: कमलेश रघुवंशी के झारखंड हेड बनने की चर्चा : दैनिक जागरण से कई तरह की सूचनाएं हैं. कुछ अपुष्ट और कुछ पुष्ट. अब ये न पूछिएगा कौन सी पुष्ट है और कौन अपुष्ट. बड़े बदलाव की खबरें हैं. अभी तक दैनिक जागरण, नोएडा के संपादक के रूप में काम देख रहे कमलेश रघुवंशी के बारे में सूचना है कि उन्हें दैनिक जागरण, झारखंड का स्टेट हेड बना दिया गया है. अभी तक यह कार्यभार संभाल रहे संत शरण अवस्थी के बारे में कहा जा रहा है कि उन्हें दैनिक जागरण, वाराणसी यूनिट का कार्यकारी संपादक बनाया जा रहा है.
सूत्रों के मुताबिक अगर इन बदलावों की सूचना सही है तो इसके कई अर्थ हैं. एक तो ये कि निदेशक सुनील गुप्ता की यूनिटों में निदेशक संजय गुप्ता और उनके खासमखास विष्णु त्रिपाठी की घुसपैठ बढ़ने लगी है. दूसरे, शैलेंद्र दीक्षित का पराभव शुरू हो चुका है. अभी तक पूरे बिहार व झारखंड में दैनिक जागरण को अपने इलाके के रूप में शैलेंद्र दीक्षित ट्रीट करते रहे हैं और इसमें सुनील गुप्ता का पूरा समर्थन रहा है. संत शरण अवस्थी को शैलेंद्र दीक्षित का वर्षों पुराना साथी बताया जाता है. बनारस में संत शरण को भेजे जाने का अर्थ ये है कि उन्हें एक तरह से देर सबेर निपटाया जाना है. दूसरे, शैलेंद्र दीक्षित को जागरण ग्रुप में मजबूत संपादकों में माना जाता है.
विष्णु त्रिपाठी ने कमलेश को झारखंड भिजवाकर एक तीर से दो निशाने साधे हैं. पहला तो ये कि नोएडा में दिन ब दिन मजबूत होते जा रहे कमलेश को मालिकों से काफी दूर कर दिया है और दूरस्थ इलाके में साबित कर दिखाने के लिए भिजवा दिया है. दूसरे, शैलेंद्र दीक्षित को कमजोर कर खुद को और मजबूत बना लिया है. सूत्रों के मुताबिक आईआरएस के जो नतीजे हैं, उसके बाद देर सबेर जमशेदपुर और धनबाद के संपादकों को भी हटाने की तैयारी है. जमशेदपुर में लांचिंग के आठ बरस बाद दैनिक जागरण नंबर दो से नंबर तीन पोजीशन पर पहुंच गया है. इस यूनिट की लांचिंग संत शरण अवस्थी ने ही कराई थी. पिछले साल आलोक मिश्रा पर एक महिला सहयोगी के आरोपों को देखते हुए जितेंद्र शुक्ला को वहां का प्रभारी बनाया गया था. धनबाद के प्रभारी भारतीय बसंत के कार्यों से भी प्रबंधन खुश नहीं है. वहां दिनोंदिन दैनिक जागरण को प्रभात खबर के हाथों मात खाना पड़ रहा है. माना जा रहा है कि अगर बिहार व झारखंड में दैनिक जागरण अभी न संभला तो जल्द हर जगह तीसरे नंबर का अखबार हो जाएगा.
नोट- कानाफूसी कैटगरी की खबरें चर्चाओं और कयासों पर आधारित होती हैं. इनकी विश्वसनीयता पर भरोसा करने से पहले खुद एक बार इन चर्चाओं की पुष्टि करें और फिर हमें भी सूचित करें, नीचे दिए गए कमेंट बाक्स के जरिए.












prabhat
March 18, 2011 at 6:20 am
sab bakbas hai. yah sab kutton wali baat hai
sunita
March 17, 2011 at 8:13 pm
abhi to is akhbar ka or bhtha bethega. dekhte jao.
perwez
March 18, 2011 at 11:05 am
sunita ji aapne satik tippanni ki hai.
नाम देकर नौकरी देनी है
March 19, 2011 at 7:00 am
बात यह नहीं कि किसी कहां भेजा जा रहा है बात यह है कि सभी को समय अपने अपने ही कर्मो का फल दे रहा है। पावर में रहते हुए भेदभाव की हद पार करने वाले अवस्थी ने जमशेदपुर में स्थानीयता और यूपीवाद की जो खाई वेतन और भत्तों में खीची थी, उसे बहुत हद तक आलोक मिश्रा ने पाटा था। लेकिन इसके बाद इसी खेमे से आए जितेन्द्र शुल्का ने तो सारी सीमाएं ही पार कर दी। सभी को अपने ही कर्मो का फल मिलना है देर या सवेर। भगवान तो देख रहा है न भेदभाव को। तो देर हो या सवेर इन्हें भुगतना तो होगा ही, हां अवस्थी के जाने में कुछ देर जरुर हो गई है काबिल जरुर है लेकिन गुरुर और जमशेदपुर में एक ही देश के दो प्रदेशों में भेदभाव का बीज भरने वाले इस सख्त को तो पहले ही यहां से चलता किया जाना चाहिए था। पता नहीं दैनिक जागरण का उपरी मैनेजमेंट को यह भेदभाव क्यूं नजर नहीं आता है। अगर वेतन की पूरी सीट ही निकाल कर खंगाल ले तो जमशेदपुर से लेकर रांची तक भेदभाव और गोलमाल की पूरी भेद खुल जाए।
रामशकल
March 21, 2011 at 12:40 pm
क्या बात कहीं है गुमनाम वाले भाई जी
आपने तो दैनिक जागरण जमशेदपुर के पीडितों की आवाज ही उठा दी है, आपको पता है यहां एक ही तरह के काम करने वाले ण्क व्यक्ित को बतौर भत्ता एक लीटर पेटोल मिलता है दूसरे को दोगुना। किसी को इंक्रीमेंट तीन गुना लगता है तो किसी को सीधे सीधे उसका एक चौथाई। पता नहीं यहां काम करने का क्या मानक पैमाना है और मैनेजमेंट में बैठे लोग क्या देखते है, आखिर भेदभाव की हद तो होती ही है। अभी हाल में ही यहां काम करने वाले विश्वजीत भटट को बैठा दिया गया है, आरोप है कि वे नौकरी बदलने के लिए हिन्दुस्तान गए थे। उनकी गलती जागरण के कर्मचारियों को समझ में नहीं आ रही है, क्योंकि जब भास्कर जमशेदपुर में आया था तो संपादकीय के लगभग सभी लोगों ने उसके संपादक संतोष मानव के दरबार में हाजिरी लगाई थी। तब तो किसी भी कर्मचारी पर कोई कार्रवाई नहीं की गई, लेकिन भटट जी पर कारवाइ का मतलब किसी को समझ नहीं आ रहा है, शायद यह संम्पादकीय प्रभारी और भटट जी के बीच का कोई गोलमाल था जिसके कारण उन्हें यह सजा मिल रही है, जो भी हो करनी का फल तो सबको भुगतना पडता है, शायद कुर्सी मिलते ही स्वयं को सर्वसक्ितमान समझने वाले यह भूल जाते है कि रावण से महाबली, पराक्रमी और अनुभवी कोई नहीं था लेकिन जब उसका गरुर टूट गया तो क्या शंतशरण अवस्थी, क्या जित्तेन्द्र शुक्ला। उसकी लाठी में तो आवाज नहीं होती जब बोलेगी तो इन पराक्रमियों को जो दर्द होगा उसका आभास पूरा मीडिया जगत करेगा।
hgdtrft
March 23, 2011 at 6:38 am
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गुरुमेज सिंह
March 23, 2011 at 6:50 am
गलती इनसान से ही होती है भई लेकिन उसे अगर लोग सुधार ले तो उससे महान कोई नहीं होता, आपकी बात कुछ सही हो सकती है लेकिन पूरी नहीं क्योंकि जागरण में भी तो अच्छे लोग काम कर रहे है न, फिर अच्छे लोग और बुरे लोग तो होते ही है और कौन नहीं है जो अपने लोगों को मदद नहीं करना चाहता। अगर जागरण के लोगों ने ऐसा किया तो कौन से नई बात हो गई।