विकिपीडिया पर जब आप ”अप्पन समाचार” के बारे में सर्च करेंगे, तो ये जानकारी मिलेगी- ”अप्पन समाचार भारत के बिहार प्रांत में स्थित मुजफ्फरपुर जिले की कुछ युवा ग्रामीण महिलाओं द्वारा शुरु किया गया एक सामुदायिक प्रयास है। मुख्यतया यह खुशबू एवं अन्य चार लड़कियों का पूरा प्रयास है जिसके अंतर्गत ये चारो युवा लड़कियाँ अपने गाँव के आसपास से जुड़े खबरों और महत्वपूर्ण मुद्दों के बारे में साईकिल पर घूम-घूम कर हैंडीकैम की मदद से जानकारी एवं साक्षात्कार इकट्ठा करती हैं।
इसे उस क्षेत्र में लगने वाले साप्ताहिक पेंठियाँ (हाट) में पोर्टेबल वीडियो पर समाचार प्रसारित करती हैं। इस अनोखे कार्यक्रम की योजना एक सामाजिक कार्यकर्ता संतोष सारंग की देन है। बज्जिका, भोजपुरी एवं स्थानीय हिन्दी में किया जाने वाला यह अनूठा प्रयास इस क्षेत्र की ग्रामीण जनता में इतना लोकप्रिय हो चुका है कि अब इसकी खासी मांग बढ गयी है।”
”अप्पन समाचार” का जो प्रयोग किया गया, उसकी तरफ दुनिया भर की मीडिया आकर्षित हुई। कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय चैनलों, पोर्टलों, अखबारों ने इस सामुदायिक प्रयास के बारे में खबरें अपने यहां प्रकाशित, प्रसारित की।
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ताजी सूचना है कि जर्मनी के एक बड़े चैनल ने भी अप्पन समाचार के बारे में अपने यहां खबर प्रसारित की है. इस खबर को और वीडियो को आप इस वेबसाइट पर देख सकते हैं- क्लिक करें… जर्मन चैनल पर अप्पन समाचार के बारे में खबर
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अप्पन समाचार के बारे में बीबीसी, आईबीएन7 आदि जगहों पर भी खबरें छप चुकी हैं, दिखाई जा चुकी हैं. इन्हें देखने-पढ़ने के लिए क्लिक करें… बीबीसी में अप्पन समाचार और सीएनएन-आईबीएन पर अप्पन समाचार
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अप्पन समाचार का अपना एक ब्लाग भी है. उस तक जाने के लिए क्लिक करें- अप्पन समाचार
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अप्पन समाचार के संतोष सारंग भड़ास ब्लाग के भी सदस्य हैं. उन्होंने कई पोस्ट भड़ास ब्लाग पर अप्पन समाचार के बारे में डाला हुआ है. कुछ एक को पढ़ने के लिए क्लिक कर सकते हैं… भड़ास ब्लाग पर अप्पन समाचार (1) और भड़ास ब्लाग पर अप्पन समाचार (2)
पर सवाल ये है कि मुख्यधारा की मीडिया के एजेंडे में अब गांव और वहां की जिंदगी, वहां के दुख-सुख क्यों नहीं है, जिसे उठाने के लिए अप्पन समाचार जैसे सामुदायिक प्रयासों की जरूरत पड़ने लगी है. अक्सर कहा जाता है कि आजकल की मुख्य धारा की मीडिया का एजेंडा शहरी मध्यवर्ग हो गया है, जिसके पास क्रय शक्ति होती है और इसी खर्च करने की क्षमता रखने वाले तबके के पास विज्ञापनदाता जाना चाहते हैं, अपने प्रोडक्ट पहुंचाना चाहते हैं, सो, मीडिया ने भी अपना एजेंडा गांवों और वहां के सुखों-दुखों से हटाकर शहरी जीवन और शहरों को बना लिया है. शहर में कोई घटना घटित होती है तो वह देखते ही देखते राष्ट्रीय न्यूज बन जाती है. उसे शासन भी संज्ञान में लेता है. लेकिन गांवों में लोग मरते रहें, बीमार होते रहें, पीड़ित रहें…. कोई नहीं पूछने वाला. जब मीडिया का भी मकसद ज्यादा से ज्यादा मुनाफा बटोरना हो जाए तो उनसे कैसे गांवों और गरीबों के हित की बात करने की अपेक्षा की जा सकती है. लेकिन फिर सवाल यह है कि मीडिया को भी मीडिया का लाइसेंस क्यों दिया जाए, इस दलाल व पूंजीवादी मीडिया को मीडिया के फायदे क्यों दिए जाए. कायदे से, मीडिया तो अप्पन समाचार जैसे प्रयासों को माना जाना चाहिए. और, ऐसे सामुदायिक प्रयासों को बढ़ाने-सपोर्ट करने की जरूरत है.












anil rana
May 18, 2011 at 5:54 pm
hum isese prerna jaroor lenge.
sanjay kumar
September 14, 2011 at 10:32 am
i support appan samachar