आंध्र प्रदेश पुलिस मेरे पति हेम चंद्र पांडे के बारे में दुष्प्रचार कर फ़र्जी मुठभेड़ में की गई उनकी हत्या पर पर्दा डालने का काम कर रही है. इस मामले में न्यायिक जांच किए जाने के बजाय लगातार मुझे परेशान करने की कोशिश की जा रही है. पुलिस ने शात्री नगर स्थित हमारे किराये के घर में बिना मुझे बताए छापा मारा है और वहां से कई तरह की आपत्तिजनक चीज़ों की बरामदगी दिखाई है.
आंध्र प्रदेश पुलिस का ये दावा बिल्कुल झूठा है कि मैंने उन्हें अपने घर का पता नहीं बताया. पुलिस के पास मेरे घर का पता भी था और मेरा फोन नंबर भी लेकिन उन्होंने छापा मारने से पहले मुझे सूचित करना ज़रूरी नहीं समझा. मैं अपने पति हेम चंद्र पाडे के साथ A- 96, शास्त्री नगर में रहती थी. हेम एक प्रगतिशील पत्रकार थे. साहित्य और राजनीति में उनकी गहरी दिलचस्पी थी. उनके पास मक्सिम गोर्की के उपन्यासों और उत्तराखंड के जन कवि गिर्दा जैसे रचनाकारों की ढेर सारी रचनाएं थी. इसके अलावा मार्क्सवादी राजनीति की कई किताबें भी हमारे घर में थी.
मैं पूछना चाहती हूं कि क्या मार्क्सवाद का अध्ययन करना कोई अपराध है? पुलिस जिन आपत्तिजनक दस्तावेज़ों की बात कर रही हैं उनके हमारे घर में होने की कोई जानकारी मुझे नहीं है. मेरे पति का एक डेस्क टॉप कम्प्यूटर था लेकिन उनके पास कोई लैपटॉप नहीं था. उनके पास फ़ैक्स मशीन जैसी भी कोई चीज़ नहीं थी. वहां गोपनीय दस्तावेज़ होने की बात पूरी तरह मनगढ़ंत है. मुझे लगता है कि पुलिस मेरे पति की हत्या की न्यायिक जांच की मांग को भटकाने के लिए इस तरह के काम कर रही है. मैं पूछना चाहती हूं कि सरकार क्यों नहीं न्यायिक जांच के लिए तैयार हो रही है?
मैं अपने पति की हत्या के बाद काफ़ी दुखी थी इस वजह से मैं शास्त्रीनगर के अपने किराए के घर में नहीं गई. मैं कुछ दिन अपनी सास के साथ उत्तराखंड के हलद्वानी और अपनी मां के पास पिथौरागढ़ में थी. मकान मालकिन का फ़ोन आने पर मैंने उन्हें बताया था कि मैं वापस आने पर उनका सारा किराया चुका दूंगी, अगर उन्हें जल्द घर खाली कराना है तो मेरा सामान निकालकर अपने पास रख लें मैं बाद में उनसे अपना सामान ले लूंगी. अगर हमारे घर में कोई भी आपत्तिजनक सामान होता तो मैं उनसे ऐसा बिल्कुल भी नहीं कहती.
मेरी समझ में ये नहीं आ रहा है कि पुलिस इस तरह की अफ़वाह फैलाकर क्या साबित करना चाह रही है. मुझे शक है कि वो मेरे पति की हत्या को सही ठहराने के लिए ही ये सारे हथकंडे अपना रही है. मैं मीडिया से अपील करना चाहती हूं कि वो आंध्र प्रदेश पुलिस के दुष्प्रचार में न आए और मेरे पति के हत्यारों को सज़ा दिलाने में मेरी मदद करे.
विनीता पांडे












Sudhir.Gautam
November 16, 2010 at 11:11 am
Vinita its not actually “Police” I believe that alone is corrupt. the whole political system that is dominating thus directing these people are politically perverted…that is the reason behind whole scenario that is prevailing.
किसी “भ्रष्ट नेता” या “माफिया” के “महल” में दाखिल होने के लिए इनको तब तक “वारंट” नहीं मिलता जब तक वो संभल न जाये, और अगर कुछ आपत्तिजनक हो भी तो उसके भीतर मौजूद “समर्पित दूत” (जिन्हें समय से खर्चा पानी जाता रहता है) समय से खबर भिजवा देंगे. इसके बाद भी अगर कुछ हाथ लगा तो वो “लीपा पोती” (कार्यवाही) में दबा दिया जायेगा.
गरीब की कुटिया चाहे किराए की हो या अपनी, उसमें ये जब चाहे आ सकते हैं, और आपत्तिजनक सामान जो चाहो सो बरामद दिखा देंगे. यही तो है प्रजातंत्र, आपका,आपके लिए,आप ही के द्वारा चुने प्रतिनिधियों से शोषण.
“कॉमरेड हेम के लिए इतना ही कहूँगा…
“Comrades never die”,
thy thoughts remain in the solitary land,
Followed by the others,
the others hand,
thy are the witness to suffering of those
who suffers for “emancipation,
thy are the ones who make
a country an empathetic nation,
comrades never die…
comrades never die!!!
http://medianukkad.blogspot.com/2010/09/blog-post.html
sweti
November 16, 2010 at 12:28 pm
अपने ऊपर लगे हत्या के दाग को मिटाने के लिए पुलिस किसी भी स्तर तक जा सकती है। बेहतर होता, सरकारें इस काण्ड की ईमानदारी से जांच करा देती।
मदन कुमार तिवारी
November 16, 2010 at 2:05 pm
विनीता जी आपके साथ जो परेशानी हुई और आप जिस दौर से गुजर रहीं हैं मै उस दर्द को समझता हुं। रही फ़र्जी मुठभेड की बात तो ९०% एनकाउंटर जो पुलिस करती है वह फ़र्जी हीं होता है। अभी एक केस में रिटायर होने के बाद डी आई जी रैंक के अधिकारी को केराला में आजिवन कारावास की सजा सुनाई गई । उक्त मुकदमा भी मुठ्भेड के २०-२५ साल बाद दर्ज हुआ था। देश के न्याययिक ईतिहास की बहुत बडी घटना थी वह जब हत्या के २०-२५ साल बाद एक रिटायर्ड हवलदार के बयान पर केस दर्ज हुआ। जहां तक आपतिजनक सामग्री बरामद दिखाने की बात है तो जप्ती सुची बनाइ गई होगी । आप देखना उस पर किसका दस्तखत है। वैसे पुलिस वाले अपना गवाह रखते हैं जिनका उपयोग जप्ती सुची के गवाह के रुप में करते हैं लेकिन वह पता चल जाता है। दुसरी बात आप्तीजनक सामग्री क्या होती है यह पुलिस को भी अच्छी तरह नही मालूम । कोई पुस्तक चाहें वह नक्सल साहित्य हीं क्यों न हो , अगर एक पत्रकार के घर पर पाई जाती है तो ईसका मतलब यह नही की वह नक्सलवादी है , उसका उपयोग वह अपने आलेख के लिये भी कर सकता है। जी न्यूज वाले मामले में लोकसभा में पैसे देकर प्रश्न पुछने पर सांसदों के साथ-साथ दो पत्रकारों को भी दिल्ली की निक्कमी पुलिस ने अभियुक्त बनाया था । न्यायालय ने उनका नाम हटाने का आदेश दिया तथा अपने आदेश में यह साफ़ लिखा की सांसद को घुस देने का उद्देश्य समाज की भलाई थी और पत्रकारों ने कोई अपराध नही किया बल्कि देश की सेवा की । आप अपने वकील महोदय से कहें अगर जरुरत हो तो मुझसे बात करें । आप न्यायालय में रिट भी दाखिल करके सारि बातें रख सकती हैं वैसे अनुसंधान के दौरान अति अनिवार्य होने की स्थिति में हीं न्यायालय हस्तक्षेप करता है। आप पहले जप्ती सुची की नकल प्राप्त करने का प्रयास करें। हिम्मत रखें । भडास के संपादक यशवंत भी जुझारु हैं । इस साईट पर बहुत अच्छे लोग है । आपकी मदद के लिये सभी आगे आयेंगे ।
मदन कुमार तिवारी
०९४३१२६७०२७। ०६३१-२२२३२२३
[email protected]
shailendra parashar
November 17, 2010 at 3:55 pm
mujhe bohat dukh hai apki bat ka or saman karta hu apki es ladai ka bas ap ko insaf jarur milega himat mat hariye .
shail
November 18, 2010 at 6:16 am
vinita ji hum aapke saath hain. aap ye bataie ki aakhir kon police adhikaari pareshaan kar rahe hain.
Anirudh Mahato
March 9, 2011 at 10:01 pm
sachai dekhi jay to 99 % encounter hatya ka mamla banta hai. kanoon andhi hai. kanoon inhen saza nahi de sakti. yah kalyoog hai yahan apradhiyon ka bol-bala hai. nyaya karne waly ko kanooni ho ya gair kanooni tarike se mout ki saza diya jata hai.