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पहले कमाने पर टैक्स भरो फिर खर्चने पर दो

: गजब है भारत की टैक्स प्रणाली : कुछ दिनों पूर्व जब मैं रायपुर से नागपुर तक का सफ़र अपनी गाड़ी से कर रहा था तो एक ख्याल मेरे मन में हर कुछ किलोमीटर के सफ़र के बाद बार-बार आ रहा था कि आखिर मैं इन्कम टैक्स पटाता ही क्यों हूं? और ये सवाल इसलिए आ रहा था क्योंकि इस 300 किलोमीटर के सफ़र में मेरे जेब से टोल टैक्स के रूप में 100 रुपये लग चुके थे और वापस आते वक़्त भी इतने का ही चूना मुझे दोबारा लगा.

: गजब है भारत की टैक्स प्रणाली : कुछ दिनों पूर्व जब मैं रायपुर से नागपुर तक का सफ़र अपनी गाड़ी से कर रहा था तो एक ख्याल मेरे मन में हर कुछ किलोमीटर के सफ़र के बाद बार-बार आ रहा था कि आखिर मैं इन्कम टैक्स पटाता ही क्यों हूं? और ये सवाल इसलिए आ रहा था क्योंकि इस 300 किलोमीटर के सफ़र में मेरे जेब से टोल टैक्स के रूप में 100 रुपये लग चुके थे और वापस आते वक़्त भी इतने का ही चूना मुझे दोबारा लगा.

मुझे ये भी पता है कि शायद इन पंक्तियों को पढ़ के कुछ लोग जरूर ये बोलेंगे कि देखो ये व्यक्ति मात्र 200 रूपये के लिए रो रहा है. क्योंकि सबसे बड़े लोकतन्त्र में ऐसी भावनाएं रखने वालों को अक्सर हीन दृष्टि से देखा जाता है या ये सोचा जाता है कि ऐसी सोच रखने वालो के पास कोई काम नहीं होता है. ऐसे ही आजकल देश का इन्कम टैक्स डिपार्टमेंट बहुत तेज तर्रार हो चुका है और अपने विज्ञापनों के माध्यम से लोगों के बीच डर और देशप्रेम दोनों भावनाओं को जगाने में लगा हुआ है. इनके विज्ञापनों में ये बताया जाता है कि हमारे टैक्स के पैसों से रास्ते, पुल आदि अधोसंराचना का विकास होता है. पर अब मेरा सवाल ये है कि अगर मैं हर साल इन्कम टैक्स नियमित रूप से अदा करता हूं तो इसका मतलब कहीं न कहीं मेरा योगदान भी इन सड़कों के निर्माण में है तो फिर मुझसे टोल टैक्स क्यों लिया जाता है?

देश के इकोनोमिक सिस्टम को अगर गौर से देखा जाए तो ये पता चलता है कि यहाँ हर नागरिक चाहे वो इन्कम टैक्स के दायरे में आता हो या न हो पर उसे हर दिन अनगिनत टैक्स पटाना पड़ता है. हद तो ये है कि मनोरंजन पर भी कर अदा करना पड़ता है और इन गाढ़ी मेहनत की कमाई से हजारों करोड़ के घोटालों को अंजाम दिया जाता है. आलम तो ये है कि आज हर भारतीय नागरिक को अनगिनत टैक्स चुकाने पड़ते हैं चाहे वो इन्कम टैक्स के दायरे में आता हो या नहीं. एक मोबाइल के बिल में सरकार 3 तरह के टैक्स वसूलती है, 10 फीसदी का सर्विस टैक्स, 2 फीसदी एजुकेशन सेस और उस पर 1 फीसदी का हायर एजुकेशन सेस.

देश जब आज़ाद हुआ था तब सूदखोरी को कानूनन अपराध के श्रेणी में लाया गया था पर आज जो इन्कम टैक्स विभाग हर टैक्स के ऊपर टैक्स ले रही है तो ये क्या अपराध नहीं है. अगर यूरोप और एशिया के ज्यादातर देशों के टैक्स पालिसी को देखा जाए तो कही भी सर्विस टैक्स का उल्लेख न के बराबर ही है. अमरीका और ब्रिटेन में डायरेक्ट सर्विस टैक्स का प्रावधान है ही नहीं और न ही सेस का, आखिर भारत की अर्थव्यवस्था में ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी है कि एक एक नागरिक को टैक्स के बोझ के तले दबा दिया जा रहा है.

आज देश के महंगाई के स्तर को देखें तो 1,80,000 की टैक्स फ्री लिमिट बहुत कम लगती है, बड़े शहरों में तो इतने में मध्यम वर्ग का घर नहीं चल पाता है. महानगरों की परिस्थिति ये है कि खाली किराया में ही लोगों के लाखों खर्च बढ़ जाते हैं, बच्चों की शिक्षा और स्वास्‍थ्‍य के तो क्या कहने, इन पर तो जितना खर्च कर ले उतना कम है. तो आखिर ये सब सरकार को समझ क्यों नहीं आती है. भारत शायद इस विश्व के कुछ चुनिन्दा देशों में आता है जहां मनोरंजन पर भी टैक्स लगाया जाता है. मतलब आपको खुश रहने का भी टैक्स अदा करना पड़ता है.

इस देश में जो वर्तमान टैक्स पोलिसी है उसके तहत यहाँ के नागरिकों को पहले पैसे कमाते वक़्त टैक्स चुकाना पड़ता है और जब वे अपने उन पैसों को खर्च करते हैं तो दोबारा टैक्स पटाना पड़ता है. बाद में यही टैक्स का पैसा है जो घोटालो के रूप में भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों की जेब गरम करने का काम करता है और कभी-कभी इन तमाम कद्दावर लोगों के स्विस बैंक में भी सड़ते हैं. एक सर्वे के अनुसार स्विस बैंक में रखे भारतीय पैसों को अगर देश में लाया जा सका तो एक ऐसी व्यवस्था खड़ी हो पायेगी जिससे आने वाले 30 सालों तक देश के नागरिकों को टैक्स से राहत दिया जा सकेगा.

ये वही देश है जहां एक केंद्रीय मंत्री की अध्यक्षता वाले अंतराष्‍ट्रीय क्रिकेट कमेटी को 45 करोड़ रुपये की टैक्स छूट प्रदान की जाती है. आखिर ऐसा इस कमेटी ने देश के लिए क्या कर दिया कि इस संस्था को इतनी बड़ी छूट दी गयी? ये समझ से परे है अलबत्ता देश के महंगाई मंत्री शरद पवार ने इस छूट की नींव रखी ये जग जाहिर है. 
जब अन्ना हजारे जी मैदान में भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंका तो पूरा देश उनके साथ खड़ा हो गया, कभी अगर इस ओर भी उनका विचार गया तो शायद देश में सत्तासीन लोगों के कान में आवाज पहुंच पायेगी.

लेखक गोपाल सामान्‍तो रायपुर के निवासी हैं.

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0 Comments

  1. bijay singh

    April 11, 2011 at 3:24 pm

    public ko hi jeb dheela karna padta hai.
    neta ,politicians to public ke paise pe hi raj kar rahe hain.
    who will save the common man?????????????

  2. ALOK

    April 11, 2011 at 6:02 pm

    Dear Mr. Gopal…..whatever you have written is absolutely correct. Even it comes to my mind also so many times that a common man is paying tax every where. If we are earning money after hard work we have to pay huge taxes. If we are buying any services we have to pay taxes. If we eat something in Restaurent or Hotels we have to pay tax. One more interesting thing you will see that all the doctors doing private practice are charging huge consultation fees but none of them gives you receipt of that (they will only give if you will ask for that). Now just think where that money is going (they are not liable to pay any income tax on that un-accounted money). But as you have righlty said that in this busy world “KISE FARK PADTA HAI”. But fark pad sakta hai agar ek ho kar awaz uthai jaye to.

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