मध्य प्रदेश के बैतूल जिला मजिस्ट्रेट विजय आनन्द कुरील के न्यायालय में राज्य सुरक्षा कानून के तहत चल रहे पत्रकार रामकिशोर पवांर के बहुचर्चित मामलें में गवाही के दौरान अधिवक्ता भारत सेन ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारी पत्रकारिता जैसे महत्वपूर्ण विषय को समझते ही नही हैं। अधिकारी अंग्रेजी शासन काल की मानसिकता से ग्रसित होकर कार्य करते हैं। पत्रकारों पर फर्जी प्रकरण दर्ज करवाकर पत्रकारिता को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं, इससे लोकतंत्र का अहित होता हैं। इसका सीधा उदाहरण है पत्रकार रामकिशोर पवांर के साथ अपनाया जा रहा प्रशासनिक रवैया। उन्होंने आरोपी रामकिशोर पवांर को सुलझा हुआ पत्रकार बताते हुए उनकी तथा उनके द्वारा चलाए जा रहे मां ताप्ती अभियान की प्रशंसा की।
इसमें सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि जिस रामकिशोर पवांर को रासुका में तामिल किए जाने की कोशिश की जा रही है, वह विकलांग हैं। कुछ वर्ष पहले एक सड़क हादसे में उन्हें गंभीर चोटें आईं थीं, जिसके बाद से वे शारीरिक रूप से किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचा सकने की स्थिति में नहीं हैं। प्रशासन उन पर रासुका के तहत कार्रवाई करने का कुत्सित प्रयास कर रहा है। रामकिशोर को गंभीर अपराध करने वाले अपराधियों की श्रेणी में रखा जा रहा है। जबकि ज्यादातर मामले उन पर 107/16 के हैं। इस तरह के जिन मुकदमों को प्रशासन द्वारा उन पर लगाया गया था, उनमें से ज्यादातर मामले में कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया है। इसके बावजूद प्रशासन उन पर रासुका लगाकर जिला बदर की कार्रवाई करने का प्रयास कर रहा है। दुखद यह भी है कि पत्रकार हितों के लिए संघर्ष करने के नाम पर बनाए गए पत्रकार संगठन भी इसे लेकर खामोश हैं। इस मामले में रामकिशोर ने अपनी लड़ाई खुद लड़ते हुए प्रशासन के खिलाफ कोर्ट में दो परिवाद दायर किए हैं, जिनकी सुनवाई होने वाली है।
राज्य सुरक्षा कानून के तहत चल रहे पत्रकार रामकिशोर पवांर का मामला कई कारणों से जनचर्चा में बना हुआ है। पीयूसीएल द्वारा इस कानून को असंवैधानिक, मानव अधिकारों का हनन करने वाला और संविधान में प्रदत्त जीवन और स्वतंत्रता के अधिकारों का हनन करने वाला ठहराया जा चुका हैं। पीयूसीएल यह भी आरोप लगा चुका है कि जिस तरह टाडा और पोटा जैसे कानून गलत हैं वैसे ही रासुका का दुरूपयोग होता है। कुछ ताकतवर लोगों के इशारे पर कानून का दुरूपयोग करने के लिए बड़े अधिकारी किसी भी सीमा तक चले जाते हैं। प्रशासन कानून की आड़ लेकर पत्रकारों को की आवाज को दबाने तथा उन्हें प्रताडि़त करने का काम करता है।












bharat sen
December 17, 2010 at 1:52 pm
good example of legal journalism. but how the administration is taking illegal action against to the journalist is not defined on the news. this news does not create legal awareness to its news readers. but it is true that even the judicial administration /officer also does not know anything about the journalism; yet they are deciding the matter of journalists. Now a day journalists are facing hostile atmosphere not only in the government department but also in the court of law. vital question is that if the human rights of journalist are not protected how they will fight for the right of common people.