011 at 1:12 pm

    bahut bahut saadhuvad hadhji

  11. tejwani girdhar

    March 4, 2011 at 1:13 pm

    bahut bahut saadhuvad hadaji

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