नई दिल्ली : पत्रकारों को मजीठिया वेतन बोर्ड के हिसाब से तनख्वाह और भत्ते मिलने का मामला अधर में लटक गया है. मीडिया मालिक सुप्रीम कोर्ट चले गए और अब केंद्र सरकार को बहाना मिल गया कि मामला तो कोर्ट में है, वहां से फैसला आ जाए तो हम लोग आदेश कर दें. सुप्रीम कोर्ट में कब तक इस वेज बोर्ड पर फैसला होगा, कोई नहीं जानता. और, मीडिया मालिक कोर्ट में मामला लटकाने में उस्ताद हैं, इसलिए यह मान लेना की तुरत-फुरत में कुछ होने वाला है, गलत होगा.
यह प्रकरण कल राज्यसभा में उठा. कई सांसदों ने पत्रकारों के लिए मजीठिया वेतन बोर्ड लागू करने की बात उठाई. राज्यसभा में प्रश्नकाल में एम पी अच्युतन, भरत कुमार राउत, रामचंद, खूंटिया और मुख्तार अब्बास नकवी ने मजीठिया वेज बोर्ड के बारे में पूरक सवाल उठाए. सांसदों के पूरक सवालों के जवाब में श्रम मंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रश्नकाल में कहा- ”यह मामला उच्चतम न्यायालय में लंबित है और सरकार इसे लागू करने के पक्ष में है.”
केंद्र सरकार ने बुधवार को कहा कि वह अखबारों एवं समाचार एजेंसियों के पत्रकारों और गैर पत्रकारों के वेतन एवं अन्य भत्तों की समीक्षा के लिए गठित मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को उच्चतम न्यायालय का निर्देश मिलने के बाद लागू करेगी. श्रम मंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे ने राज्यसभा में कहा, ”न तो सरकार पीछे हट रही है और न ही उसकी नीयत में खोट है. हम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं रहे हैं. हम अखबारों एवं समाचार एजेंसियों के पत्रकारों और गैर पत्रकारों के वेतन बोर्ड को लागू करने के लिए सभी उपाय करेंगे.”












mini sharma
August 4, 2011 at 7:10 am
Deepak tale hamesha andhera hota hee hai…. jo reporter dusre ke haq ke liye ladte hain wahee apne khud kee ladai nahee lad paa rahe hain…. aur mantri ko kya chaheye…. newspaper ke malik usko khila phila de rahe honge… bas ho gaya wage board…………….
विकास
August 4, 2011 at 9:31 pm
पत्रकारों की बर्बादी के जिम्मेदार वो खुद हैं… वर्ना कितने मालिक जानते थे कि इंटर्न्स के भरोसे चैनल चलाया जा सकता है या ट्रेनीज़ के भरोसे बुलेटिन निकाले जा सकते हैं… आज भी जब वेतन बढ़ाने की बात आती है तो ऊंचे पद पर बैठे लोग 10 कर्मचारियों के 5-5 हजार बढ़वाने की बजाय अपने 30 हजार बढ़वाने में ज्यादा रुचि लेते हैं… और अब अगर सरकार मजीठिया बोर्ड की सिफारिशों को लागू करवाने में मजबूरी दिखा रही है… तो गलत क्या है… और अगर मामला सुप्रीम कोर्ट में है… तो वहां भी तो एक मीडिया संस्थान ने ही गुहार लगाई है… क्या उस संस्थान के पत्रकारों को दूसरे पत्रकारों की हालत पर तरस नहीं आया… लेकिन पहले अपना घर भर लो… फिर दूसरों के घर के बारे में सोचेगें…